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उमेश त्रिवेदी
इन दिनों यह बहस करना मुमकिन नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नोटबंदी का सरकारी गिलास कितना भरा और कितना खाली है? गिलास में हवा और पानी याने काले और सफेद धन के अनुपात दिखाने वाले ग्राफिक्स इस वक्त उपलब्ध नहीं हैं। किसी को इस बात का मुगालता भी नहीं होना चाहिए कि काले धन का काला ब्योरा बहुत आसानी से सामने आने वाला है। एक हजार और पांच सौ के नोट बंद होने के बाद रिजर्व बैंक के खजाने में लगभग 13 लाख करोड़ रुपए जमा हो चुके हैं। बैंकों में जमा इतनी बड़ी राशि में काले धन के मानसिक और आभासी-प्रभाव भले ही विकट और विकराल नजर आ रहे हों, लेकिन सच्चाई यह है कि बैंकों के खातों में जमा-राशि के काले-सफेद रंगों का निर्धारण होना अभी बाकी है। बैंकों में इतना पैसा जमा करा लेने के बाद केन्द्र सरकार खुद पशोपेश में है कि काले धन के पहाड़ों की ऊंचाइयों को कैसे नापा जाए? यह काम कितना मुश्किल और लंबा चलने वाला है। आयकर राजपत्रित अधिकारी संघ के महासचिव भास्कर भट्टाचार्य का कहना है कि काले धन को उजागर करने का मोदी-सरकार का सपना अधूरा रह सकता है। आयकर विभाग के पास इतनी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं कि वह काले धन के इस पहाड़ को नाप सके।
काले धन के मनोवैज्ञानिक-साये की भयावहता राजनीतिक दृष्टि से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए फायदेमंद है, लेकिन व्यावहारिक धरातल पर परेशानियों का सबब है। लोग आस लगाए बैठे हैं कि परेशानी के पचास दिन खत्म होने की बेला नजदीक आ रही है। देश में उन्मुक्त लेन-देन के साथ काम-काज शुरू करने की गरज से लोग 2 जनवरी का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। 2 जनवरी के बाद लोगों की वैध मुद्रा की मांग को पूरा करना केन्द्र-सरकार और रिजर्व बैंक के सामने चुनौती है। सरकार ने 9 नवम्बर से 19 दिसम्बर तक बैंकिंग-प्रणाली में 5.92 करोड़ रुपए प्रवाहित किए हैं, जबकि नोटबंदी के जरिए 15.4 करोड़ रुपए प्रचलन से बाहर किए गए हैं। दिसम्बर के दूसरे पखवाड़े तक एक हजार और पांच सौ के पुराने नोटों के रूप में 12.4 लाख करोड़ रुपए बैंकों में जमा हो चुके हैं। वित्तीय विशेषज्ञ मानते हैं कि पचास दिन की अवधि बीत जाने के बाद भी देश में नोटों की राशनिंग खत्म होती नहीं दिख रही है, जो व्यावसायिक गतिविधियों के लिए आत्मघाती है। यह जनता के धीरज की परीक्षा है कि वो अपनी जमा-पूंजी पर सरकार के नियंत्रण को कब तक बर्दाश्त करेगी?
राजनैतिक रैलियों और सरकारी कार्यक्रमों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाषणों की भाव-भूमि में यह ध्वनित होने लगा है कि नोटबंदी की परिस्थितियां पचास दिन बाद भी सरल नहीं हो पाएंगी। काले धन के मसले पर जनता ने मोदी की नीयत पर विश्वास किया है, लेकिन उनकी नीतियां विश्वास को विखंडन की ओर ढकेल रही हैं। मोदी के मुहावरों की रंगत फीकी पड़ने लगी है। काले धन के नाम पर शुरू इस असामान्य राजनीतिक-लड़ाई में जनता के विश्वास को लंबे समय तक बनाए रखने की चुनौतियों से निपटना आसान नहीं है। 70 साल के भ्रष्टाचार और बेइमानी के काले कारोबार से जुड़ी शक्तियां आसानी से हार मानने वाली नहीं हैं। मोदी कहते हैं कि वो काले धन के लुटेरों के साथ ’डाल-डाल, पात-पात’ की रणनीति के साथ युद्ध लड़ रहे हैं। काले धन की दुनिया को परास्त करने के लिए मोदी ने डिजिटल आतिशबाजी की पराक्रमी राह अपनाई है। कैशलेस दुनिया का नया लुभावना संसार आमजनों का ध्यान बांटने का उपक्रम है। आम जनता के सपनों को डिजिटल दुनिया की राहों की ओर मोड़ कर अब मोदी अपने हाथों में बेनामी सम्पत्ति का दहशत-बम लेकर खड़े हैं कि वो किसी भी कीमत पर हार मानने वाले नहीं हैं। काले धन की डालों पर राजनीतिक पत्तों की यह आंख-मिचौली अभी खत्म होने वाली नहीं है। मोदी ने कहा है कि वो इस लड़ाई को अंजाम तक पहुंचा कर रहेंगे। [लेखक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है। ]
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