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उमेश त्रिवेदी
भारत के सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत के इस बयान के परिणाम दूरगामी होंगे कि जम्मू कश्मीर में सैन्य-ऑपरेशन के दौरान आतंकवादियों को मदद पहुंचाने वाले स्थानीय नागरिकों और युवकों को राष्ट्रविरोधी मानकर सख्त कार्रवाई की जाएगी। सेनाध्यक्ष ने कश्मीरी नागरिकों को यह चेतावनी बुधवार को दी है। सेनाध्यक्ष की नाराजी का सबब तीन बड़े सैन्य अभियानों के दरम्यान मुठभेड़ों में मारे गए छह सैनिकों की शहादत है। थलसेनाध्यक्ष के वाक्यांशों में झलकती कुंठा से साफ है कि कश्मीर में सिविल नागरिकों और आतंकवादियों के बीच अपवित्र गठजोड़ और सांठगांठ सेना के लिए मुश्किलें पैदा कर रहे हैं।
सैन्य कार्रवाई के दौरान आतंकवादियों की तुलना में सैनिकों की मौत का आंकड़ा निरन्तर बढ़ रहा है। ’साउथ एशिया टेरेरिज्म’ पोर्टल के अनुसार 2015 के दौरान आंतकवादी मुठभेड़ों में 41 जवान शहीद हुए थे, जबकि मरने वाले आतंकवादी 113 थे। 2016 में 88 सैनिक मौत के मुंह में समा गए, जबकि आंतकवादियों की संख्या 168 है। 2017 में पहले दो महीनों में आतंकवादी 8 जवानों को निशाना बना चुके हैं। घायल सैनिकों की संख्या अलग है।
सेना प्रमुख ने कश्मीरियों से आग्रह किया है कि जिन लोगों ने सेना के खिलाफ हथियार उठाए हैं, वो स्थानीय लड़के हैं और अगर वो पाकिस्तान एवं आईएसआईएस के झंडे लहराकर आतंकवादी कृत्य करना चाहते हैं, तो सेना उनको राष्ट्रविरोधी तत्व मानकर कार्रवाई करेगी। सेना कश्मीर में दोस्ताना ऑपरेशन्स करना चाहती है, लेकिन यदि आप बाज नहीं आए तो हमें सख्त कार्रवाई के लिए बाध्य होना पड़ेगा। बीते कुछ महीनों में आतंकवादियों से मुठभेड़ के दौरान कई इलाकों में स्थानीय युवक सैन्य-दलों पर पथराव करने लगे हैं। इससे आतंकियों को बचने में मदद मिलती है। स्थिति की नजाकत समझने के बावजूद यदि यह क्रम नही रुका तो सेना अनवरत् सैन्य-अभियान के जरिए इन तत्वों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करेगी।
सेनाध्यक्ष की नाराजी का मूल कारण भी यही है कि सेना जन सहयोग से आतंक विरोधी मुहिम को अंजाम देना चाहती हैं, लेकिन कुछ स्थानीय लोग कार्रवाई में दीवार बनकर खड़े हो जाते हैं। इसके कारण सैनिकों के हताहत होने का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। इन खतरनाक प्रवृत्तियों को अनदेखा करना संभव नहीं है। सेनाध्यक्ष की यह हिदायत सिर्फ उन कश्मीरी युवकों के लिए है, जो इरादतन सेना के काम में दखल देकर दुश्मनों को रक्षा कवच प्रदान करते हैं।
सेना के रिटायर्ड मेजर जनरल अफसर करीम कश्मीर की सुरक्षा रणनीति के मामले में विशेषज्ञ माने जानते हैं। उनका कहना है कि कश्मीरी युवकों में धर्मान्धता को गहरा करने के लिए पाकिस्तान योजनापूर्वक इस्लाम के वहाबी उपदेशकों को कश्मीर भेज रहा है। वहाबी उपदेशक कश्मीरी युवकों में धर्मान्धता का जहर इंजेक्ट करके उन्हें आत्मघाती बना रहे हैं। विकीलीक्स ने भी पिछले दिनों खुलासा किया था कि सऊदी अरब भारत में वहाबी-पंथ के जरिए कट्टर इस्लाम को मजबूत करने के लिए बड़े पैमाने पर फंड प्रदान कर रहा है। उनकी कोशिश है कि कश्मीर के युवक उदार सूफीयाना रास्तों को छोड़कर कट्टर इस्लाम का रास्ता पकड़कर आतंकवाद की गुफाओं में कैद हो जाएं। नफरत के खौलते कढ़ाव में उफनती कट्टरता के इस दौर में केन्द्र सरकार को स्पष्ट रणनीति और संवाद के साथ सामने आना पड़ेगा कि वो सही अर्थों में क्या करना चाहती है। सेनाध्यक्ष का बयान अपनी जगह है, लेकिन उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि आंतकवादी हादसों के दौरान सेना के हाथों नागरिकों की मौत की कहानियों के सिरे अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के कौन से किनारों पर जाकर खुलेंगे? कोई यह याद नहीं रखेगा कि सेना किन मुसीबतों में देश की रक्षा कर रही है? केन्द्र सरकार के माथे पर जहां सैनिकों की मौत का कलंक लगेगा, वहीं उसे आम कश्मीरी युवाओं की हत्या के आरोपों का सामना भी करना पड़ेगा। इसके बाद दुनिया के फलक पर आतंकवाद के बजाय भारत सरकार की नृशंसता की कहानियां ज्यादा गहरी होंगी।
सैन्य अभियानों में सेना की दिक्कतें अपनी जगह हैं, लेकिन सवाल यह है कि थल सेनाध्यक्ष का बयान कहीं अलगावाद का स्थायी भाव बनकर झेलम की लहरों के रंग को बदरंग न कर दे। देश की सुरक्षा व्यवस्था और राष्ट्रवाद की प्राथमिकता निर्विवाद है, लेकिन थल सेनाध्यक्ष के बयान की इबारत में ’बिटवीन द लाइन्स’ उभरने वाली राजनीतिक ध्वनि अवांछनीय महसूस होती है। वैसे भी भाजपा के नेता कश्मीर में शांति के कपोत उड़ाने की आस में पीडीपी के राजनीतिक आकाश में यूं ही उड़ान नहीं भर रहे है? यह काम राजनेताओं के भरोसे छोड़ देना चाहिए।[ लेखक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।]
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