नाद ब्रह्म के साधकों ने रसिकों को किया मंत्रमुग्ध
tansen samaroh

अमिताभ उपाध्याय 

माँ सरस्वती और अन्य देवताओं-गंधर्वों के प्रिय और दुर्लभ वाद्य यंत्र रूद्रवीणा की झंकार तो झील में उठतीं लहरों सी अठखेलियाँ करती मीठी-मीठी धुनें और बुलंद और मधुर आवाज में घरानेदार गायिकी। साथ ही भारतीय राग-रागनियों के साथ समागम करतीं यूरोप के खूबसूरत देश नार्वे की लोक धुनें। यहाँ बात हो रही है ग्वालियर में आयोजित तानसेन समारोह में  की। नाद ब्रह्म के साधकों ने इस सभा में अपने गायन-वादन से रसिकों को मंत्रमुग्ध किया।

'तज रे अभिमान......'

सुर सम्राट तानसेन के सुपुत्र विलास खां द्वारा बनाये गए राग 'विलासखानी तोड़ी' में पं सुहास व्यास ने जब अपनी झील सी थरथराती आवाज में छोटा ख्याल 'तज रे अभिमान' का तीन ताल में गायन किया तो ग्वालियर घराने की गायकी से वातावरण गुँजायमान हो उठा। इसी राग में एक ताल में निबद्ध बड़ा ख्याल “अब मो पे छाय रहे” से अपने गायन की शुरूआत हुई। पुणे से आये पं. सुहास जी तानसेन सम्मान से विभूषित पद्मभूषण पंडित सी आर व्यास के सुयोग्य सुपुत्र हैं। समारोह में रविवार को तीसरी प्रस्तुति के रूप में पं. सुहास व्यास द्वारा “खटराग” में बंदिश “बँधा समा सुर राग लय ताल” का गायन किया गया। पं. सुहास व्यास ने अंत में प्रसिद्ध भजन “एक सूर चराचर छायो” गाकर रसिकों को मंत्र-मुग्ध कर दिया।

“रसिया म्हारा.....”

नई दिल्ली के श्री मधुप मुदगल ने राग 'अहीर भैरव' गाया। राजस्थानी लोक संगीत पर आधारित इस बंदिश के बोल थे “रसिया म्हारा”। इसी राग में श्री मुदगल ने छोटा ख्याल “बेग-बेग आओ मंदिरवा” सुनाया। राग “अल्हैया बिलावल” में एक बंदिश और तिरवट गाई।

रूद्रवीणा से  राग ललित पंचम में झरे मीठे मीठे सुर

मुंबई से आये श्री सुवीर मिश्र ने राग 'ललित पंचम' से रुद्रवीणा वादन की शुरुआत की। आलाप गमक का सुंदर प्रयोग वादन में स्पष्ट झलक रहा था। प्रख्यात ध्रुपद गायक उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर के शिष्य श्री सुवीर मिश्र ने अलाप जोड़ झाला से वादन शुरू किया। उनके साथ पखावज पर श्री संजय पन्त आगले ने संगत की।

नार्वे की लोक धुनों में डूबे संगीत रसिक

सुंदर-सुंदर झील, पहाड़ और हरियाली से परिपूर्ण यूरोपीय देश नार्वे से आईं सुश्री एनी हॉयत ने वायोलिन से मिलते-जुलते वाद्य यंत्र “हार्डेन्जर फिड्ल” से अपने देश की लोक धुनें बजाकर समा बाँध दिया। भारतीय शास्त्रीय संगीत की भाँति नार्वे के संगीत में राग तो नहीं होते मगर धुन के लिये हार्डेन्जर को अलग-अलग सुरों में मिलाते हैं, जिससे भाँति-भाँति के रागों की तरह वे स्वत: ही राग सदृश्य प्रतीत होते हैं। एनी हॉयत ने नार्वेजियन भाषा में एक लोकधुन “द्रायुसीन” प्रस्तुत की। द्रायु का अर्थ सपना होता है। दरअसल नार्वे में अधिकांश समय अंधेरा रहता है। जाहिर है हॉयत का वादन सपनों को बयां कर रहा था।

प्रातःकालीन सभा का आगाज़ ध्रुपद गायन परम्परागत तरीके से हुआ। स्थानीय ध्रुपद केन्द्र के श्री अभिजीत सुखडाडे एवं अन्य आचार्यों के निर्देशन में राग अहीर भैरव में गायन किया गया।

Dakhal News 19 December 2016

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