नगदी-व्यभिचार और कैशलेस-समाज के राजनीतिक-फंडे
umesh trivedi

उमेश त्रिवेदी

नोटबंदी के जरिए काले धन के खिलाफ अपने राजनीतिक-जेहाद में जुटी केन्द्र की मोदी-सरकार ने अपनी प्रशासनिक सेना की एक कुमुक देश में कैशलेस सोसायटी के निर्माण के लिए रण-क्षेत्र में रवाना कर दी है। केन्द्र-सरकार की ये भाव-भंगिमाएं लोगों के लिए अटपटी और चटपटी हैं कि काले धन की इस लड़ाई का निर्णायक मुकाम सिर्फ कैशलेस सोसायटी है। खोटे उपकरणों और खंडित इरादों के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जो लड़ाई लड़ रहे हैं, उसका प्रारब्ध उजला प्रतीत नहीं हो रहा है। इस वक्त सही-गलत का फैसला करना संभव नहीं है, लेकिन फलक पर उभरते सवालों को टालना भी मुनासिब नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी के मामले में उनकी धुन से अलग कोई धुन सुनना या गुनगुनाना उन्हें गवारा नहीं है।

नोटबंदी के बाद सरकार के सारे प्रयास कैशलेस सोसायटी की दिशा में मुड़ गए हैं। सरकार मानती है कि कैशलेस सोसायटी कालेधन और भ्रष्टाचार का सबसे कारगर उपचार है। सारे प्रचार-प्रसार और प्रधानमंत्री के भाषणों को सुनने के बाद ऐसा महसूस होने लगा है कि देश की सवा सौ करोड़ गरीब और जाहिल जनता ही इन हालात के लिए जिम्मेदार है कि उसने अमेरिका, इंग्लैण्ड जैसी आदर्श(?) और निर्दोष(?) कैशलेस सोसायटी का अनुसरण नहीं किया! पिछले सत्तर वर्षों का ’सबसे बड़ा पाप’ यही है कि हम कैशलेस सोसायटी नहीं बन सके! एक झटके में देश की 86 प्रतिशत मुद्रा को चलन से बाहर कर देने का सबब और सबक यही है कि सब लोग मिलकर तेजी से कैशलेस सोसायटी की ओर कूच करें। कैशलेस सोसायटी ’नगदी व्यभिचार और विडम्बनाओं’ के बीच खड़ी वर्तमान सोसायटी से ज्यादा राष्ट्रवादी, पावन और पवित्र होगी...! कोफ्त होती है कि हम सब ’राष्ट्रीय-पाप’ के भागीदार हैं।

मोदी इसे कितनी शिद्दत से महसूस कर रहे हैं, यह इससे महसूस होता है कि इस राष्ट्रीय पाप से प्रायश्‍चित के लिए नीति-आयोग ने देश के प्रमुख मुख्यमंत्रियों और विशेषज्ञों का तेरह सदस्यीय पैनल गठित कर दिया है, जो देश में डिजिटल-पेमेण्ट्स की व्यवस्थाओं को लागू करने की व्यवस्थाएं करेगा। आन्ध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू इसके संयोजक हैं। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान भी इसके सदस्य होंगे।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने कोर-ग्रुप के अधिकारियों से आग्रह किया है कि वो लोगों के समूहों को समझाएं कि विमुद्रीकरण की इस विलक्षण और अनूठी योजना के वित्तीय-लक्ष्य काले धन की मीमांसाओं से आगे आम आदमी के जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाने वाले हैं। समाज में ’अल्प-मुद्रा’ का चलन लूट-पाट, डकैती, अपहरण, ड्रग-तस्करी और मानव-तस्करी जैसे अपराधों पर अंकुश लगाएगा। एक तीर से कई निशाने साधने वाले प्रधानमंत्री चाहते हैं कि उनकी यह परिकल्पना सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव की जमीन पर रोपी जाए।       

यह एक अतिरंजित अवधारणा है कि कैशलेस सोसायटी हर प्रकार के आर्थिक-अपराधों का एकमात्र इलाज है। कैशलेस सोसायटी की पहल राजनीतिक ज्यादा है। यह नोटबंदी की मौजूदा समस्याओं से लोगों का ध्यान भटकाने की कोशिश है। विदेशी जमीन पर शिक्षित-दीक्षित, नीति-नियंताओं को विदेश-यात्राओं के पहले भारत के सुदूर अंचलों में रहने वाले जन-जातियों के रहन-सहन और सामाजिक विषमताओं का जायजा लेने के लिए जाना चाहिए। जो लोग इंग्लैण्ड-अमेरिका की तर्ज पर देश के बहुसंख्यक लोगों के लेनदेन के व्यवहार को रातोंरात बदल देने का सपना देख रहे हैं, उन्हें देश के सवा करोड़ लोगों की हकीकत से रूबरू होने की जरूरत भी है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार देश की 34.9 प्रतिशत आबादी याने 46 करोड़ लोग ही इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं। इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के मुताबिक मोबाइल इंटरनेट की सुविधा 9 प्रतिशत गांवों में ही उपलब्ध है। जो लोग कैशलेस सोसायटी के नाम पर तालियां पीट रहे हैं या गाल बजा रहे हैं, उन्हें यह सोचना होगा कि आम जिंदगी में कैशलेस मुद्रा का प्रचलन चुटकी बजाने जैसा काम नहीं है। इसे पूरा करने में दसियों साल लगेंगे। प्लास्टिक मनी के उपयोग का माहौल राजनीतिक धुंध को घनीभूत करने वाला है, ताकि मूल समस्याओं की ओर से लोगों का ध्यान हट सके। नोटबंदी के बाद सरकार ने कई मर्तबा अपने स्टांस में बदलाव किया है। नगदी की जुगाड़ में बैंकों के सामने खड़ा देश कुछ समझे, उसके पहले केन्द्र-सरकार नए फरमान के साथ टीवी स्क्रीन पर नया ऐलान करती दिखने लगती है। काले धन के मुकाबले में सरकार नए फरमानों के साथ सामने आए, तो भी ऐतराज नहीं, लेकिन दिक्कतें पुराने आदेशों की उलटा-पुलटी से है। यह उलटा-पुलटी सरकार की विश्‍वसनीयता पर सवाल खड़े करने लगी है। [लेखक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।]

Dakhal News 3 December 2016

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