मोदी के आश्‍वासनों का एटीएम और आशाओं की कतार
उमेश त्रिवेदी

नोटबंदी के बाद केन्द्र सरकार के कदमों से एक बात साफ होने लगी है कि देश में सरकारी और कतिपय उद्योगपतियों को छोड़कर वो सभी गैर-सरकारी लोग काले चोर और रिश्‍वतखोर हैं, जो बैंक में जमा अपना धन निकालने के लिए एटीएम की लाइन में लगे हैं। मोदी सरकार के इस ईश्‍वरीय-बोध का किसी के पास कोई जवाब नहीं है कि आठ सितम्बर के बाद बैंकों में पैसा जमा कराने वाले सभी लोग चोर और भ्रष्ट हैं। जैसे-तैसे जिंदगी और काम-धंधों की जुगाड़ में लगे सौ करोड़ से ज्यादा लोग उस काल्पनिक काले धन के पोषक हैं, जो भारतीय अर्थ-व्यवस्था की रगों में अशुद्धियां पैदा करने का मूल कारक हैं, जिसकी बदौलत देश की आर्थिकी बीमार है। जितने लोग केन्द्र-सरकार, राज्य-सरकार और सरकारी वित्तीय-संस्थानों की साझेदारी में काम-धंधा कर रहे हैं, वो सब सेठ-साहूकार और सम्मानित लोग सफेद धन के खेवनहार हैं। केन्द्र-सरकार के ईमानदार (?) नेटवर्क में सैंतालीस लाख केन्द्रीय कर्मचारी धन्नासेठों, ठेकेदारों और बिचौलियों से मिलकर शासकीय योजनाओं को अंजाम तक पहुंचाते हैं। राज्य-सरकारों के लाखों कर्मचारियों की महती भूमिका इनसे अलग है। शायद मोदी की चोरवादी राजनीतिक-परिकल्पना के कारण केन्द्र सरकार ने  आम जनता के  47 करोड़ बैंक-खातों में बलात् जमा कराए गए 13 लाख करोड़ की जमा-पूंजी को कब्जे में ले लिया है। बैंकों में जमा जनता के पैसे पर शिकंजा कसने के लिए सरकार हर दिन नया फरमान जारी कर रही है। नोटबंदी के बाद सरकार बैंकों से लेन-देन के मामले में साठ से ज्यादा संशोधन कर चुकी है। लोग आशंकित हैं कि भ्रष्ट शासकीय तंत्र से शुद्धता का प्रमाण-पत्र मिलने के बाद भी बैंक-खातों में लेनदेन का मॉडल क्या होगा? 

दिलचस्प मजाक यह है कि सरकारी-कारिन्दे आम जनता के पैसों की शुद्धता की जांच करके प्रमाणपत्र जारी करेंगे। जबकि, ट्रांसपरेंसी-इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक देश के 85 प्रतिशत राजनीतिज्ञ, 75 प्रतिशत पुलिस एवं प्रशासनिक सेवा के अधिकारी और 65 प्रतिशत विधायिका-न्यायपालिका भ्रष्ट है। यह आंकड़ा भी चौंकाता है कि देश में हर साल लगभग 400 बिलियन डालर की कर चोरी होती है। मोदी-सरकार ने इस कर-चोरी को 100 करोड़ गरीब जनता के माथे पर मांड दिया है। 

बैंकों में 47 करोड़ खातों को प्रतिबंधित करने वाली राजनीतिक और शासकीय मशीनरी का अपना कोई ईमान-धरम नहीं है। हर पांचवें साल निर्वाचित देश के 543 सांसद और 2000 से ज्यादा विधायकों के संसदीय जीवन की शुरुआत ही झूठे हलफनामे और झूठी शपथ के साथ होती है। आईएएस अधिकारी और न्यायिक सेवा के अधिकारियों की भ्रष्ट-कथाओं का महाभारत भी सर्वज्ञात है। एक-दूसरे की राजनीतिक और चरित्र हत्या करने पर उतारू राजनीतिक दल या उसके नेता नरेन्द्र मोदी, सोनिया गांधी, नीतीश कुमार या ममता बैनर्जी क्या यह खुलासा करेंगे कि अगले साल होने वाले पांच बड़े राज्यों के विधानसभा चुनाव के लिए हजारों करोड़ रुपयों का इंतजाम कहां से करेंगे?            

सरकार के काम-धंधों में पार्टनर कारिन्दों की जिंदगी में अच्छे दिनों की आहट तेज होने लगी है, क्योंकि आम जनता पर शिकंजा कसने के लिए सरकारी मुलाजिमों के अधिकारों में घोर इजाफा होने के संकेत मिलने लगे हैं। देश की बाकी 100 करोड़ जनता प्रधानमंत्री मोदी के ’अच्छे दिनों’ को भुनाने के लिए आशाओं और आश्‍वासनों के एटीएम के सामने कतार में खड़ी अपनी बारी का इंतजार कर रही है। लेकिन, जिस प्रकार एटीएम नगदी देने से इंकार कर रहे हैं, उसी प्रकार मोदी के ’अच्छे दिनों’ के एटीएम पर आम जनता को बाबाजी का ठुल्लू ही मिल रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नोटबंदी को लेकर भले ही लोकसभा में लोगों के मन में आश्‍वस्ति के भाव को नहीं जड़ा हो, लेकिन चुनावी-सभाओं में उनके आश्‍वासन देश को सोने की चिड़िया देने का वादा करते महसूस हो रहे हैं।  ’अच्छे दिन’ की तलाश में देश के हर घर में इंस्पेक्टर-राज की दहशत दस्तक देने लगी है। नोटबंदी के बाद केन्द्र सरकार आशंकित है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह ब्रेन-चाइल्ड कहीं भस्मासुर बनकर भाजपा के सिर पर ही सवार नहीं हो जाए।[लेखक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।]

Dakhal News 22 December 2016

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