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उमेश त्रिवेदी
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भाजपा के सांसदों और विधायकों से कहा है कि वो आठ नवम्बर से इकतीस दिसम्बर तक अपने बैंक अकाउंट के लेन-देन का ब्योरा उजागर करें। सभी जानते हैं कि मोदी इतने अल्हड़ और कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं, जिनको यह अंदाजा नहीं होगा कि राजनीति के पिच पर ’काली-बॉल’ के बाउन्सर का इस्तेमाल कब और कैसे होता है? भाजपा ही नहीं, किसी भी दल के सांसद-विधायक इतने भोले भाले और सीधे नहीं होते हैं कि वो अपने उन खातों का इस्तेमाल कालेधन के गलियारे के रूप में करेंगे या होने देंगे, जिसका हिसाब चुनाव-आयोग में देना होता है? ढाई साल में तीसरी बार भाजपा सांसदों को अपनी जमा-पूंजी का हिसाब पार्टी को देना होगा। लोकसभा में भाजपा के 282 सांसद और 55 राज्यसभा सदस्य हैं। देश भर में भाजपा विधायकों की संख्या 1096 है। निर्वाचित जन प्रतिनिधि चुनाव आयोग में भी अपनी चल-अचल सम्पत्ति का ब्योरा देते हैं। उन्हें विदेशी बैंक के खातों के संबंध में भी शपथ-पत्र देना होता है।
मोदी की राजनीतिक-मासूमियत (?) पर देश और जनता को फिदा होना चाहिए कि भाजपा में पारदर्शिता लाने के लिए वो कटिबद्ध हैं? सांसदों-विधायकों को यह जानकारी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को सौंपनी है। यदि प्रधानमंत्री सांसदों-विधायकों के खातों में कालेधन के उन्मुक्त-प्रवाह की काली लहरों को नापना चाहते हैं, तो उनकी यह मासूम चाहत कभी भी पूरी होने वाली नहीं है। विश्वास करना मुश्किल है कि देश की राजनीतिक धारा को उलटने की क्षमता रखने वाले मोदी को यह पता नहीं होगा कि काले धन की रंगीन दुनिया के घुंघरू किसके आंगन में थिरकते हैं और किसकी मसहरियों पर लरजते हैं? काले धन के कलुषित किले की प्राचीरों पर उन लोगों के नाम उजागर लिखे हैं, जिनके पास अकूत काली सम्पदा जमा है। मोदी को काले धन के शिकारियों को पकड़ने के लिए सबसे पहले सत्ता के अभयारण्य में जाल बिछाना होगा, जिसकी ओर उनका ध्यान नहीं है। पहले उनकी नीयत पर शक नहीं होता था, लेकिन फुलझड़ियां चमका कर शेरों को डराने की यह जुगत शंकाएं पैदा करती है कि दाल में कुछ काला जरूर है। मोदी सांसद-विधायकों के खाते की फुलझड़ियां जलाकर नैतिकता का सूरज रचना चाहते हैं। सबको पता है कि इन खातों में कुछ नहीं मिलने वाला है।
मोदी को यदि सही अर्थों में राजनीति की जमीन पर नैतिकता की मिसाल पैदा करना है तो उन्हें भाजपा सांसदों-विधायकों और मंत्रियों से पूछना चाहिए कि उनके घरों के आगे खड़ी बीएमडब्ल्यू या मर्सीडिज कारें किसके नाम पर रजिस्टर्ड हैं? फारच्यूनर्स, एक्सयूवी- 500, फोर्ड एंडेवर, टाटा सफारी जैसी महंगी एसयूवी गाड़ियां उनके फ्लीट का हिस्सा कैसे हैं? क्या यह नहीं माना जाना चाहिए कि मोदी ने भाजपा के सांसदों-विधायकों को इरादतन यह निर्देशित नहीं किया है कि वो अपने बही-खातों के साथ अपनी पत्नी और बेटे-बेटियों के बैंक-अकाउंट का खुलासा भी करें। ’टैक्स-नेट’ से बचने के लिए ज्यादातर पब्लिक-सर्वेंट अपनी व्यावसायिक गतिविधियां परिजनों के नाम पर संचालित करते हैं। सम्पत्ति का कामकाज भी नजदीकी रिश्तेदारों के नाम पर चलता है। राजनीतिक हलकों में यह सवाल पूछा जा रहा है कि सिर्फ आठ नवम्बर से इकतीस दिसम्बर के बीच की जानकारी देने के मायने क्या हैं? सांसद-विधायकों के 51 दिन के अकाउंट्स की सीमित जानकारी को अपने राजनीतिक तरकश में रखने के पीछे मोदी के मंतव्य का खुलासा अभी नहीं हुआ है। खतरा यह है कहीं मोदी के इस अग्नि-बाण की अग्नि-वर्षा से उनके ही लोग नहीं झुलसने लगें।
मोदी का यह कदम जन-प्रतिनिधियों की परेशानी बढ़ाने वाला है, क्योंकि नैतिकता की संरचना प्याज के छिलके जैसी होती है। विपक्ष यह सवाल उठा रहा है कि यह राजनीतिक नौटंकी है। ब्योरे में नवम्बर से पहले के अकाउंट्स को भी जोड़ा जाए। किसी शायर ने यूं ही नहीं कहा है कि ’बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी...।’ कोई कुछ कहने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि यह नरेन्द्र मोदी का फरमान है। मोदी यह खेल शायद इसलिए खेल रहे हैं कि राजनीतिक-धुंध को और गहरा किया जा सके। देखना दिलचस्प होगा कि जब प्याज के छिलके उतरेंगे, तो किसकी आंखें जलेंगी, किसके आंसू बहेंगे...। [ लेखक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।]
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