कंटीली वाणी और संजीदा बड़प्पन का संगम
सुन्दरलालजी पटवा

उमेश त्रिवेदी

यह कठोर सच्चाई है कि मीडिया की दुनिया में मशगूल खबरनवीसों की जिंदगी में इस प्रकार की घटनाएं महज एक खबर होती हैं, लेकिन पता नहीं क्यों, भाजपा के वयोवृद्ध नेता सुन्दरलालजी पटवा के अवसान की सूचना महज एक खबर की तरह महसूस नहीं हुई। अन्तर-मन में गहरे तक सिहरन की टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें घोलती इस खबर ने कुछ पलों के लिए असामान्य सा कर दिया। यह सूचना जहन के अनेक कोनों को कुरेदते हुए जिंदगी के उन सिरों को टटोलती सी महसूस हुई, जिसकी बुनियाद में पटवाजी के अपनेपन की गरम हवाओं का एहसास था, रिश्तों का अजीबोगरीब रेशमी आभास था और एक जिद्दी बूढ़े जैसा खड़ूस विश्‍वास था। पटवाजी की जिंदगी की राजनीतिक-किस्सागोई के रंगों को उनके जीवन-वृत्त में अलग-अलग तरीके से उकेरा जाएगा। जीवन को एक नैसर्गिक ठसक के साथ जीने का सलीका पटवाजी की खासियत थी, जो आजीवन उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बनी रही। नजाकत और नफासत का यह पुट पटवाजी के राजनीतिक-जीवन में नजर आता है। पटवाजी के जिंदगीनामे का निचोड़ यही है कि उन्होंने हमेशा अपनी शर्तों पर जीना पसंद किया।  राजनीति को उन्होंने अपनी शर्तों से डिक्टेट किया, और जिंदगी की हारी-बीमारी में हर मुसीबत का मुकाबला अपने जिद और जुनून से किया। 

भाजपा और कांग्रेस में उनके समकालीन राजनेताओं के खट्टे-मीठे अनुभव की लंबी कथाएं किसी से छिपी नहीं हैं। लेकिन एक पत्रकार के रूप में उनका सान्निध्य कई बेबाक और बिंदास यादों को ताजा करता है। सार्वजनिक जीवन में ’राजनीतिक-मॉडलिंग’ का अपना महत्व है। सादगी, ईमानदारी, कठोरता, विनम्रता और विनयशीलता के आभूषणों से अपने राजनीतिक व्यक्तित्व को संजोना और सजाना सार्वजनिक जीवन की सामान्य प्रक्रियाएं हैं। सुन्दरलाल पटवा सार्वजनिक जीवन में सस्ती लोकप्रियता के ’राजनीतिक-प्रोटोकॉल’ की कभी भी ज्यादा परवाह करते नजर नहीं आए। खरे-खोटे अथवा अच्छे-बुरे को नापने की अपनी कसौटियां थीं, जिसके आधार पर वो अपनी पसंद और नापसंद को सुनिश्‍चित करते थे। लेकिन राजनीति के ’रैम्प’ पर अपने राजनीतिक-बांकेपन के कारण वो अपने समकालीन नेताओं के मुकाबले हमेशा अलग नजर आते थे। मैं उनके राजनीतिक टेढ़ेपन की अदाओं का मुरीद था। राजनीतिक-टेढ़ेपन की यह कहानी अहंकार, तिरस्कार अथवा बदमिजाजी का सबब नहीं है, बल्कि उनकी संस्कारगत दृढ़ता, प्रतिबद्धता और पसंदगी को रेखांकित करने वाली है। पटवाजी की जीवन-शैली में घुली राजनीतिक-प्रशासनिक खूबियों में उनकी बिंदास-बेबाकी का लोहा उन्हें दीगर राजनेताओं की बिरादरी में सबसे अव्वल खड़ा करता था। मोटे तौर पर राजनेता विवादों और अप्रिय प्रसंगों को टालते हैं। इससे उलट पटवाजी की राजनैतिक शैली में साफगोई का वह पराक्रम हमेशा नजर आता था, जो आज की राजनीति में बिरला हो चुका है। उनके नजदीक भले-बुरे की अपनी कसौटियों का महत्व ज्यादा था। यह नामजद किस्सों को बयान करने का उपयुक्त अवसर नहीं है, लेकिन मैंने कई मौकों पर उन्हें महत्वपूर्ण समझे जाने वाले व्यक्तियों के सिफारिशी मिजाज को दुरुस्त करते हुए व्यक्तिश: देखा है। राजनीतिक-दबाव और गैर-वाजिब कामों के आगे घुटने टेकना उन्हें कबूल नहीं था।  

मीडिया से उनके रिश्तों की खट्टी-मीठी कहानियां किसी से छिपी नहीं हैं। वो मीडिया और ’मीडिया-पर्सन्स’ का आकलन गुणवत्ता के आधार पर करते थे। उनके मन में यह खौफ कभी नहीं रहा कि बड़े मीडिया हाउस से जुड़े व्यक्तियों को ज्यादा तवज्जो दी जानी चाहिए या मीडिया संस्थानों के संचालकों की ज्यादा कद्र की जाना चाहिए। ’आइडियॉलाजी’ के दबाव को वो हमेशा दरकिनार करते थे।

भावाभिव्यक्ति की अतिरंजनाओं अथवा औपचारिकताओं के लफड़ों से अलग राजनीतिक और सामाजिक सक्रियता के लिहाज से 92 साल की उम्र में सुन्दरलाल पटवा का चले जाना या उनका हमारे बीच नहीं होना ज्यादा सूनापन या प्रलाप पैदा करने वाला घटनाक्रम नहीं है। पिछले दस-बारह सालों से सार्वजनिक जीवन में उनकी दैनन्दिन-सक्रियता या हस्तक्षेप फिल्मों के अतिथि कलाकारों जितना रह गया था। फिल्मों में गेस्ट-आर्टिस्ट का आगमन या उपस्थिति फिल्मों की ’कॉमर्शियल-वेल्यू’ बढ़ाने का उपक्रम होता है, वैसे ही मध्यप्रदेश की राजनीति में पटवा का ’अपीरंस’ या आगमन उन नेताओं की विश्‍वसनीयता के ध्वजारोहण के लिए होता था, जो यह जताना चाहते हैं कि रिश्तों के लिहाज से उनकी जमीनें पोली नहीं हैं। सुन्दरलाल पटवा देश और मध्य प्रदेश में भाजपा का वह ’राजनीतिक-फेब्रिक’ हैं, जिसकी ’ब्राण्ड-वैल्यू’ के नजदीक पहुंचना भी कठिन और दुरूह कार्य है। पटवा राजनीति के उन सिरों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जहां रिश्तों की महीन दुनिया सार्वजनिक जीवन को समृद्ध करती है। मुख्यमंत्री के आभा मंडल के गोलाकार वृत्त को पटवाजी ने कभी भी खंडित नहीं होने दिया, लेकिन उनके गर्वीलेपन में संवेदनाओं के सितारे जड़े थे, जिनमें जिंदगी की हर क्षेत्र की अच्छाइयां झिलमिलाती थीं। उनकी कंटीली वाणी, नैसर्गिक ठसक और संजीदा बड़प्पन का मुकाम लोग आसानी से भुला नहीं पाएंगे।[लेखक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।]

 

Dakhal News 29 December 2016

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