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काले धन पर नोटबंदी की सर्जिकल स्ट्राइक के शोर में हो रहे विधानसभा चुनावों में चुनाव आयोग भी कई ऐसी पहल करने जा रहा है, जो काले धन और अनाप-शनाप खर्च को नियंत्रित रख चुनावी शुचिता की दिशा में कारगर कदम साबित हो सकती हैं। चुनाव खर्च की सीमा पहले से तय है, लेकिन इसे कागजों पर ही सीमित रखते हुए उम्मीदवार किस तरह अनाप-शनाप खर्च करते हैं, इसका सबसे बड़ा उदाहरण भाजपा के दिवंगत नेता गोपीनाथ मुंडे की करोड़ों रुपये खर्च करने की स्वीकारोक्ति है। इस कागजी हेराफेरी को रोकने के लिए चुनाव आयोग ने अगले महीने होने जा रहे पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के लिए निर्देश दिये हैं कि उम्मीदवार चुनाव खर्च के लिए पृथक बैंक एकाउंट खोलें। यही नहीं, उन्हें 20 हजार रुपये से अधिक के भुगतान भी चेक द्वारा करने को कहा गया है। इसके अलावा आयोग उम्मीदवार और उसके राजनीतिक दल द्वारा विभिन्न मदों में किये गये खर्च पर भी बारीक नजर रखेगा, ताकि इन्हें अलग-अलग दिखाकर चुनाव खर्च की सीमा को धता न बतायी जा सके। ध्यान रहे कि हाल ही में आयोग ने 255 ऐसे पंजीकृत राजनीतिक दलों को पंजीकृत सूची से बाहर करते हुए प्रवर्तन निदेशालय को उनकी जांच करने को कहा है, जो 2005 से 2015 के बीच कोई चुनाव ही नहीं लड़े। आयोग को आशंका है कि ऐसे दलों का गठन काले धन को सफेद करने के लिए किया जाता है, क्योंकि राजनीतिक दलों को चंदे समेत विभिन्न स्रोतों से प्राप्त आय पर आयकर समेत कई तरह की छूट प्राप्त हैं।
दरअसल आशंका तो यह भी है कि कुछ प्रमुख राजनीतिक दल भी ऐसे दलों के गठन के जरिये इस गोरखधंधे में लिप्त हों। भ्रष्टाचार और काले धन के ऐसे सुनियोजित तंत्र पर नियंत्रण के लिए चुनाव आयोग के सीमित अधिकारों के मद्देनजर निश्चय ही उपरोक्त कदम चुनावी शुचिता की दिशा में बड़ी पहल कहे जा सकते हैं। अन्य क्षेत्रों के अलावा मीडिया में भी राजनेताओं की घुसपैठ हो चुकी है। इसलिए चुनाव आयोग राजनेताओं के स्वामित्व वाले टीवी चैनलों पर दलों के प्रचार-समय पर भी नजर रखेगा। चुनाव प्रचार के दौरान मंत्रियों द्वारा प्रचार और अपने सरकारी कार्यक्रमों में घालमेल कर सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग को रोकने के लिए भी इस बार आयोग ज्यादा सतर्क नजर आ रहा है। मतदाताओं की सुविधा की दृष्टि से भी आयोग ने इस बार कुछ नयी पहल की हैं। मसलन, कोई गलतफहमी न हो, इसलिए इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन पर चुनाव चिन्ह के साथ ही उम्मीदवार का फोटो भी होगा। मतदाताओं को भी उनके फोटो वाली मतदान पर्ची उपलब्ध करायी जायेगी। मतदान केंद्रों पर भी उनका मार्गदर्शन करने वाले पोस्टर लगे होंगे, तो दिव्यांग मतदाताओं के लिए भी खास प्रबंध किये जायेंगे। इस सजगता और सक्रियता से आयोग की गंभीरता का संकेत मिलता है। अगर राजनीतिक दल आम राय बनाकर चुनाव सुधारों की पहल करें तो चुनाव प्रक्रिया की शुचिता मुश्किल हरगिज नहीं है।
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