चंदाखोरी के घाट पर भाजपा-कांग्रेस में गजब का मतैक्य
उमेश त्रिवेदी

उमेश त्रिवेदी

वेतन-भत्ते और चुनावी चंदे की राजनीति में कोई अपना पराया नहीं होता। कितना भी राजनीतिक तूफान हो, ज्वार-भाटे उठ रहे हों, इन मसलों पर सब एक नाव में सवार होकर एक ही गंगा-घाट पर उतरते हैं। चुनाव के हमाम में सभी दल एक साथ स्नान करते हैं और एक ही टॉवेल का उपयोग करते हैं। लोकतंत्र के आकाश में चौबीसों घंटे कांव-कांव का शोर भ्रमित करता है कि ये लोग कभी एक नहीं होंगे, लेकिन जब इनके स्वार्थ सामने होते हैं, तो उनमें गजब की मतैक्यता और सहभागिता कायम हो जाती है। 

नोटबंदी के सिलसिले को आगे बढ़ाने वाले काले धन, भ्रष्टाचार और चंदाखोरी के सवालों ने इतनी धुंध पैदा कर दी है कि इस मसले पर कौन सा राजनीतिक दल कहां खड़ा है, राजनीति किस दिशा में बढ़ रही है, देख पाना मुश्किल हो रहा है। नोटबंदी और काले धन के सवालों पर पिछले एक पखवाड़े से सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस सहित सपा, बसपा या तृणमूल कांग्रेस के सांसद लोकसभा में एक दूसरे पर बाहें तान कर खड़े हैं। राजनीतिक दुश्मनियों की तलवारें भांजी जा रही हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और कांग्रेस के उपाध्यक्ष के भाषणों में छलकते जहर के रंगों को देखते हुए लगता है इस जनम में तो पक्ष-विपक्ष में किसी भी कीमत पर मतैक्यता संभव नहीं है। राष्ट्रवाद, गरीबी-गुरबत, खेती-किसानी, महिला-उत्पीड़न या सशक्तिकरण जैसे देशहित के मामलों में भाजपा-कांग्रेस के बीच भले ही कोई समझ विकसित न हो सके, लेकिन पार्टी-फंड जैसे मसलों में भाजपा कांग्रेस सहित सभी दलों की राय में अंतर नहीं होता है।

मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में उस वक्त दिलचस्प नजारा सामने आया, जबकि विदेशी चंदे से जुड़े एक मामले में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी एक सुर में दलील दे रहे थे। राजनीतिक चंदाखोरी के प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट में भाजपा और कांग्रेस की जुगलबंदी चौंकाने वाली है। दिलचस्प यह है कि यूपीए सरकार ने 2010 में एफसीआर एक्ट बनाया था। मौजूदा मोदी सरकार ने उस कानून में संशोधन करके विदेशी चंदे के अपराधों को भूतलक्षी प्रभाव से खारिज कर दिया था। जिसका लाभ उठाकर भाजपा और कांग्रेस चंदाखोरी के घाट पर एक साथ गंगा जल का आचमन कर रहे हैं।  

विदेशी चंदे के मामले में गैर सरकारी संगठन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म ने दिल्ली हाईकोर्ट में कांग्रेस और भाजपा, दोनों के खिलाफ जनहित याचिका दायर की थी। दिल्ली हाईकोर्ट ने 28 मार्च 2014 के अपने फैसले में देश की दोनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियों को प्रथमदृष्टया विदेशी मुद्रा के कानूनों के उल्लंघन का दोषी माना था। उच्च न्यायालय ने याचिका पर सुनवाई करते हुए केन्द्र सरकार और चुनाव आयोग को निर्देश दिए थे कि वो कांग्रेस और भाजपा को मिले विदेशी चंदे पर कानून के मुताबिक छह महीने के भीतर कार्रवाई करे। भाजपा और कांग्रेस ने इंग्लैंड की कम्पनी वेदांता की सहयोगी स्टरलाइट एंड सीसा कंपनी से विदेशी चंदा लिया था। फैसले के खिलाफ कांग्रेस और भाजपा ने सुप्रीम कोर्ट में अपील करके हाईकोर्ट के फैसले पर अमल पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की थी।

भाजपा और कांग्रेस की इन दलीलों को मान लिया गया कि दोनों दलों ने फॉरेन कांट्रीब्यूशन रेग्युलेशन एक्ट (एफसीआरए) का उल्लंघन नहीं किया है। इस मामले में केन्द्र सरकार द्वारा एफसीआर एक्ट 2010 में संशोधन किया गया है, जो भूतलक्षी प्रभाव से लागू हो चुका है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति जेएस केहर, अरुण मिश्रा और एएम खानविलकर ने भाजपा के वकील श्याम दीवान और कांग्रेस के कपिल सिब्बल की दलीलों को सुना। भाजपा के वकील श्याम दीवान का कहना था कि 2010 के कानून में सरकार ने भूतलक्षी प्रभाव से संशोधन किया है। उसके अनुसार यदि विदेशी कंपनी में किसी भारतीय की पचास प्रतिशत या उससे अधिक की हिस्सेदारी हो, तो उस कंपनी से राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे को विदेशी फंड नहीं माना जाएगा। कांग्रेस के वकील कपिल सिब्बल का कहना था कि इस साल फरवरी में केन्द्र सरकार द्वारा प्रस्तुत संशोधन के बाद उच्च न्यायालय का निर्णय बेमानी हो गया है। इसके अलावा कांग्रेस ने चंदे से संबंधित ब्योरे से चुनाव आयोग को बकायदा अवगत भी कराया था। इसलिए हाईकोर्ट के निष्कर्षों में सच्चाई नहीं है। चंदे के मामले में कांग्रेस और भाजपा की यह जुगलबंदी भारतीय राजनीति का असली चेहरा उजागर करती है।[ लेखक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक हैं। ]

 

Dakhal News 2 December 2016

Comments

Be First To Comment....

Video
x
This website is using cookies. More info. Accept
All Rights Reserved © 2025 Dakhal News.