बीजेपी में पैसा .... खुदा से कम भी नहीं....
samjay pathak bjp

.राघवेंद्र सिंह

मध्यप्रदेश में कटनी पुलिस अधीक्षक गौरव तिवारी के तबादले के बाद यह शेर खूब चल रहा है कि - पैसा खुदा तो नहीं लेकिन खुदा की कसम खुदा से कम भी नहीं। वैसे यह बात छत्तीसगढ़ के केंद्रीय मंत्री रहे दिवगंत नेता दिलीप सिंह जूदेव ने रिश्वत में पैसे लेते समय कही थी। उनका स्टिंग हुआ था और तब भारतीय राजनीति में तूफान से आ गया था। परिणामस्वरूप मंत्री जी को पद छोडऩा पड़ा। बात अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्वकाल की है तब नैतिकता और सियासत में शुचिता की केवल बातें नहीं होती थीं बल्कि उन पर अमल भी होता था। मंत्री का इस्तीफा उसी का एक प्रमाण मान सकते हैैं। अक्सर कहा जाता है कि - आदमी अपने कर्मों से जाना जाता है क्योंकि अच्छी बातें तो बुरे लोग भी करते हैैं। ऐसे ही राजनीतिक दल भी भ्रष्टाचार हटाओ, गरीब हटाओ, सुशासन लाओ, समाज को भयमुक्त कराओ, अच्छी शिक्षा, अच्छा इलाज जैसे ढेरों बातें करते हैैं, उनके घोषणा पत्र पढ़ें तो थक जायें।

कटनी के पुलिस अधीक्षक तिवारी कांग्र्रेस से भाजपा में आये अरबपति मंत्री संजय पाठक के करीबियों को नोटबंदी के बाद बैैंकों में 500 करोड़ रुपये जमा कराने की जांच कर रहे थे। पुलिस के हाथ मंत्री और उनके करीबियों तक पहुंच गये थे तभी  घटनाक्रम तेजी से बदलता है और कुछ घंटों में तिवारी का तबादला बतौर एसपी छिंदवाड़ा कर दिया जाता है। इसके बाद ही यह मुद्दा आग की तरह पूरे प्रदेश में फैल जाता है। नतीजतन जनता में लोकप्रिय तिवारी के समर्थन में बाजार बंद कर लोग सड़कों पर उतर आते हैैं। मध्यप्रदेश में संभवत: ऐसा पहली मर्तबा हुआ कि भ्रष्टाचार से लड़ रहे एक एसपी को हटाये जाने पर लोग दलबंदी से ऊपर उठ सड़क पर उतर आते हैैं। मुख्यमंत्री के सुरक्षा दस्ते में पुलिस अधीक्षक रहे शशिकांत शुक्ला को इस आग को ठंडा करने के लिये बर्फ के गोले की तरह कटनी में पदस्थ किया जाता है। सीएम के साथ वह रहे हैैं सो पुलिस के साथ उन्हें सियासी दावपेंच भी पता हैैं। सो वे कहते हैैं यह रायता पुलिस ने फैलाया  है तो समेटेगी भी पुलिस ही। जो जांच अंजाम तक पहुंच रही थी उसे नये एंगल से जांचा परखा जा रहा है। ऐसे में पुलिस प्रशासन को यह साफ करने की जरूरत होगी कि गौरव तिवारी के जांच सही थी या गलत। अगर तिवारी की जांच सही थी तो आरोपी गिरफ्तार क्यों नहीं किये जा रहे हैैं। कटनी की जनता भोपाल और दिल्ली में बैठे सियासी ठेकेदारों से ज्यादा जानती है अपने नुमाइंदे और उनके कारोबार को।

आरोपों से घिरे मंत्री संजय पाठक की मुलाकात के बाद  मुख्यमंत्री का महत्वपूर्ण बयान आता है कि आरोपों के आधार पर किसी को हटाया नहीं जायेगा इससे श्री पाठक का मंत्री पद तो सुरक्षित मान लिया जाये लेकिन सरकार और संगठन जरूर सांसत में आ गये हैैं। इसके पहले कुछ मंत्री आरोपों के चलते पदों से रुखसत कर दिये गये थे। इनमें अजय विश्वनोई ने साफ कहा है कि उनके यहां इनकम टैक्स की कार्रवाई होने पर ही इस्तीफा दे दिया था क्योंकि मैैं नहीं चाहता था कि पार्टी की प्रतिष्ठा को आंच आये। पार्टी में अब ऐसे नये लोग हैैं जिन्हें पार्टी से कम खुद से ज्यादा मतलब है। इसके अलावा व्यापमं घोटाले के आरोपी मंत्री रहे लक्ष्मीकांत शर्मा को मंत्री पद से क्या पार्टी से ही बेदखल कर दिया गया था। इसी तरह एक सेक्स स्केंडल के आरोप में भी भाजपा के मंत्री को पद और पार्टी दोनों से विदा कर दिया गया था। हमारा मकसद किसी का समर्थन या विरोध करना नहीं है लेकिन हम यह समझने की कोशिश कर रहे हैैं कि कैसे मौके पडऩे पर दो और दो पांच हो जाते हैैं। मामला सीधा नोटबंदी के बाद बेनामी तरीके से करीब 500 करोड़ बैैंक में जमा करने की जांच का है और जन दबाव में मुख्यमंत्री ने ईमानदारी साबित करने के लिये ऐलान कर दिया प्रवर्तन निदेशालय से जांच कराने का। अब इस पर भी सवाल हो रहे हैैं क्योंकि बैैंक में जमा कराने का मसला निदेशालय से जुड़ा हुआ नहीं है। आरोपी मंत्री को सरकार टस से मस करने को राजी नहीं है बात वहीं आती है...पैसा खुदा तो नहीं है लेकिन....

