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उमेश त्रिवेदी
खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग के नए कैलेण्डर और टेबल डायरी में महात्मा गांधी की तर्ज पर मौजूद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तस्वीर क्या इतने बड़े राजनीतिक वितंडावाद और बयानबाजी का सबब होना चाहिए, जिसमें देश का बौद्धिक-समाज उलझा है? इसका सीधा, सपाट और स्पष्ट उत्तर देना कठिन है। जवाब विवादों से परे इसलिए नहीं हो सकता कि यह घटना राजनीतिक मनोविज्ञान के कई किनारों को स्पर्श करती है। इसे महज राजनीतिक-कर्मकाण्ड का हिस्सा मानकर समाज दरगुजर नहीं करना चाहेगा। मोदी के मातृ-संगठन आरएसएस और भाजपा में गांधी-भावना हमेशा दुर्भावना से लक्षित रही है। नोट से भी गांधी को हटाने के संबंध में हरियाणा के मंत्री अनिल विज का बयान उनके समर्थकों के मानस में गहरे जमे गांधी-विरोधी संस्कारों और सरोकारों की ताजा मिसाल है। यह दर्शाता है कि राजनीति की खोल के नीचे कैसे सोचा-विचारा जा रहा है? सार्वजनिक जीवन में गांधी और उनके विचारों के साथ व्यभिचार के किस्से सत्तासीनों के करतबों में आए दिन देखने को मिलते रहते हैं। फैंसी-ड्रेस स्टाइल में मोदी की गांधीवादी-अनुकृति पहली घटना नहीं है।
सवाल यह है कि आरएसएस की ‘आइडियोलॉजी’ के समानान्तर यदि नरेन्द्र मोदी ‘गांधी- जैसे’ या गांधीवाद के प्रचारक भी होना चाहते हैं, तो उसमें किसी को ऐतराज क्यों होना चाहिए? क्या यह अवसर नहीं है कि, लोग उन पर गांधीवाद का प्रचारक होने के नाते, कसौटियां निर्धारित करते कि वो गांधीवादी विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए अब और क्या करने वाले हैं? मोदी-कैलेण्डर के पक्ष में तर्क दिया गया है कि उनके एकमात्र आव्हान से देश में खादी की खपत में 34 प्रतिशत इजाफा हो गया है। क्या खादी के मामले में गांधी का परचम फहराने वाले गांधीवादी मोदी हिन्दू-मुस्लिमों के बीच वितृष्णा और नफरत की खाइयों को पाटने के लिए ऐसा ही आव्हान करेंगे... सुनिश्चित करेंगे कि भविष्य में दादरी जैसे कांडों की पुनरावृत्ति नहीं हो... असहिष्णुता के सवालों के उदार उत्तरों की मिसाल कायम करेंगे?
भारत का राजनीतिक-मानस बखूबी समझता है कि सार्वजनिक जीवन के विभिन्न घटकों में कभी-कभार गांधी जैसा हो जाने और ताउम्र गांधी बनकर जीने में जमीन-आसमान का फर्क है। गांधी सशरीर अमूर्त विचारों में ढल कर, पिघल कर जिंदगी के प्रवाहों को जीते थे। सशरीर गांधी और उनके अमूर्त विचारों में कोई विरोधाभास नहीं था। गांधी होना और गांधीवादी होना अलग अलग विषय हैं। देश में लंबे समय से छद्म गांधीवाद के नाम से राजनीतिक-कारोबार चल रहा है। कांग्रेस के बाद बजरिए मोदी अब भाजपा भी गांधी के ताबीज बेचना चाहती है। कांग्रेस की मुश्किल दीगर है। भले ही गांधी कांग्रेस की परम्परा में रचे-बसे हों, लेकिन गांधी पर उसका कॉपी-राइट नहीं है। इसीलिए स्वच्छ भारत अभियान के बाद मोदी अपने खादीवादी उपक्रम से कांग्रेस को नीचा दिखाने का प्रयास कर रहे हैं।
खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग के नए कैलेण्डर और टेबल डायरी में चरखे के सामने विराजमान प्रधानमंत्री मोदी की राजनीतिक गांधी-लीला ने मोदी को नए विवादों में ढकेल दिया है। जिस प्रकार राम-लीला या कृष्ण-लीला में राम अथवा कृष्ण का अभिनय करने वाला व्यक्ति वास्तविक जीवन में राम-कृष्ण नहीं हो सकता, वैसे ही चरखे के सामने बैठकर गांधी-लीला करने वाले नरेन्द्र मोदी के व्यक्तित्व में गांधी-तत्व की नैतिक-स्वर्णिमा घुलने की संभावना नगण्य है। लेकिन मोदी की गांधी-लीला के बाद निर्विवादित है कि गांधी-तत्व का कोई विकल्प भारत में राजनीतिक-दलों के पास नहीं है। गांधीवादी परम्परा के राजनेताओं से नहीं पूछा जाएगा कि वो कैसे गांधीवादी हैं, लेकिन मोदी से जरूर सवाल होंगे कि वो क्यों और कैसे गांधीवादी हो गए? भले ही मोदी चरखे के सामने गांधी-मुद्रा में बैठकर कितने ही खूबसूरत फोटो खिंचवा लें, लेकिन गांधीवादी राजनीति के नए अवतार में नरेन्द्र मोदी को स्वीकृति मिलना आसान नहीं है। इस दिशा में उनकी कसौटियां और चुनौतियां ज्यादा कठिन और दुरूह हैं। फिर लोग यह विश्वास क्यों करने लगें कि महात्मा गांधी सहसा नरेन्द्र मोदी के निस्वार्थ रोल-मॉडल कैसे हो सकते हैं? उनका गांधीवादी रुझान चौंकाता और चकित करता है। [ लेखक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।]
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