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राघवेंद्र सिंह
कहा जाता है कि भले मानुषों में एका नहीं होता। इसीलिए मोहल्ले का एक बदमाश सबको हिलाकर रख देता है, क्योंकि सज्जन लोग उसके मुंह नहीं लगते। इक्का दुक्का उनका विरोध करते हैं तो डॉन उन्हें सबक सिखा देते हैं।
लब्बोलुआब यह है कि अधमरा सांप ज्यादा खतरनाक होता है उसे छेड़ो तो पूरा खत्म करो, वरना पांसा पलट भी सकता है। मसला काले धन के सांप पर आक्रमण का है। लगता है सरकार ने अधूरी तैयारी के साथ हमला बोला लेकिन देश के ज्यादातर सच्चे लोग उसके अधकचरे ही सही मगर अच्छे मकसद से उठाए गए कदम के साथ हैं। इसीलिए तो अपने ही पैसे को बैंक से नहीं निकाल पाने की प्रसवपीड़ा भी झेल रहे हैं। जबकि सरकार के कुछ न समझ सोच रहे हैं कि नोटबंदी में उसके नित नए फरमानों के कारण आम हिन्दुस्तानी का ध्यान बांट विरोध की मानसिकता को मजबूत नहीं होने दे रहे हैं। जैसे कभी नोट बदलने वालों की उंगली पर स्याही लगाना, एटीएम से नोट निकासी की लिमिट कम करना, कभी सोना रखने की सीमा तय कर देना तो कभी ब्लैक मनी पर टैक्स के नए फंडे संसद में पास कर उसे व्हाइट बना देना। लेकिन मोदी सरकार को यह भी सोचना होगा कि जो नेता फुल टाइम राजनीति करते हैं तो उनके बैंक बैलेंस कौन से धंधे के कारण दिन दूने रात चौगुने बढ़ रहे हैं। अगर इसे नहीं कुचला तो काले धन के खिलाफ अभियान अधमरा और अधकचरा ही रहेगा।
देश का आम वर्ग यानी मैंगो पीपुल तभी तक सुनेगा और सहेगा जब तक उसे यह भरोसा रहेगा कि काले धन के सांपों को पूरी तरह कुचला जा रहा है। उसमें अपने और पराए पिटारों में रखे सांपों से भेदभाव नहीं है। अपनों को दूर और दूसरों की मुंडी जमीन पर रगड़ी जाएगी ऐसा शायद नहीं चलेगा। सरकार की नीयत, इमानदारी सब दांव पर है। गांधी से लेकर जयप्रकाश नारायण, अन्ना हजारे और मोदी-मोदी करने वाले भी खिलाफ जा सकते हैं। संदेह सीताजी पर भी किया गया, अग्निपरीक्षा भी हुई थी उनकी। इसलिए नोटबंदी से काले धन, भ्रष्टाचार और आतंकवाद को नथने में सरकार ढीली पड़ी तो परेशानियों का पहाड़ टूटेगा। सरकार सच्ची है तो उसे वैसा दिखना भी पड़ेगा।
परेशान जनता नोटबंदी पर विपक्ष के सवालों को भी सुन रही है। उसे काले धन से लड़ने की बातें भूखे पेट भी हरी भजन करने जैसी ‘अच्छी’ लग रही हैं। भाजपा शासित मध्यप्रदेश, छग, राजस्थान जैसे राज्यों में काले धन के सांपों को नहीं कुचला तो मशहूर फिल्म ‘दीवार’ का डायलॉग जनता अपने सुपरमैन मोदी से जरूर पूछेगी कि ‘तेरे हाथ पर मेरा बाप चोर है’ लिखने वाले मरे मेरे कोई नहीं थे, लेकिन चोरों को छोड़ने वाला तू तो मेरा नेता था... दीवार में अपनी मां से सवाल करने वाले हीरो अमिताभ बच्चन का अपने गुनाहों को छुपाकर मां से सवाल करने का सीन देश के दर्शकों को याद होगा।
राजनीति करने वाले करोड़पति कैसे हो गए
राजनीति करने वाले हजारों कार्यकर्ता, नेता धनपति कैसे बन जाते हैं। जब राजनीति फुल टाइम करते हैं तो पैसे कमाने का समय और धंधा कौन सा होता है। उनके घोषणा पत्र में व्यवसाय के नाम पर राजनीति या समाजसेवा करना लिखा होता है तो फिर माल कहां से आता है। सरकार उद्योगपतियों के बजाए रातोंरात सड़कपति से करोड़पति बनने वाले अपने नेताओं से ही गरीबी दूर करने के नुस्खे क्यों नहीं पूछ लेती। सरकार विकास के लिए उद्योग के बजाए नेता, अफसर और मीडिया का गठजोड़ ही तोड़ दे तो शायद भ्रष्टाचार और काले धन को तोड़ उसे मिल जाएगा। मोदी अपने नेताओं से पूछ सकते हैं कि उनके पास कौन सा अलादीन का चिराग है या खजाना खोलने वाला ‘खुल जा सिमसिम’ वाला नुस्खा है जिनसे उनका बैंक बैलेंस बढ़ रहा है। देश को पता होना चाहिए। राज्यों में धन के सांपनाथों पर सरि्जकल स्ट्राइक जरूरी है।
इस मुद्दे पर भले लोग मशहूर शायर दुष्यंत कुमार की उस गजल की तरह ही हैं-
कहीं पे धूप की चादर बिछा के बैठ गए
कहीं पे शाम सिरहाने लगा के बैठ गए ।
जले जो रेत में तलवे तो हमने ये देखा
बहुत से लोग वहीं छटपटा के बैठ गए ।
खड़े हुए थे अलावों की आंच लेने को
सब अपनी अपनी हथेली जला के बैठ गए ।
दुकानदार तो मेले में लुट गए यारों
तमाशबीन दुकानें लगा के बैठ गए ।
लहूलुहान नज़ारों का ज़िक्र आया तो
शरीफ लोग उठे दूर जा के बैठ गए ।
ये सोच कर कि दरख्तों में छांव होती है
यहाँ बबूल के साए में आके बैठ गए ।
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