इस पूरे मसले में कटनी से छिंदवाड़ा भेजे गये तिवारी का गौरव तो नहीं लौट सका मगर सरकार के लिये यह प्रतिष्ठा का प्रश्न जरूर बन गया है। कटनी में जो बातें हो रही हैैं उसका लब्बोलुआव यह है कि भाजपा और सरकार ईमानदार है तो फिर उनके आसपास बेईमान क्यों हैैं? कहां हैैं भ्रष्टाचार और नफरमानियों  को लेकर जीरो टालरेंस।  बनारस और पंडितों से ताल्लुक रखने वाले गौरव तिवारी का ट्रांसफर यूपी चुनाव में सपा, बसपा और कांग्र्रेस के लिये मुद्दा हो सकता है। मामला भ्रष्टाचार, कालेधन और हवाला से जुड़ रहा है इसलिये पंजाब में आप पार्टी भी इसे चुनाव में परवान चढ़ा सकती है। फिर इस सबसे मोदी और शिवराज की ईमानदार छवि को धक्का लग सकता है। ऐसे में मोदी एक राज्य के दलबदलू मंत्री के चक्कर में अपनी साख पर बïट्टा क्यों लगवायें? हालांकि यह सब भविष्य की बातें हैैं मगर मध्यप्रदेश के इस घटनाक्रम पर भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व और संघ परिवार बारीक नजर रखे हुये हैैं। लगता है संजय पाठक की सियासी कुंडली भी कम उतार चढ़ाव वाली नहीं है कांग्र्रेस से भाजपा की यात्रा और संघ परिवार के विरोध के बाद भी मंत्री पद मिलने तक तो ठीक लेकिन बैैंकों में नोट जमा करने के बाद उनका समय ऐसा चल रहा है जैसे ऊंट पर बैठे आदमी को कुत्ता काट ले। बात उनके मंत्री पद छिनने तक की हो रही है। भाजपा और सरकार भी उनकी वकालत जिस ढंग से कर रही है वह भी कुल्हाड़ी से रूई धुनने जैसा है। गौरव तिवारी का तबादला जिस प्रशासनिक नौसिखयेपन से किया गया मुश्किलें वहीं से शुरु हुई हैैं। थोड़ी चतुराई और कूटनीतिक बुद्धि सरकार के मैनेजरों ने लगाई होती तो मुख्यमंत्री और भाजपा की साख दांव पर नहीं लगती। संगठन और सरकार के दोनों चौहानों से जनता और हाईकमान में सवाल उठ रहे हैैं। कटनी की जनता सड़क पर है और मुखियाओं के बचाव में कोई नेता नहीं आ रहे हैैं।  नीयत पर शक कर रहा कार्यकर्ता खामोश है। प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे भी सवालों के दायरे में हैैं कि आखिर उनके रहते यह सब क्या हो रहा है। हमारी तो इन सबसे सहानुभूति है ये बेचारे ईमानदार और जनसमर्पित हैैं, कई बार इन्होंने गंभीर आरोपों का भी दूध का दूध और पानी का पानी कर उलझे मसलों को सुलझाने में विशेषज्ञता हासिल है, मगर जल्दबाजी में तिवारी का गौरव लेने से रायता फैल गया है।  संजय पाठक परेशानी में हैैं। वे लोकप्रिय न होते तो कांग्र्रेस और फिर भाजपा से विधायक कैसे बनते? ताकतवर न होते तो संघ के विरोध के बावजूद मंत्री कैसे बन पाते। हम ज्योतिषी तो नहीं हैैं लेकिन परिस्थितिवश कभी पाठक को कांग्र्रेस से चुनाव लडऩा पड़ा तो हम उनको चुनाव जीतते हुये देखेंगे। लोकतंत्र में पैमाना भी चुनाव जीतना ही होता है। कांग्र्रेस भी भाजपा का विरोध करते करते लगता है हार गई है तो उसने भी तय कर लिया है कि हवा के खिलाफ चलने का कोई फायदा नहीं। तभी तो न तो नोटबंदी में कोई बड़ा आंदोलन किया और न कटनी में सड़कों पर उतरी जनता को नेतृत्व दे पायी। उसे लगता है जब जनता ही  भाजपा को नजर और दिल से हटायेगी तभी कुछ होगा। फालतू में पसीना क्यों बहाया जाये। जनता या भाजपा कभी तो एक दूसरे से उकतायेंगे। कांग्र्रेस को ऐसा ब्रह्मïज्ञान प्राप्त हो गया है। सो वे उसी रास्ते पर चल रही है। चुनाव न होने से हाईकमान के एजेंडे में वैसे भी मध्यप्रदेश है नहीं। आधुनिक तकनीक का जमाना है इसलिये चुनाव की प्यास लगेगी तब कुआं खोद लिया जायेगा। राहुल बाबा के पास ऐसी टीम भी है। अभी से लीडर तय करना, फ्रीहेंड देना, संगठन को सक्रिय करना, जनता के बीच जाना, सब बेकार की बातें हैैं। क्रिकेट में 20-20 हो रहा है और 21वीं सदी में कांग्र्रेस उसके भी आगे की तैयारी में है।

 

Dakhal News 18 January 2017

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