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उमेश त्रिवेदी
यह महज एक संयोग है कि जिस वक्त जेएनयू में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाषणों को निचोड़ कर जीवन के विभिन्न आयामों को संबोधित करने वाले 283 सूत्रों के बहाने मीडिया में मोदी के विचारों का मंगल-गान हो रहा था, ठीक उसी वक्त मेरठ की चुनावी-रैली में उनके नए जुमले ’स्कैम’ को लेकर सोशल-मीडिया में राजनीति का कसैला कोरस-गान चल रहा था। शनिवार को मेरठ की चुनावी रैली में मोदी ने समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पर प्रहार करने के लिए ’स्कैम’ शब्द का इस्तेमाल किया था। ’स्कैम’ के ’एस’ को उन्होंने समाजवादी पार्टी से जोड़ा था, जबकि ’सी’ से कांग्रेस, ’ए’ से अखिलेश और ’एम’ से मायावती को जोड़कर, इन चारों को उखाड़ फेंकने का आव्हान किया था। अखिलेश यादव ने ’स्कैम’ की स्पैलिंग के हिज्जों का इस्तेमाल करते हुए पलटवार किया कि ’सेव कन्ट्री फ्रॉम अमित शाह एण्ड मोदी’। इस जुमले को अखिलेश ने भाजपा की साम्प्रदायिक और बांटने वाली राजनीति से जोड़ा है।
राजनीतिक जुमलों के कोरस-गान से अलग वैचारिक धरातल पर मोदी को महिमा-मंडित करने के लिए दिल्ली के पत्रकार हरीशचन्द्र वर्णवाल ने अपनी नई पुस्तक ’मोदी-सूत्र’ में प्रधानमंत्री मोदी के 283 सूत्रों को पिरोया है। प्रधानमंत्री बनने के बाद पिछले ढाई वर्षों में नरेन्द्र मोदी की जिंदगी की परतों में सुनहरे रंग घोलने वाली लगभग 300 से ज्यादा किताबें विभिन्न स्तरों पर प्रकाशित हो चुकी हैं। यह किताब भी मोदी के भाषणों को खंगाल कर तैयार की गई है। पुस्तक में मोदी के व्यक्तित्व की प्रस्तुति योगी, विचारक, सेवक, शिक्षक, पर्यावरणविद् जैसे अनेक रूपों में सामाजिक-क्रान्ति और सकारात्मक बदलाव के अग्रदूत के रूप में हो रही है। बहरहाल, मोदी भाषणों में अपने विचारों से ज्यादा उन जुमलों की वजह से चर्चा में रहते हैं, जो उनकी राजनीतिक-डिक्शनरी का हिस्सा बने हुए हैं।
प्रधानमंत्री के रूप में ढाई साल के मोदी, राजनीतिक विरोधियों पर प्रहार करने के लिए अभी तक लगभग तीस जुमले और व्याख्याएं लोगों के सामने परोस चुके हैं। शब्दों की चासनी और कटाक्षों के मिर्च-मसालों से युक्त मोदी की इस राजनीतिक-रेसिपी को लोगों ने खूब पसंद भी किया है। मोटे तौर पर मोदी के ये जुमले अंग्रेजी शब्दों का संक्षिप्तीकरण होते हैं। मोदी-डिक्शनरी के इन संक्षिप्त शब्दों ने प्रधानमंत्री मोदी की राजनीतिक-मंशाओं को ताकतवर और तल्ख अभिव्यक्ति देने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है। शब्दों के इन फंडों ने सोशल-मीडिया पर भी जबरदस्त सुर्खियां बटोरी हैं। मोदी ने ’राहुल-सोनिया-वाड्रा-प्रियंका’ की चौकड़ी को ’आरएसवीपी’ में पिरोकर कांग्रेस के परिवारवाद पर जबरदस्त राजनीतिक प्रहार किये थे। उन्होंने यूपीए सरकार के जमाने के घोटाले और घोटालेबाज राबर्ट वाड्रा को ’आदर्श-बोफोर्स-कोल-दामाद’ के ’एबीसीडी’ संक्षिप्तकरण में ढालकर मनोरंजक और चर्चित बना दिया था। अरविंद केजरीवाल को भी मोदी एके-49 कहकर संबोधित करते रहे हैं।
मेरठ की चुनावी रैली में प्रधानमंत्री मोदी अपने भाषण में ’स्कैम’ शब्द का इस्तेमाल करके यह कहना चाहते थे कि अखिलेश-सरकार घोटालों की सरकार है और उत्तर प्रदेश में भाजपा के खिलाफ पार्टियों का जमावड़ा घोटालेबाजों का जमावड़ा ही है। कहना मुश्किल है कि उनके इस जुमले ने जनता के बीच कितना असर पैदा किया, लेकिन शायद यह पहली बार हुआ है कि मोदी का कोई जुमला उतनी ही ताकत से ’रि-बाउन्स’ होकर उन्हीं की महफिल में शोर मचाने लगा है। अखिलेश ने जिस तरीके से मोदी को जवाब दिया, वो भाजपा के राजनीतिक चरित्र पर प्रहार करता है। कांग्रेस ने जुमलेबाजी को नया रूप देते हुए उसे प्रधानमंत्री पद की गरिमा से जोड़ दिया है। देश के प्रथम नेता के नाते प्रधानमंत्री को इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल करना शोभा नहीं देता है। अपने राजनीतिक विरोधियों पर हलके प्रहार करने के बजाय प्रधानमंत्री को सरकार के कार्यकलापों का लेखा-जोखा रखना चाहिए। कांग्रेस का आरोप है कि नोटबंदी की असफलताओं को ढंकने के लिए मोदी इस प्रकार की जुमलेबाजी पर उतर आए। ’स्कैम’ को लेकर सोशल मीडिया पर भाजपा, कांग्रेस और राजनीति के बारे में जुमलेबाजी का नया अध्याय शुरू हो गया है। ट्वीटर पर नए-नए जुमले फुदकने लगे हैं, जिनके कारण राजनीति में ज्यादा प्रदूषण घुलता महसूस हो रहा है, जो किसी के भी हित में नहीं है। [ लेखक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।]
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