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उमेश त्रिवेदी
भाजपा के वयोवृद्ध नेता लालकृष्ण आडवाणी के राजनीतिक-प्रलापों की अनदेखा करते हुए लोकसभा का शीतकालीन सत्र बिना कोई विधायी कामकाज किए खत्म हो गया। शीतकालीन सत्र के दरम्यान इक्कीस दिनों की समयावधि में देश के 544 सासंदों ने सदन में 19 घंटे होहल्ला मचाकर नया रिकार्ड बनाया है। नोटबंदी के बाद राजनीति की धधकती लपटों ने संसदीय लोकतंत्र की उन ऐतिहासिक परम्पराओं को राख में मिला दिया है, जिनकी बदौलत दुनिया भारतीय लोकतंत्र का गुणगान करती रही है।
सासंदों से अपेक्षा थी कि वो विमुद्रीकरण की अभूतपूर्व पृष्ठभूमि में नोटबंदी से जुड़ी परिस्थितियों पर गंभीर विचार-मंथन और विवेचना करके आम लोगों की परेशानियों का निदान खोजने की कोशिश करेंगे, लेकिन देश के सितारा जन-प्रतिनिधियों ने आश्चर्यजनक तरीके से जिंदगी में फफोलों जैसी जलन पैदा करने वाले इन मुद्दों को हाशिए पर डाल दिया। राजनेताओं के लिए विमुद्रीकरण के आर्थिक पहलुओं से ज्यादा उसके राजनीतिक पहलू महत्वपूर्ण थे। वैसे भी भारतीय राजनीति में पक्ष-विपक्ष के बीच जनहित और राष्ट्रहित के मसलों पर आम सहमति राजनीतिक दुश्मनियों के कारण जमींदोज हो चुकी है। संसद में भी ये दृश्य ओझल हो चुके हैं।
इसीलिए आडवाणी जैसे लोगों की लोकतांत्रिक तड़प सत्तारूढ़ दल में तल्खियों का सबब बन जाती है। कोई भी उस पर कान धरने को तैयार नहीं है। सात दिनों में आडवाणी दो मर्तबा संसदीय-गत्यावरोध पर आक्रोश व्यक्त कर चुके हैं। आडवाणी के स्टैण्ड पर राहुल गांधी ने बधाई देते हुए कहा कि अपनी पार्टी में ही लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए संघर्ष करने के लिए आपको धन्यवाद...। गुरुवार को भी संसदीय कार्यवाही स्थगित हो जाने के बाद सदन में आडवाणीजी का अकेले और निस्सहाय बैठे रहना उन लोकतांत्रिक व्यथाओं की अभिव्यक्ति है, जो राजनीतिक-वैमनस्य में पूरी तरह झुलस चुकी हैं। इसे अनदेखा करना मुनासिब नहीं है। सही अर्थों में आडवाणीजी लोकतंत्र का आईना लेकर खड़े हैं, लेकिन खेदजनक है कि किसी भी दल को उस आईने में अपनी शक्ल दिखाई नहीं देती है। आडवाणी के आईने के सामने खड़ी भाजपा को उसमें कांग्रेस का अक्स दिखाई पड़ता है, जबकि कांग्रेस को भाजपा की परछाइयां नजर आती हैं। याने सबको हुड़दंगी बंदर नजर आते हैं।
भाजपा ने आडवाणी के बयान को भी गंभीरता से नहीं लिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि यदि नोटबंदी पर चर्चा नहीं हुई तो संसद हार जाएगी, लेकिन भाजपा ने उन हदों को काफी पीछे छोड़ दिया है, जहां नैतिकता और मर्यादाएं राजनीति को संचालित करती थीं। दरकते राजनीतिक मूल्यों के बीच भाजपा के लिए संसद का हारना-जीतना या उठना-गिरना मायने नहीं रखता है। भाजपा के लिए हर हाल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मंशाओं की ताजपोशी सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। भाजपा ने वही किया, जो मोदी को अच्छा लगता था। समझना मुश्किल है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राजनीतिक हानि-लाभ की किस रणनीति के तहत नोटबंदी के मसले पर सदन में खामोश रहना उचित समझा, लेकिन उनकी खामोशी उनके असहाय होने को भी प्रतिबिम्बित करती है। सदन में नोटबंदी पर मोदी की खामोशी से उत्पन्न राजनीति की लहरें दूर तक जाएंगी। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाजवादी पार्टी सहित सभी विपक्षियों के लिए मोदी का संसदीय-पलायन गहरे राजनीतिक सवालों का सबब होगा, जिसके उत्तर आसान नहीं होंगे। आडवाणी की चिंताएं इसलिए गैरवाजिब नहीं हैं कि पिछले 17 सालों में यह दूसरा मौका था, जब शीतकालीन सत्र में कुछ भी काम नहीं हो सका। इस मर्तबा कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष ने शीतकालीन सत्र पर बर्फ डाल दी, जबकि 2010 में यूपीए के शासनकाल में भाजपानीत एनडीए की बर्फबारी ने शीतकालीन सत्र की गतिविधियों को गला दिया था। 2016 में व्यवधान का मुद्दा विमुद्रीकरण है, जबकि 2010 में भाजपा की मांग थी कि संयुक्त संसदीय समिति ही 2जी कांड की जांच करे। पीआरएस लेजीस्लेटिव रिसर्च संस्था के अनुसार 2010 में लोकसभा में 6 प्रतिशत और राज्यसभा में 2 प्रतिशत कामकाज हो पाया था। 2016 के आंकड़े कहते हैं कि दोनों सदनों की कार्यसूची में 95 प्रतिशत काम नहीं हो पाया है। प्रधानमंत्री मोदी के ढाई वर्षों के कार्यकाल में इस शीतकालीन सत्र का रिकार्ड सबसे खराब है। [लेखक वरिष्ठ पत्रकार और सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।]
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