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उमेश त्रिवेदी
काले धन की सहस्त्र धारा से फूटकर निकले नैतिकता और नीयत के तकाजे राजनीति और प्रशासन की देहरी खंगालने के लिए व्यवस्था के सभी दरवाजों पर दस्तक देते सुनाई पड़ रहे हैं। चुनाव आयोग ने काले धन की पोटली सिर पर रखकर उत्पात मचाने वाले राजनीतिक दलों पर अंकुश लगाने के लिए अपना शिकंजा कसने का फैसला किया है। पहले चरण में चुनाव आयोग 200 राजनीतिक दलों को डि-लिस्टेड करने जा रहा है। इनके खिलाफ काले धन को सफेद करने की शिकायतें हैं।
बहरहाल, चुनाव आयोग को भ्रम है कि अगंभीर अथवा अज्ञात राजनीतिक दलों को डि-लिस्टेड करने मात्र से राजनीति की रगों में जमा काले धन का रक्त-कैंसर समाप्त हो जाएगा। काला धन भारतीय राजनीति का डीएनए है, जिसे मिटाने की तरकीबें फिलवक्त किसी भी नेता का पास नहीं हैं। प्रधानमंत्री मोदी, कांग्रेस-उपाध्यक्ष राहुल गांधी सहित कोई नेता दावा करने की स्थिति में नहीं है कि वो राजनीति की रगों में व्याप्त काले धन का ब्लड-कैंसर ठीक कर सकता है।
प्रधानमंत्री मोदी की अगुवाई में 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 714.28 करोड़ रुपए खर्च किए थे, जो कांग्रेस के चुनाव खर्च से 200 करोड़ रुपए ज्यादा हैं। मोदी के नेतृत्व में भाजपा का यह सबसे महंगा चुनाव था। सेण्टर फॉर मीडिया स्टडीज के मुताबिक 2014 की तमाम चुनावी प्रक्रियाओं में 30 हजार करोड़ रुपए खर्च हुए थे। चुनाव खर्च के आंकड़ों की काली स्याही खुद सारे हालात बयान करती है। पिछले दिनों राज्यसभा में काले धन पर चर्चा करते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आनंद शर्मा ने भाजपा नेताओं से पूछा था कि प्रधानमंत्री की रैलियों में होने वाले खर्च का भुगतान किस एटीएम से किया जा रहा है? सवाल राजनीतिक है, लेकिन सभी पार्टियों की स्याह सच्चाइयों को उजागर करता है। इसके शिकंजे में राहुल गांधी की खाट-सभाएं भी आ जाती हैं। समाज विज्ञानी कहते हैं कि राजनेता और अधिकारियों का भ्रष्टाचार उनकी जीवन शैली में ढूंढना चाहिए। उसी प्रकार नैतिकता का दंभ भरने वाले राजनेताओं और उनके दल का काला धन उनके चुनाव-अभियान और रैलियों की भव्यता में तलाशना चाहिए।
डि-लिस्टेड राजनीतिक दलों में कई ऐसे हैं, जिनके पीछे कांग्रेस या भाजपा जैसी बड़ी पार्टियों अथवा उनके नेताओं के राजनीतिक स्वार्थ काम करते हैं। बड़े दल चुनाव में इन पार्टियों का उपयोग और फंडिंग राजनीतिक प्रतिशोध के लिए करते हैं। ये दल वोट काटने की रणनीति में कारगर हथियार की तरह इस्तेमाल किए जाते हैं। पिछले सप्ताह राजनीतिक दलों के चंदा जमा कराने से संबंधित वित्तमंत्री अरुण जेटली की रियायती-घोषणा के बाद चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों को राडार पर लिया है। चुनाव फंड के मसले पर सरकार ने साफ किया था कि राजनीतिक दल बैंक खातों में जो पैसा जमा कराएंगे, वह आयकर विभाग की समीक्षा के दायरे में नहीं आएगा। वैसे कानून पुराना है, लेकिन काले धन के खिलाफ मौजूदा माहौल में इस घोषणा ने आम जनता के घावों को कुरेद सा दिया है। लोगों के आक्रोश का सबब यही है कि सामान्य व्यक्ति के खिलाफ बेरहम सरकार को राजनीतिक दलों के प्रति इतना रहम-दिल क्यों होना चाहिए? चुनाव फंड की कर-मुक्ति का कानून सरकार समेत सभी राजनीतिक दलों के गले में हड्डी है, जिससे निजात पाना आसान नहीं है।
फिलवक्त राजनीतिक दलों की चंदाखोरी और खर्च को नियोजित करने की कोई पारदर्शी व्यवस्था नहीं है। 2004 में भी तत्कालीन चुनाव आयुक्त टीएस कृष्णमूर्ति ने प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर पार्टियों को चंदा देने वालों का सम्पूर्ण ब्योकरा देने के लिए कानून बनाने की मांग की थी, लेकिन उस पर कोई गौर नहीं किया गया। सरकारी रुख से निराश चुनाव आयोग ने संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत प्राप्त शक्तियों के तहत 200 राजनीतिक दलों को डि-लिस्टेड करने का निर्णय लिया है। वर्तमान में चुनाव आयोग में 7 राष्ट्रीय दल, 58 प्रादेशिक दल और 1786 नामालूम सी पार्टियों के नाम दर्ज हैं। काले धन के कीचड़ में पत्थर फेंकने के बाद खुद केन्द्र सरकार और उसके कारिन्दे भी काले धन के छींटों से नहीं बच पा रहे हैं। यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि मूल रूप से राजनीति और प्रशासन के निर्झरों से ही काले धन के स्रोत फूटते हैं। लेकिन सत्ता की दबंगई के कारण लोग खामोश बने रहते हैं। [ लेखक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है। यह लेख सुबह सवेरे से ]
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