Patrakar Vandana Singh
अनुराग उपाध्याय
इसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए सत्ता का सेमीफाइनल माना जा सकता है। इस साल पांच राज्यों में चुनाव और उसके बाद अगले साल मध्यप्रदेश ,छत्तीसगढ़ ,राजस्थान जैसे राज्यों में चुनाव। मोदी के कामों का जनता पर क्या असर है इन चुनावों के जरिये उसकी बानगी भी देखने को मिलेगी।
चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के साथ ही पंजाब और उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज गया है। जैसी कि उम्मीद थी, देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में सात चरणों में मतदान होगा। मतदान का पहला चरण 11 फरवरी को होगा, जबकि आखिरी 8 मार्च को। पंजाब और गोवा में एक ही दिन 4 फरवरी को वोट डाले जायेंगे, जबकि उत्तराखंड में 15 फरवरी को। पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में दो चरणों में 4 और 8 मार्च को मतदान होगा। मतगणना सभी पांच राज्यों में 11 मार्च को होगी और दोपहर बाद तक परिणाम भी आ जायेंगे। हालांकि चुनाव कार्यक्रम अपेक्षा के अनुरूप ही है, लेकिन शुरुआत शायद कुछ पहले हो रही है। पंजाब और गोवा में 4 फरवरी को मतदान होगा, जबकि केंद्र सरकार ने 1 फरवरी को बजट पेश करने की योजना बनायी है। विपक्षी दलों को आशंका है कि लोकलुभावन बजट के जरिये भाजपानीत राजग मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश कर सकता है। सामान्यत: चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के साथ ही आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू हो जाती है, ऐसे में केंद्रीय बजट के प्रावधानों पर सभी की नजरें रहेंगी। वर्ष 2017 के शुरू में ही होने जा रहे ये विधानसभा चुनाव इन राज्यों की भावी सरकार का ही फैसला नहीं करेंगे, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति का संकेतक भी होंगे।
जिन पांच राज्यों में चुनाव होने जा रहे हैं, उनमें से पंजाब और गोवा में राजग सरकार है, जबकि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी सत्ता में है। मणिपुर में कांग्रेस की सरकार है। फिर भी ये चुनाव सबसे ज्यादा अहम भाजपा के लिए ही होंगे। उसे न सिर्फ गोवा की सरकार बचानी होगी, बल्कि पंजाब में भी अपने वरिष्ठ भागीदार शिरोमणि अकाली दल के साथ मिलकर सत्ता विरोधी भावना पर विजय पानी होगी। एक अजब संयोग यह है कि पंजाब और गोवा में अकसर कांग्रेस ही सत्ता की दूसरी दावेदार रही है, लेकिन इस बार आम आदमी पार्टी चुनावी संघर्ष को त्रिकोणीय बना रही है। इसलिए भी चुनाव परिणामों की बाबत कोई पूर्वानुमान लगा पाना आसान नहीं होगा। उधर उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ सपा के अंतर्कलह ने चुनावी समीकरणों को और भी उलझा दिया है। पिछले विधानसभा चुनाव तक उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा ही सत्ता की मुख्य दावेदार रही हैं, लेकिन लोकसभा चुनाव में 80 में से 73 सीटें जीतने के बाद भाजपा के हौसले बुलंद हैं। राज्यसभा में अल्पमत से उबरने के लिए भाजपा उत्तर प्रदेश में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहेगी। उधर कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल सरीखे छोटे दलों की रणनीति सपा पर कब्जे को लेकर मुलायम सिंह यादव और उनके मुख्यमंत्री पुत्र अखिलेश के बीच जारी कलह के परिणामों पर टिकी है। अनशन का रिकॉर्ड बनाने वाली सामाजिक कार्यकर्ता इरोम शर्मिला की पार्टी मणिपुर के चुनाव में एक बड़ा आकर्षण होगी।
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