कालेधन के डामर रोड पर सरकार के पांव में फफोले
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उमेश त्रिवेदी

आम जनता के मानसिक संताप और असंतोष के ताप से पिघलती काले धन की डामर-रोड पर अब मोदी-सरकार के पैरो में भी फफोले उठने लगे हैं। काले धन के खिलाफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की राजनीतिक-आतिशबाजी का दोहरा चरित्र उजागर होने लगा है। बैंकों की कतार में खड़ा यह देश आसानी से कबूल नहीं करेगा कि नोटबंदी के बाद सियासी-दल जो पैसा बैंकों में जमा कराएंगे, वो आयकर के दायरे से बाहर होगा। राजनीतिक दलों के लिए चंदे के नाम पर वसूल पुराने नोटों को अपने खाते में जमा करने की छूट से जन-मानस उद्वेलित है। जेएनयू के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार सुप्रीम कोर्ट में हजारों लोगों के दस्तखत से यह जन-याचिका दायर करने जा रहे हैं कि राजनीतिक दलों को आयकर स्क्रुटिनी से बाहर रखने पर रोक लगाई जाए। देश के मुख्य न्यायाधीश को संबोधित इस याचिका में प्रार्थना की गई है कि राजनीतिक दलों द्वारा जमा पुराने नोटों को भी जांच के दायरे में लिया जाए।      

खबरों के बाद मोदी-सरकार बैक-फुट पर है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि नोटबंदी के बाद राजनीतिक दलों को कोई नई छूट नहीं मिली है। जेटली की यह सफाई अर्द्ध-सत्य के कीच में सनी है। भले ही पार्टियां पुरानी करंसी में चंदा नहीं ले सकें, लेकिन आठ नवम्बर के पहले उनके खातों में जमा चंदे की राशि वो बैंकों में जमा कर सकती हैं। जमा-राशि आयकर के दायरे में नहीं आएगी। पार्टियों के लिए वही टैक्स-कानून हैं, जो 15-20 साल पहले बने थे। राजनीतिक दलों को आयकर अधिनियम,1961 की धारा 13(ए) के अंतर्गत टैक्स में छूट प्राप्त है। राजनीतिक दल सूचना के अधिकार (आरटीआई) कानून के दायरे से भी बाहर रखे गए हैं। राजनीतिक दल 20,000 रुपए से कम चंदे का हिसाब आयकर विभाग को देने के लिए बाध्य नहीं हैं। सरकार का कहना है कि इसके लिए पार्टियों को अपने बहीखाते दुरुस्त रखना होंगे। 

पता नहीं, राजनीतिक दल नोटबंदी के बाद अपने चंदे की राशि का कितना और कैसे खुलासा करेंगे, लेकिन चुनाव-आयोग के अनुसार वित्त वर्ष 2014-15 में भाजपा ने अपने खाते में 970 करोड़ और कांग्रेस ने 700 करोड़ रुपए होना बताया था। पिछले एक दशक में राजनीतिक पार्टियों के चंदा-इंडेक्स में गजब का उछाल आया है। एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की रिपोर्ट के मुताबिक 2004 से 2014 के दरम्यान लोकसभा चुनाव की फंडिंग में 478 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। 2004 से 2015 के बीच सम्पन्न विधानसभा चुनाव में राजनीतिक पार्टियों को 2100 करोड़ का चंदा मिला, जिसका 63 प्रतिशत हिस्सा कैश था। इसके अलावा पिछले तीन वर्षों में लोकसभा चुनाव में भाजपा, कांग्रेस, बसपा, सपा सहित सभी राजनीतिक दलों की चंदा-वसूली में 44 प्रतिशत नगद-राशि शामिल थी। एडीआर के अनुसार जहां 2004 में 38 राजनीतिक-दलों ने 253.46 करोड़ रुपए चंदा एकत्रित किया था, वहीं 2014 में इन्हीं दलों ने 1463.63 करोड़ का भारी भरकम चंदा जमा किया। 2009 के लोकसभा चुनाव में 41 राजनीतिक दलों ने 638.26 करोड़ रुपयों की चंदाखोरी की थी। 

एडीआर की रिपोर्ट में दिलचस्प खुलासा यह भी है कि चुनावी-ट्रस्टों ने 2014-15 में सबसे ज्यादा, 111.35 करोड़ रुपयों का चंदा भारतीय जनता पार्टी को दिया था। कांग्रेस को मात्र 31.35 करोड़ रुपए मिले थे। इसके अलावा एनसीपी को 6.78 करोड़, बीजू जनता दल को 5.25 करोड़, आम आदमी पार्टी को 3 करोड़, इंडियन लोकदल को 5 करोड़ रुपए मिले थे। केन्द्र सरकार ने राजनीतिक दलों के चंदे में पारदर्शिता लाने के लिए विभिन्न कंपनियों को चुनावी-ट्रस्ट बनाने की अनुमति दी है। इस नियम के अनुसार इन ट्रस्टों को जितना भी चंदा मिलेगा, वो उसका 95 प्रतिशत राजनीतिक दलों को देंगे।  

2013 की एडीआर रिपोर्ट के मुताबिक राजनीतिक दलों को मिलने वाले 75 प्रतिशत चंदे के स्रोत अज्ञात हैं। राजनीतिक दलों को आयकर में मिली छूट काले धन को सफेद करने का सबसे बड़ा स्रोत है। चुनाव आयोग में 19,00 से ज्यादा राजनीतिक दल पंजीकृत हैं। इनमें 400 दलों ने कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा है। नोटबंदी के बाद छुटभैये राजनीतिक दलों के नेता काले धन को सफेद करने की प्रक्रिया में लिप्त पाए गए हैं। लेकिन मौजूदा कानून उन्हें अभयदान देता है कि उनके हाथों पर चाहे जितना काला रंग लगा हो, उसे काला नहीं माना जाएगा। आम जनता के लिए नोटबंदी के पटाखों में जहां जख्मों की मार है, वहीं राजनीतिक-दलों के लिए विमुद्रीकरण में अनार और फुलझड़ियों की चमकार पैदा हो रही है।[लेखक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।]

 

Dakhal News 20 December 2016

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