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उमेश त्रिवेदी
मुरादाबाद की परिवर्तन रैली में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का संबोधन चिंता पैदा करने वाला है कि वो उन्माद की किस 'फ्रीक्वेंसी' पर देश की राजनीति को सेट करना चाहते हैं? देश का बड़ा तबका पहले ही 'हिन्दुत्व' और 'राष्ट्रवाद' के जिमनेशियम में 'पुश-अप' लगा रहा है, अखाड़े में लाठियां भांज रहा है, क्या मोदी उसके आगे समाज में वर्ग-संघर्ष की सुरंगें बिछाना चाहते हैं? देश के गरीबों के नाम पर मोदी भाजपा समर्थकों को जिस दिशा में बढ़ने के लिए उत्प्रेरित करना चाहते हैं, उसके दुष्परिणामों के किनारे आसानी से ढूंढे नहीं मिलेंगे। नोटबंदी के बाद गोवा, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश की परिवर्तन रैलियो में भाव विह्वल और रुंधे गले से राष्ट्र को संबोधित करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वरों में प्रधानमंत्रित्व का गांभीर्य और गौरव पिघलता महसूस हो रहा है। उनकी पिछली रैलियों में उनकी चिंताएं नोटबंदी की उन समस्यायों को एड्रेस करने वाली प्रतीत होती थीं, जिनसे यह देश जूझ रहा है। लेकिन मुरादाबाद की परिवर्तन रैली में तो उनके इशारे उस शाश्वत वर्ग-संघर्ष को आमंत्रित करने वाले थे, जो समाज को खतरनाक हदों की ओर मोड़ता है।
मुरादाबाद की परिवर्तन रैली में जनधन के लाखों करोड़ों गरीब खातेदारों को राजनीतिक-सीख देते हुए मोदी ने कहा कि- 'मैं गरीबों से यह कहना चाहता हूं कि जिन लोगों ने आपके जनधन खातों में अपना काला पैसा जमा कराया है, वो कितना भी दबाव डालें, आपके खाते में जितने भी पैसे आए हैं, उन्हेंन निकालें नहीं। उस पैसे को खाते में ही जमा रहने दीजिए। यदि काला धन देने वाले आपके पास पैसा वापस मांगने आते हैं, तो उनसे प्रूफ मांगिए कि वह पैसा ईमानदारी से कमाया हुआ है या नहीं। मै दिमाग लगा रहा हूं कि जो लोग जनधन खातों में अपना काला पैसा छिपा रहे हैं, उन्हें जेल के सीखचों के पीछे कैसे डाला जाए? मेरी आकांक्षा है कि काले पैसे वाले जेल जाएं और पैसा गरीबों के घर जाए।' खातेदारों को बगावत की इस सीख के साथ कई सामाजिक, व्यावसायिक और नैतिक सवाल जुड़े है, जो कानून-व्यवस्था की जद में भी आते हैं। बड़ा सवाल तो यह है कि मोदी ने बगैर जांच के धारणाओं के आधार पर यह निष्कर्ष कैसे निकाल लिया कि नोटबंदी के बाद जनधन खातों में जमा 30,000 करोड़ रुपये काला धन ही है। यदि यह महज एक चुनावी जुमला है, तो देश के प्रधानमंत्री के मुंह से ये कदापि शोभास्पद नहीं माना जाएगा। इस जुमले से तालियां मिल सकती हैं, उन्माद फैल सकता है, वोट मिल सकते हैं, लेकिन समाज को दिशा नहीं मिलती है।
मोदी के इस कथन के मायने यह भी हैं कि जितने लोगों ने जनधन योजना के खातों में ढाई लाख जमा किए हैं, वो सभी चोर हैं और उससे कम मात्रा में जमा कराने वाले भले-मानुष है। इस मामले में सरकार भी उतनी ही गुनहगार है, जिसने खातों में ढाई लाख रुपए जमा कराने की इजाजत दी थी। जनधन खातों के दुरुपयोग की कुछ शिकायतें जायज हो सकती हैं, लेकिन इन अपवादों को सम्पूर्ण-सच माना जाना मुनासिब नहीं है। सही है कि प्रारंभ में जनधन और गरीब के खातों का दुरुपयोग हुआ, बैंकों में मजदूरों की कतारें भी लगीं, लेकिन इस सच के सिरे आखिर में समाज के उस छोर पर जाकर रुकते हैं जहां जमीन पर मजदूर-किसान और किसान-साहूकार के बीच रोजमर्रा के रिश्तों और आर्थिक व्यवहार की इबारत लिखी है। ये रिश्ते लाखों गरीबों के रोजगार का रोडमेप हैं, जिसे पहचानना और पढ़ना जरूरी है। जिन ढाई लाख रूपयों को आप पहले दिन हर प्रकार की दरयाफ्त या पूछताछ से मुक्त कर चुके हो, उसके आधार पर किसी को गुनाहगार बनाने का नैतिक और कानूनी आधार आपको कैसे मिल सकता है? फिर नोटबंदी और काले धन का सेनानी बनकर जो गरीब आग के दरिया में कूद जाएगा, उसके रोजगार की ग्यारंटी कौन लेने वाला है? प्रधानमंत्री का यह बयान भी उन्माद भड़काने वाला है कि अमीर गरीबों के पैरों पर गिर रहे हैं। अमीर-गरीब के सामाजिक रिश्तों की कठोर सच्चाइयों को भ्रमित करना मुनासिब नहीं है। भले ही विमुद्रीकरण के नाम पर अमीर-गरीबों के बीच संघर्ष पैदा करने की ये कोशिशें वोट की दृष्टि से भाजपा के लिए मुनाफे वाली हों, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि इसकी चिंगारियों से समाज भी आहत होगा। फिर मोदी के अमीरों के विरुध्द गरीबों के संघर्ष के इस आह्वान की कोई सैध्दांतिक धुरी नही है। यह सिर्फ विमुद्रीकरण से उत्पन्न परिस्थितियों से निपटने के तात्कालिक उपाय हैं। क्योंकि सरकार की सारी दिशाएं तो पांच सितारा भारत का इन्द्र-धनुष रच रही हैं। [ लेखक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।]
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