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उमेश त्रिवेदी
नोटबंदी के त्रासद अध्याय में झारखंड के गिरीडीह की यह दहलाने वाली कहानी भी सामाजिक-मनोविज्ञान के अध्ययन और राजनीतिक विश्लेषण के बतौर हमेशा चर्चाओं के केन्द्र में रहेगी कि विमुद्रीकरण से उठने वाली लहरें जिंदगी के घाटों को कितना और कैसे आहत कर सकती हैं? कोई भी सरकार नहीं चाहेगी कि मौद्रिक-घटनाओं के इतिहास में ऐसे त्रासद उदाहरण दर्ज हों। ’हिन्दुस्तान-टाइम्स’ में बुधवार को पहले पृष्ठ पर प्रकाशित झारखंड के गिरीडीह पुलिस थाने की यह घटना रूह को गहरे तक हिला कर रख देती है कि नोटबंदी में रोजगार खोने वाले एक शख्स की पत्नी ने भूख से तड़पते अपने दो बच्चों को कुंए में ढकेल कर मार डाला। हकीकत में बेबस मां बच्चों के लिए दो जून अन्न जुटाने में असमर्थ थी। दो बच्चों की मौत का कारण यदि नोटबंदी का फंदा है, तो यह सवाल जरूर पूछा जाएगा कि इन मौतों को शहादत की किस श्रेणी में रखा जाएगा? अथवा प्रखर राष्ट्रवाद के पैमानों पर इसकी पड़ताल कैसे होगी?
पहली नजर में यह अविश्वसनीय है, लेकिन खबरें घटना को सच बता रही हैं। शनिवार 10 दिसम्बर की इस घटना को झारखंड से प्रकाशित ’प्रभात-खबर’ ने हिन्दुस्तान टाइम्स से दो दिन पहले छापा था। ’हिन्दुस्तान-टाइम्स’ के अनुसार डुमरी, निमियाघाट के गांव प्रतापपुर में रहने वाली पैंतीस वर्षीय महिला शबीजान खातून ने गिरीडीह पुलिस को बताया कि दो दिनों से उसके दोनों बच्चे भूख से व्याकुल थे। बड़े बेटे शेखावत अंसारी की उम्र 8 साल और बेटी सायरा बानो की 6 साल थी। उन्हें दो दिनों तक अन्न नसीब नहीं हुआ था। बच्चों की दशा से विचलित मां अन्तत: सारी हदों को पार करते हुए बच्चों को मौत की पनाह में छोड़ आई। बेबस शबीजान ने बताया कि भूख से तड़पते और चिल्लाते बच्चों का क्रंदन उसके लिए असहनीय था।
घटना के दिन शबीजान भूख से बिलखते बच्चो को लेकर घर से निकली और सात सौ मीटर दूर स्थित कुएं में उन्हें ढकेल दिया। बच्चों को कुंए में ढकेलने के बाद शबीजान जंगल में चली गई। शबीजान का कहना है कि भूखे-प्यासे बच्चों का पेट भरने के लिए सारे उपाय खत्म हो चुके थे। उसका पति शौकत अंसारी मुंबई में रोजनदारी पर काम करता था। आठ नवम्बर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व्दारा नोटबंदी आरोपित करने के बाद बने हालात में शौकत अंसारी को नौकरी से निकाल दिया गया था। फलस्वरूप वो अपने गांव वापस लौट आया था। जब लौटा, तब उसकी जेब में एक पाई भी नहीं थी। गांव में भी उसके लिए रोजगार के विकल्प नहीं बचे थे। कोई विकल्प शेष नहीं होने के कारण हताशा और निराशा में उससे यह हादसा हो गया। गिरीडीह से 47 किलोमीटर दूर प्रताप पुर गांव के इस परिवार की वित्तीय-हालात नोटबंदी के बाद दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही थी। दर्दनाक हादसे का खुलासा रविवार को हुआ, जबकि ग्रामवासियों को दोनों बच्चों को शव कुंए में तैरते हुए मिले।
वैसे शौकत अंसारी के परिवार का नाम राष्ट्रीय अन्न सुरक्षा योजना में दर्ज है, लेकिन ग्रामवासियों के अनुसार इसके तहत उन्हें कभी भी समय पर खाद्यान्न नहीं मिलता है। शौकत अली का कहना है कि उसका परिवार नोटबंदी के बाद नवम्बर से भूखों मर रहा है। जब उसकी पत्नी ने बच्चों को कुंए में ढकेला, तब भी वह राशन की दुकान पर राशन की लाइन में लगा था।
घटना से फूटने वाली राजनीतिक चिंगारियां जंगल की आग में तब्दील हो सकती हैं। शायद इसीलिए पुलिस ने प्रथम दृष्टया घटना को शंकास्पद मानते हुए इसके अलग-अलग पहलुओं की जांच-पड़ताल शुरू कर दी है। यहां किसी शायर का यह शेर मौजू लगता है कि- ’चेहरा बता रहा था कि मारा है भूख ने, सब लोग कह रहे थे कि कुछ खाकर मर गया...।’ राजनीति आसानी से यह कबूल नहीं करेगी कि नोटबंदी की लपटें इतनी बेरहम और भयावह भी हो सकती हैं। हकीकत यह है कि नोटबंदी की कोख से भूख और बेरोजगारी पैदा होने लगी है।[लेखक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।]
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