मध्यप्रदेश में कांग्रेस का सेल्फी स्टार्ट
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पंकज शुक्ला

बुधवार को प्रदेश में कांग्रेस के समर्थक खुश थे कि लंबी चुप्‍पी के बाद सभी बड़े नेता एक साथ, एक मंच पर आ रहे हैं और वे भाजपा को मिल कर चुनौती देंगे। इस उम्‍मीद में भीड़ भी पहुंची। नेता भी खुश थे कि इस बहाने ही सही उनका शक्ति प्रदर्शन हो जाएगा। यह शक्ति प्रदर्शन नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति से लेकर 2018 के विधानसभा चुनाव में चेहरे के संघर्ष तक में बड़ी सीढ़ी साबित होगा। मगर, कांग्रेस की संजीवनी माना जाने वाला यह आंदोलन भी कई सवाल छोड़ गया है। पिछले दो दिनों की ही गतिविधियों का आकलन करें तो हम पाते हैं कि कांग्रेस और इसके क्षत्रपों को जिस भाजपा और इसके नेतृत्‍व से टक्‍कर लेना है, उसके सामने इसकी तैयारी कुछ कमतर ही है। मसलन, बुधवार को प्रदर्शन में नेताओं के सेल्‍फ (व्‍यक्तिगत छवि) को चमकाने का सिलसिला जारी रहा। नेता एक मंच पर तो थे लेकिन उनकी भाव भंगिमाएं और हावभाव एकदम जुदा थे। यह अंतर मंगलवार शाम को प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में आयोजित भोज के कुछ घंटे पहले एयरपोर्ट से ही नजर आ गया था जब सभी नेता भोपाल पहुंचे थे। नेताओं और कार्यकर्ताओं की खेमेबंदी बार-बार दिखाई दी। कांग्रेस का यह विभाजन उस संतरे की तरह है जिसके खोल के अंदर सारी फांकें बंटी हुई होती है, जबकि प्रतिद्वंद्वी भाजपा ‘मौसंबी’ की तरह है, जो ज्‍यादा संगठित, ज्‍यादा अनुशासित और ‘सेल्‍फ’ से थोड़ी मुक्‍त है। कांग्रेस नेताओं को यह समझना होगा कि वे इक्‍का-दुक्‍का मौकों पर दिखावे के इस संतरे रूपी खोल को ओढ़ना बंद करें तभी जनता में सही संदेश पहुंच पाएगा।

उपद्रव से क्‍यों मुक्‍त नहीं?

कांग्रेस के प्रदर्शन से उठे सवालों में सबसे प्रमुख सवाल तो यही है कि सत्‍ता से 13 वर्षों से दूर कांग्रेस का चरित्र क्‍यों अब तक सत्‍ताधारी पार्टी की तरह उन्‍मुक्‍त, बेलगाम तथा अनुशासनहीन है? इन गुजरे सालों में भाजपा ने दर्जनों आयोजन किए जिसमें कार्यकर्ता ही नहीं, जनता को भी बड़ी संख्‍या में जुटाया गया लेकिन वहां इस तरह की तोड़फोड़, अनुशासन दरकिनार कर नारेबाजी और व्‍यक्तिगत नारे न लगाने जैसे अपने ही नेताओं के आग्रह को ठुकराने की उद्दंडता दिखाई नहीं दी। जबकि कांग्रेस के इस आयोजन में नेताओं के स्‍वागत से लेकर उनकी विदाई तक कार्यकर्ताओं ने खासी अनुशासनहीनता की। मंच से ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया सहित कई नेताओं ने कार्यकर्ताओं से शां‍त रहने का आग्रह भी किया, नाराजगी भी जताई, आलोचना भी की, लेकिन सब बेनतीजा...। क्‍या कांग्रेस को स्‍वयं से यह सवाल नहीं करना चाहिए कि उसके कार्यकर्ताओं में अनुशासन कैसे लाया जाए।

