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अनुराग उपाध्याय
देश में काले धन के खिलाफ छेड़ी गई जंग के बीच राजनीतिक दलों को अज्ञात स्रोतों से मिलने वाले चंदे का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा है। इसी बीच ये महत्वपूर्ण खबर आई कि भारतीय निर्वाचन आयोग ने नकद चंदे की सीमा 20,000 से घटाकर 2,000 रुपए करने की सिफारिश की है। आयोग ने इसके लिए जनप्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 में संशोधन करने का सुझाव दिया है। फिलहाल, राजनीतिक दलों को मिलने वाला चंदा आयकर अधिनियम-1961 की धारा 13(ए) के अंतर्गत आता है। इसके तहत पार्टियों से 20 हजार रुपए से कम के नकदी चंदे का स्रोत नहीं पूछा जा सकता।
यह आम धारणा है कि उपरोक्त प्रावधान का उपयोग कर राजनीतिक पार्टियां काले धन को चंदे के रूप में प्राप्त करती है। उल्लेखनीय है कि राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाला 80 से 85 फीसदी चंदा 20 हजार से कम की रकम में होता है। इसके स्रोत के तौर पर अनाम कार्यकर्ताओं का उल्लेख कर दिया जाता है। इस प्रथा पर रोक लगे, ये मांग अब खासी पुरानी हो चुकी है। मौजूदा संदर्भ में ये मुद्दा राजस्व सचिव हसमुख अढिया के एक बयान से उठा। अढिया के बयान से यह भ्रम बना कि राजनीतिक दलों को मिलने वाले नकद चंदे को लेकर सरकार ने नई छूट दी है। जब इस पर विवाद खड़ा हुआ तो अढिया ने स्पष्ट किया कि कराधान संशोधन कानून के तहत राजनीतिक दलों को कोई छूट या विशेषाधिकार नहीं दिया गया है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी कहा कि नोटबंदी के बाद राजनीतिक दलों को छूट देने का कोई नया नियम नहीं बनाया गया है।
मगर इस पर सिविल सोसायटी के एक हिस्से से यह प्रासंगिक प्रश्न पूछा गया है कि आखिर ऐसे नए नियम क्यों नहीं बनाए जा रहे हैं, जिनसे राजनीति में काले धन के इस्तेमाल पर रोक लगे? नोटबंदी के साथ जब आमजन के धन की बारीकी से जांच की जा रही है, तब राजनीतिक चंदे के मामले में पुराने चलन को क्यों कायम रखा जा रहा है? अपेक्षित यह है कि एनडीए सरकार इस बारे में पहल करे। ऐसा करने के लिए अब निर्वाचन आयोग की ताजा सिफारिश के रूप में अब उसके पास उपयुक्त खाका मौजूद है। इस अनुशंसा को मान लिया जाए तो राजनीतिक दलों को मिलने वाला धन निर्वाचन आयोग की निगरानी में आ जाएगा। तब राजनीतिक दलों को अपने ज्यादातर चंदे के स्रोत बताने होंगे।
निर्वाचन आयोग की इस राय से शायद ही कोई असहमत होगा कि चुनावी चंदा भारत में बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार का एक प्रमुख स्रोत है। अत: नोटबंदी से शुरू की गई मुहिम की कामयाबी के लिए भी यह जरूरी है कि इस बारे में अविलंब पूरी पारदर्शिता लाई जाए। चुनावों में राजनीतिक दलों के खर्च की सीमा भी तय करने की आवश्यकता है। केंद्र सरकार इन दिशाओं में उचित कदम उठाए, तो काले धन के विरुद्ध उसके अभियान को अधिक विश्वसनीयता प्राप्त होगी।
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