कैलाश्ाचंद्र पंत
काल चक्र की गति विचित्र होती है। इसे समझ पाने में बुद्धिमान मनुष्य भी असमर्थ रहते हैं। आज से सौ-दो सौ वर्ष पहले ही बहुतेरे विद्वान भारत की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक बदहाली पर केवल आंसू बहाते थे। कुछ लोग मान बैठे थे कि भारत का भविष्य यूरोपीय सभ्यता से जुड़कर ही संवरेगा। ऐसी निराशा छाई थी कि अनेक लोगों ने ब्रिटिश सरकार से लाभ पाने के लिए धर्म परिवर्तन किया और ईसाई बन गए थे। वे इतने ज्यादा आत्महीनता के शिकार हो चुके थे कि अपने देश के अतीत, संस्कृति, धर्म, ज्ञान, सभी को पिछड़ा, बर्बर, अन्यायी और न जाने क्या-क्या कहकर धिक्कारने में भी लजाते नहीं थे। मगर उस भीषण दौर में भी कुछ अच्छे संकेत मिलने लगे थे। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के असफल हो जाने के बावजूद सिर्फ 25 साल बाद ही बंकिम बाबू ने वंदे मातरम् गीत लिखा जो स्वतंत्रता संग्राम का बीज-मंत्र बन गया। उसी बंगाल से स्वामी विवेकानंद और श्री अरविंद (भारतीय ऋ षि परंपरा के दो आधुनिक नक्षत्र) भारत की बौद्धिकता, दर्शन, संस्कृति की श्रेष्ठता का शंखनाद करते हैं। इन दोनों ने भारत संबंधी पश्चिमी धारणा की दिशा बदल दी थी। जिस समय भारतीय परिपे्रक्ष्य में यह उथल-पुथल चल रही थी, तब श्रेष्ठता का डंका पीटने वाला यूरोप वैचारिक द्वंद्व और संघर्ष में उलझा हुआ था। बाद में भी पश्चिम ने मशीनी तरक्की तो की, लेकिन तबसे अब तक वह अंतर्विरोधों, वैचारिक उलझनों में उलझा हुआ है।
दुनिया के समक्ष मौजूद इस अंतर्विरोध व अंतर्संघर्ष के कारण ही विश्व की दृष्टि अचानक भारत की ओर जा रही है। आज उस एकात्म मानववाद पर विमर्श हो रहा है जिसे पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अपने लंबे अनुभव व अध्ययन के बाद 1967 में कालीकट के जनसंघ के अधिवेशन में प्रस्तुत किया था। 20वीं सदी के प्रथम दशक में हमारे समय के सबसे बड़े दार्शनिक श्री अरविंद ने भविष्यवाणी की थी कि भारत ही दुनिया को नई राह दिखाएगा। उनकी वाणी एक सदी बाद अब सच होती दिखाई दे रही है। आज पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानव दर्शन सर्वाधिक चर्चित विषय है। क्यों है? क्योंकि इसमें कुछ नया है जिससे विश्व अपरिचित ही रहा है। क्योंकि मनुष्य पर केंद्रित कोई भी विचार 'मानव" का समग्रता से विचार किए बिना अधूरा है। उपाध्यायजी ने उसका विचार किया है। मानव की अवधारणा पर बात करते हुए दीनदयालजी भारतीय दर्शन की ओर देखते हैं। आद्यगुरू शंकराचार्य की अद्वैत संबंधी व्याख्या उन्हं चमत्कृत करती है। एकात्मता का दर्शन वहीं से उत्पन्न् होता है। लेकिन राजनीति में उसका व्यावहारिक प्रतिफलन कैसे होगा, यह विचार पंडितजी ही कर सके थे। दीनदयालजी के राजनीतिक अनुयायियों के समक्ष यह चुनौती है कि वे उस दर्शन को राज्य की नीतियों पर लागू करें। उसकी व्यावहारिक परिणति पर विश्व की नजरें टिक चुकी हैं, इसलिए चुनौती ज्यादा कठिन है। यह कालचक्र का ही प्रभाव है कि उसने उन सब लोगों को अग्नि परीक्षा देने का अवसर जुटा दिया है जो भारत, भारतीयता और भारतीय संस्कृति का उद्घोष करते हैं। यदि वे सफल रहते हैं तो मानवता को उस अनिश्चितता, असुरक्षा और बेचैनी से उबारा जा सकता है, जिसकी वह शिकार है।
एकात्म मानव दर्शन की व्याख्या करते हुए पंडितजी प्रकृति व मनुष्य के बीच समन्वय को रेखांकित करते हैं। वे प्राकृत वृत्तियों का विश्लेषण करते हुए कहते हैं- राष्ट्रीयता कोई कृत्रिम वस्तु नहीं, यह तो गौरव का स्वाभाविक बोध है। इस स्वाभाविक प्रवृति को ही भारतीय शास्त्रकारों ने चिति का नाम दिया है। जो चिति के प्रतिकूल होगा, उसे विकृति कहते हैं। यह संस्कृति तत्व ही राष्ट्रीयत्व का नियामक है। मजहब एवं राजनीति के प्रवेश ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अस्मिताओं को आहत किया है।
हमारी मान्यता वसुधैव कुटुम्बकम की रही है। कुटुम्ब तभी जुटता है जब आर्थिक, शैक्षिक, राजनीतिक, वर्गभेद के खांचों से बाहर निकलकर सोचा जाता है। ऐसे में युद्ध, पूंजीवाद सहित अन्य वर्तमान व्यवस्थाओं से निराश विश्व को एकात्म मानव दर्शन एक नया मार्ग सुझाता है, जिसमें व्यक्ति के विराट बन जाने की संभावना निहित है। ऐसा लगता है कि कालचक्र ने भारत को पुन: विश्व का वैचारिक केंद्र बनने का अवसर सुलभ करा दिया है। (लेखक मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के मंत्री व संचालक हैं)