मोदी के राजनीति तकाजे और नैतिकता का 'एग्जिट
modi budet

उमेश त्रिवेदी

मोटे तौर पर केन्द्र या राज्य सरकारों के बजट में ज्यादातर लोगों का कौतूहल इतना ही होता है कि अरबों करोड़ रुपए के बजट की आकाश-गंगा से तारों की तरह टूटकर क्या कोई'चवन्नी-अठन्नी' उनके आंगन में भी गिरेगी या नहीं गिरेगी? 'चवन्नी-अठन्नी' का यह गरीब और बदनसीब सपना हर सरकार के 'पोलिटिकल-मैनेजमेंट' का पर्याय है, जिसकी बदौलत राजनीति का पहिया घूमता रहता है।राजनीतिक-प्रबंधन को दुरुस्त रखने की गरज से सरकार के लिए बजट महत्वपूर्ण अवसर होता है। ताजा बजट के बाद देश की आर्थिक-सेहत के मामले में निष्कर्ष पर पहुंचने में अर्थशास्त्रियों को समय लगेगा, लेकिन मोदी के बजट के राजनीतिक मायनों की पड़ताल में आशा-दुराशा के थपेड़े महसूस होने लगे हैं।

मोदी-सरकार ने बजट में ज्यादातर उन चुनौतियों को एड्रेस किया है, जो विमुद्रीकरण के बाद पहाड़ की तरह उग आई हैं। भाजपा के राजनीतिक-डीएनए को मथने वाली इन चुनौतियों के समाधान आसान नही हैं।प्रधानमंत्री ने कहा था कि नोटबंदी भ्रष्टाचार, कालेधन, नकली मुद्रा और आतंकवाद से निपटने के लिए उठाया गया कदम है। लेकिन इसका क्रियान्वयन पचास दिन की 'शार्ट-टर्म' सीमाओं को तोड़ते हुए 'लांग-टर्म' आश्वासन में तब्दील होकर भविष्य की अमूर्त दुनिया का हिस्सा बन गया है।मोदी-सरकार ने नोटबंदी के राजनीतिक आश्वासनों की फिसलन रोकने के लिए बजट के माध्यम से बहुआयामी उपाय किए है। बजट में संयत तरीके से उन धरातलों को मजबूत करने की कोशिशें की गई हैं, जो नोटबंदी की कथित असफलताओं के बाद दरकने लगे हैं।

उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों में हो रहे चुनाव में राजनीतिक लाभ कमाने के प्रत्यक्ष मंसूबे इस बजट में नहीं हैं। मोदी-सरकार ने जन-अपेक्षाओं के उन तकाजों और सवालों को जवाबी-संकेत दिये हैं, जो नैतिकता की जमीन पर खड़े हैं। एक महती कदम राजनीतिक-चंदाखोरी से जुड़ा है। आजादी के 71 वर्ष बाद भी राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता नहीं है। मोदी-सरकार ने तय कर दिया है कि राजनीतिक दल किसी एक व्यक्ति से सिर्फ 2000 रुपए नगद चंदा ले सकेंगे। इससे बड़ी रकम चेक या डिजिटल माध्यम से ही दी जा सकेगी। हर दल को तय सीमा में अपना रिटर्न फाइल करना होगा। नोटबंदी के बाद राजनीतिक पार्टियों के पास जमा नगदी बैंक में जमा कराने के सवाल पर सोशल मीडिया में आलोचनाओँ की आग जंगल की आग की तरह बेकाबू हो चली थी। इसके जवाब में मोदी-सरकार को स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा था। अच्छी बात यह है कि मोदी ने राजनीतिक-चंदे के मुद्दे को हाशिए पर नहीं डाला।

बैंकों के 9 हजार करोड़ रुपए दबाकर विदेश भागने वाले विजय माल्या के सबक को भी नहीं भुलाया गया है। सरकार देश का धन लेकर विदेश भाग जाने वालों की संपत्ति जब्त करने का कानून भी बनाने जा रही है। नोटबंदी से पैदा बेरोजगारी की समस्या से निपटने के लिए मोदी-सरकार ने 48000 करोड़ का प्रावधान करके मनरेगा को ताकत प्रदान की है। मनरेगा से देश में पांच करोड़ लोगों को हर साल रोजगार मिलता है। मनरेगा के संबंध में मोदी के उस राजनीतिक बयान पर हमेशा कटाक्ष होते रहते हैं कि मनरेगा कांग्रेस की विफलताओं का स्मारक है। रियल इस्टेट को रियायतें देकर केन्द्र सरकार ने मजदूरों के रोजगार की राहों का पुनर्निर्माण करने की कोशिश की है। नोटबंदी के कारण रियल इस्टेट में जबरदस्त मंदी आई है।

आयकर के मामले में मध्यम वर्ग को दी जाने वाली रियायत से ज्यादा महत्वपूर्ण एक करोड़ से ज्यादा कमाने वाले सुपर रिच की आय पर 15 प्रतिशत अधिभार है। इस माध्यम से मोदी संदेश देना चाहते हैं कि गरीबों की भलाई के लिए वो अमीरों की जेबों पर हाथ डालने में गुरेज नहीं करेंगे। नोटबंदी के वक्त भी मोदी ने इसी थीसिस को ताकत दी थी कि यह कदम अमीरों के खिलाफ है। गरीबों की खातिर वो अमीरों की तिजोरियों को नंगा कर रहे हैं। भाजपा मूलत: मध्यम वर्ग,बनियों और छोटे व्यापारियों की पार्टी मानी जाती है। 2016-17 के केन्द्रीय बजट में भी उन्होंने किसानों को केन्द्र में रख कर कई प्रावधान किये थे। 2017-18 के बजट में भी नोटबंदी को मोदी ने गरीबों की लड़ाई से जोड़ दिया है। भाजपा का राजनीतिक-डीएनए बदलकर मोदी भारत के भविष्य का राजनीतिक रोडमेप अपने हिसाब से गढ़ना चाहते हैं। [लेखक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।]

 

Dakhal News 5 February 2017

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