‘राम-कथा’ में ‘गरुड-पुराण’ की बानगी से मुद्रा-उत्सव में खलल
umesh trivedi

 

उमेश त्रिवेदी 

लोकसभा में नोटबंदी पर इसलिए बात नहीं हो पा रही है कि मोदी-सरकार मत-विभाजन की व्यवस्थाओं के तहत बहस करने को तैयार नहीं है, जबकि राज्यसभा में इसलिए गतिरोध बना हुआ है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सदन में बैठ कर बहस सुनने और जवाब देने को तैयार नहीं हैं। नोटबंदी के मामले में विपक्ष सदन में कुछ भी नहीं कह सके, यह भाजपा के लिए फायदेमंद है।  सदन में प्रतिपक्ष की सामूहिक मांगों में तकनीकी या राजनीतिक दृष्टि से भाजपा के लिए मुसीबतें पैदा करने वाली कोई बात नहीं है, फिर भी मोदी-सरकार सदन में चर्चा के लिए तैयार नहीं है। 

इसके राजनीतिक कारणों की विवेचना से पहले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के वह बयान गौरतलब है, जो उन्होंने नोटबंदी की प्रतिक्रिया में दिया है। बकौल नीतीश कुमार ’मोदी अब शेर की सवारी कर रहे हैं, जो उनके गठबंधनों को नुकसान पहुंचा सकता है, लेकिन उनके इस कदम के पक्ष में भारी जन समर्थन है, इसलिए हमें उस जन समर्थन का सम्मान करना चाहिए।’ 

पिछले दो सप्ताह में मोदी की नोटबंदी पर यह सबसे संजीदा और बारीक राजनीतिक-प्रतिक्रिया है, जिसे मीडिया मोदी के समर्थन में प्रचारित कर रहा है। प्रतीक्षा, परिणाम और प्रतिक्रिया की रणनीति के तहत यह बयान मोदी का समर्थन नहीं है। इसकी परिपक्वता ’शेर की सवारी’ के आत्मघाती खतरों की ओर इशारा करती है कि चुनौतियां आसान नहीं हैं। विपक्ष को इतना शोर नहीं मचाना चाहिए कि शेर दूर जंगलों में गुम हो जाए और मोदी जंगल की धूल झाड़कर फिर खड़े हो जाएं। 

संसदीय लोकतंत्र की  आदर्श परम्पराओं के मद्देनजर लोकसभा और राज्यसभा में कार्रवाई सुचारू रूप से चलाने की जिम्मेदारी सत्तारूढ़ दल और सरकार की होती है। भाजपा अपने इस उत्तरदायित्व पर खरी नहीं उतर रही है। भाजपा को गरूर है कि मोदी ने शेर को अपने वश में कर लिया है, जो उनके इशारे पर विपक्ष को सभी पार्टियों को मटियामेट कर सकता है। काले धन की बंदिशों के साथ देश का राजनीतिक एजेण्डा भाजपा ने तय किया है। भाजपा माहौल बनाने में सफल रही है कि विपक्ष काले धन पर सरकार का विरोध कर रहा है। सदन की कार्यवाही में गतिरोध को भी भाजपा इसी रूप में परोस रही है। सदन में चर्चाओं से मोदी-सरकार की प्रशासनिक कमजोरियां उजागर हो सकती हैं, जो सरकार को कबूल नहीं है।

नोटबंदी पर सदन में गतिरोध मोदी-सरकार के लिए फायदेमंद है। भाजपा इस बात का तर्कसंगत जवाब देने में असमर्थ है कि लोकसभा में स्पष्ट बहुमत होने के बावजूद मत-विभाजन के नियम 56 के तहत सदन में चर्चा कराने से वह क्यों कतरा रही है? क्या भाजपा को लगता है कि नियम 193 के अंतर्गत होने वाली सामान्य चर्चा में लगने आरोप नियम 56 के तहत स्थगन प्रस्ताव के आरोपों से भिन्न होंगे? हर हाल में आरोपों का भाजपा को एक ही जवाब देना है। 

संसदीय नियम प्रक्रियाओं में सरकार तय कर सकती है कि सदन में उसकी ओर से कौन जवाब देगा? फिर भी विषय-परिस्थितियों के मान से सत्ता पक्ष सौहार्द और समन्वय की दृष्टि से लचीला लोकतांत्रिक रुख अख्तियार करते रहे हैं। काले धन के मामले में भाजपा को मिली बढ़त के ये मायने तो कतई नहीं होना चाहिए कि वह विपक्ष की आवाज को ही अनसुना कर दे। नियम 56 के अन्तर्गत होने वाली चर्चाओं का सरकार को सिलसिलेवार जवाब देना पड़ता है। प्रधानमंत्री की दिक्कत यह है कि वो नोटबंदी के लाभों के सैद्धांतिक पक्ष को काफी मजबूती से रख सकते हैैं, उनके पास उन दिक्कतों का जवाब नहीं है, जो कतार में खड़ी जनता भुगत रही है। इन परिस्थितियों में सरकार की तैयारियों का खुलासा उसकी नजरें झुकाने वाला है। समस्या के ’मेग्नीट्यूड’  को नापने में मोदी-सरकार चूकी है। सरकार यह बताने में भी असमर्थ है कि समस्या कितने दिन में निपट जाएगी? विमुद्रीकरण की राम कथा के महात्म्य में गरुड पुराण का उल्लेख मुद्रा-उत्सव में खलल डाल सकता है? भला भाजपा इसे क्यों पसंद करेगी? बेहतर विकल्प यही है कि जब तक संभव हो, चर्चा को टाला जाए। [लेखक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है ]

Dakhal News 22 November 2016

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