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उमेश त्रिवेदी
भारत के राज्यो में पानी के बंटवारे को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की अवमानना के सवाल और घटनाएं संवैधानिक व्यवस्थाओं के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। तमिलनाड़ू और कर्नाटक की लड़ाई के बाद अब पंजाब और हरियाणा ने म्यान से तलवारे निकाल ली हैं। हरियाणा के हक मे सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने चुनाव की सुलगती सियासत की आग में घी डालने का काम किया है। भाजपा, कांग्रेस और अकालियों की आंखे मगरमच्छ के आंसूओं से भर उठी हैं। यमुना-सतलज के पानी लिए जार-जार रोते पंजाब के नेताओं के मुखौटे संविधान की अवधारणाओं की खिल्ली उड़ा रहे हैं। सरकारें संविधान और कानून की रक्षा की शपथ लेती है। लेकिन पंजाब और हरियाणा की केशरिया-सरकारें संविधान की लक्ष्मण-रेखाओं को दुत्कार रही हैं। लोकतंत्र में निर्वाचित सरकारों का यह मर्यादाहीन आचरण चिंतनीय है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि पंजाब के चुनाव के मद्देनजर केन्द्र-सरकार विवादों के सामने पीठ फेर कर खड़ी हो गई है।
न्यायमूर्ति एआर दवे की अध्यक्षता मे सुप्रीम कोर्ट के पांच जजो की पीठ ने पंजाब विधानसभा के उस कानून को रद्द कर दिया है, जिसके तहत पंजाब सरकार ने हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान. जम्मू-कश्मीर, दिल्ली और चंड़ीगढ़ के साथ जल-बंटवारा समझौता खत्म करने का फैसला लिया था। पीठ ने कहा है कि 2004 में पंजाब विधानसभा व्दारा पारित कानून 2003 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की मंशाओं के विरूध्द था। पंजाब ने सतलज-यमुना लिंक की 40 साल पुरानी परियोजना को एकतरफा रद्द कर दिया था। अन्तर्राज्यीय-जल योजनाओं के मामलो में किसी भी राज्य की मनमानी का यह अभूतपूर्व उदाहरण था। 2004 मे केप्टन अमरिन्दरसिंह-सरकार ने विधानसभा में कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को निष्प्रभावी करने की कोशिश की थी। राष्ट्रपति के रेफरेंस के 12 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है।
फैसले को हरियाणा की जीत के नजरिए से नही देखा जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का निर्णय देश के संघीय ढांचे को मजबूती और ताकत देगा। देश मे राज्यो के बीच पानी को लेकर होने वाली राजनीति पर रोक लगेगी। राजनीतिक दल शरारतपूर्वक ऐसे मुद्दो को जिंदा रखना चाहते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि कानून बनाने की स्वायत्तता को नाम पर कोई राज्य चाहे जैसे कानून बनाकर राष्ट्र के हितो से खिलवाड़ नही कर सकेगें। पार्टियों के राजनीतिक दांव-पेंच कानून के सामने बौने हैं। पंजाब और हरियाणा की घटनाओं से स्पष्ट है कि राजनीति किस हद तक कानून और संविधान की अवहेलना कर सकती है? 2004 में पंजाब विधानसभा ने जब यह कानून बनाया था, तब भाजपा और कांग्रेस साथ-साथ खड़े थे। यदि राज्य सरकारे ही सुप्रीम कोर्ट के निर्णयो के खिलाफ रास्ता निकालना शुरू कर देगीं, तो इस देश के संघीय ढांचे का क्या होगा?
संवैधानिक व्यवस्थाओं और सुप्रीम कोर्ट के प्रति निर्वाचित सरकारों की बेअदबी और नामंजूरी भारत की लोकतांत्रिक-व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती है। हरियाणा में भाजपा की सरकार है और पंजाब में भाजपा के समर्थन से अकाली दल के नेता सरकार चला रहे है। केन्द्र में भी भाजपा का शासन है, जिसके प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के राजनीतिक-दबदबे के आगे कोई भी सिर उठाने का साहस नही ऱखता है। इसके बावजूद पंजाब और हरियाणा की सरकारों की राजनीतिक-बगावत के मायने समझना होंगे। इसका सबसे बड़ा संकेत तो यही है कि चुनाव की बेला में राजनीतिक दल संविधान और लोकतंत्र के किसी भी अनुशासन को नही मानते हैं।
दोनो राज्य-सरकारो के बागी तेवर इस बात के संकेत है कि देश की राजनीति अराजक और निरंकुश हो चली है। सरकारें संविधान को हाशिए पर रखना चाहती है। पार्टियों को नहीं भूलना चाहिए कि चुनाव आयोग उन्हे भारतीय कानून के तहत मान्यता देता है। सुप्रीम कोर्ट कानून और संविधान की रक्षक है। राजनीतिक-दलों को सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को ही अमान्य अथवा अपमानित करके लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाने का हक नही हैं। कोई राजनीतिक दल यदि संविधान, कानून और सुप्रीम कोर्ट के आदेशो और अवधारणाओं का उल्लंघन करता है, तो क्या उसकी मान्यता रद्द करने की पहल नही होना चाहिए? [लेखक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।]
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