बंगलों को सत्‍ता केन्‍द्र बनाने की आदत

कांग्रेस नेताओं की आदत है कि वे संगठन तथा पार्टी कार्यालय से अधिक महत्‍व अपने बंगले को देते हैं। ये बंगले ही सत्‍ता केन्‍द्र होते हैं। इस बार भी यही हुआ, मंगलवार को सांसद ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया ने प्रदेश कार्यालय आने के पहले होटल में मीडिया से बात की, जबकि वे जानते थे कि प्रदेश कार्यालय में पूरा मीडिया उनका इंतजार कर रहा है। दूसरी तरफ, कमलनाथ ने बुधवार सुबह सभी नेताओं को अपने बंगले पर बुलाया। ये दोनों नेता ही मुख्‍यमंत्री पद के दावेदार माने जा रहे हैं। क्‍या इन नेताओं को अपनी गतिविधियां प्रदेश कार्यालय से संचालित नहीं करनी थी?

अपनों से घिरे क्षत्रप, दूसरों से बेखबर

पूरे समय कांग्रेस के दिग्‍गज नेता अपने समर्थकों के काकस से घिरे रहे। मंगलवार शाम भोज में ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया ने अपने अंदाज में कारा तोड़ने की कोशिश की लेकिन कमलनाथ का रौबदार व्‍यक्तित्‍व उनसे सहज मुलाकात में बाधा बन गया। जबकि पूर्व मुख्‍यमंत्री दिग्विजय सिंह अधिक खुलेपन के साथ मीडिया से लेकर पार्टी पदाधिकारियों से मिले। जब तक ये क्षत्रप अपने समर्थकों का दायरा नहीं तोड़ेंगे तब तक कैसे आम कार्यकर्ता से संवाद कर पाएंगे?

बुधवार को प्रदेश में कांग्रेस के समर्थक खुश थे कि लंबी चुप्‍पी के बाद सभी बड़े नेता एक साथ, एक मंच पर आ रहे हैं और वे भाजपा को मिल कर चुनौती देंगे। इस उम्‍मीद में भीड़ भी पहुंची। नेता भी खुश थे कि इस बहाने ही सही उनका शक्ति प्रदर्शन हो जाएगा। यह शक्ति प्रदर्शन नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति से लेकर 2018 के विधानसभा चुनाव में चेहरे के संघर्ष तक में बड़ी सीढ़ी साबित होगा। मगर, कांग्रेस की संजीवनी माना जाने वाला यह आंदोलन भी कई सवाल छोड़ गया है। पिछले दो दिनों की ही गतिविधियों का आकलन करें तो हम पाते हैं कि कांग्रेस और इसके क्षत्रपों को जिस भाजपा और इसके नेतृत्‍व से टक्‍कर लेना है, उसके सामने इसकी तैयारी कुछ कमतर ही है। मसलन, बुधवार को प्रदर्शन में नेताओं के सेल्‍फ (व्‍यक्तिगत छवि) को चमकाने का सिलसिला जारी रहा। नेता एक मंच पर तो थे लेकिन उनकी भाव भंगिमाएं और हावभाव एकदम जुदा थे। यह अंतर मंगलवार शाम को प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में आयोजित भोज के कुछ घंटे पहले एयरपोर्ट से ही नजर आ गया था जब सभी नेता भोपाल पहुंचे थे। नेताओं और कार्यकर्ताओं की खेमेबंदी बार-बार दिखाई दी। कांग्रेस का यह विभाजन उस संतरे की तरह है जिसके खोल के अंदर सारी फांकें बंटी हुई होती है, जबकि प्रतिद्वंद्वी भाजपा ‘मौसंबी’ की तरह है, जो ज्‍यादा संगठित, ज्‍यादा अनुशासित और ‘सेल्‍फ’ से थोड़ी मुक्‍त है। कांग्रेस नेताओं को यह समझना होगा कि वे इक्‍का-दुक्‍का मौकों पर दिखावे के इस संतरे रूपी खोल को ओढ़ना बंद करें तभी जनता में सही संदेश पहुंच पाएगा।[लेखक सुबह सवेरे के स्थानीय संपादक हैं , सुबह सवेरे से साभार ]

 

Dakhal News 23 February 2017

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