Patrakar Vandana Singh
अनुराग उपाध्याय
नोटबंदी पर प्रधानमंत्री द्वारा मांगे गये 50 दिन भी पूरे होने वाले हैं, पर स्थिति सामान्य से अभी भी बहुत दूर है। ऐसे में राहुल गांधी और ममता बनर्जी सरीखे राजनीतिक विरोधियों के वार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर लगातार तीखे होते जा रहे हैं तो उसमें आश्चर्य कैसा? 8 नवंबर की रात भ्रष्टाचार और काले धन पर प्रहार के रूप में 500 और 1000 रुपये के नोट बंद करने का ऐलान करते हुए प्रधानमंत्री ने दो-तीन सप्ताह में स्थिति सामान्य होने का आश्वासन दिया था। बाद में इस अवधि में बदलाव होते रहे। बदलाव पुराने नोट जमा करने और नयी करंसी निकासी संबंधी नियमों में भी कम नहीं हुआ, लेकिन बैंक-एटीएम से अपना ही धन निकालने के लिए कतारों में लगे आम आदमी की मुश्किलें कम होती नजर नहीं आयीं। बार-बार नियमों में बदलाव सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा संभावित स्थिति के गलत आकलन का ही परिणाम था, लेकिन प्रधानमंत्री ने इसे अपनी सरकार की संवेदनशीलता के रूप में पेश करना पसंद किया। अब जबकि बैंक-डाकघरों से 500-1000 रुपये के पुराने नोट बदलने की अवधि भी आज समाप्त होने जा रही है, यह सवाल अपेक्षित ही है कि नोटबंदी से काले धन पर प्रहार का लक्ष्य कितना हासिल किया जा सका।
आंकड़े बताते हैं कि 500-1000 रुपये के जितने नोट प्रचलन में थे, उनमें से 80 प्रतिशत से अधिक बैंकों-डाकघरों में वापस आ गये। 30 दिसंबर को बैंक-डाकघर में पुराने नोट जमा करवाने की अवधि समाप्त हो जाने के बाद 31 मार्च, 2017 तक रिजर्व बैंक में ये नोट जमा कराये जा सकेंगे। संभव है कि पुराने नोटों की वापसी का आंकड़ा 90 प्रतिशत के आसपास पहुंच जाये। अब यह स्वाभाविक सवाल अनुत्तरित है कि उस काले धन का क्या हुआ, जिसके खात्मे के लिए नोटबंदी का कदम उठाया गया था? बेशक सरकार ने 31 मार्च के बाद 500-1000 के 10 से अधिक पुराने नोट पाये जाने पर सजा और जुर्माने के प्रावधान वाला अध्यादेश जारी कर दिया है, पर उससे सवाल का जवाब नहीं मिल जाता। यह आंकड़ा भी सरकार की छवि निखारने वाला तो हरगिज नहीं है कि पुरानी करंसी के मुकाबले सिर्फ 38 प्रतिशत ही नयी करंसी जारी की गयी है। सरकार और भाजपा जन साधारण को डिजिटल लेनदेन के प्रवचन देते नहीं थक रहीं, लेकिन खुद भाजपा कार्यालयों में अभी तक इसकी शुरुआत नहीं हुई है। नोटबंदी की जैसी मार कृषि और छोटे उद्योगों पर पड़ी है, उसका असर दूरगामी होगा। अब प्रधानमंत्री बेनामी संपत्ति पर वार करना चाहते हैं। बेशक भ्रष्टाचार और काले धन की समाप्ति के लिए हरसंभव कदम उठाया जाना चाहिए, लेकिन नोटबंदी से उत्पन्न मुश्किलों से जरूरी सबक सीख कर, ताकि उनकी पुनरावृत्ति न हो।
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