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भरतचन्द्र नायक
प्रकृति रहस्यों की जानकारी हमारी पुरातन तासीर है। यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि प्रकृति ने इंसान को स्वावलंबी बनानं के लिए जल, वायु, वनाच्छादित जंगल, रत्नगर्भा भूमि का उपहार दिया है। संस्कृति का विकास प्रकृति के सानिध्य में हुआ। आदिकाल से मानव ने नदी-सरोवर के तट पर अपना नीड़ बनाया और सभ्यता ने पंख पसारे है। हमारे शारीरिक सौष्ठव के विकास में प्रकृति, पेड़-पौधों, वनस्पतियों, जड़ी-बूटियों का चोली-दामन का साथ रहा। मौसम की प्रतिकूलता से निपटनें के लिए प्रकृति ने ही कवच दिया। मुद्रण कला के अभाव में प्रकृति का ज्ञान कहावतों और दंत कथाओं में गुंफित रहा। प्राकृतिक ज्ञान की संपन्नता पीड़ियों के साथ विलोपित हो गयी। प्राकृतिक संपदा पेड़-पौधों, फसलों में भारत जितना समृद्ध है, उसके प्राकृतिक गुणों, आर्थिक लाभों और रसायनिक प्रयोगों के ज्ञान में हम उतनें ही दरिद्र है। यही कारण है कि हमारी प्राकृतिक संपदा पर संपदा का अधिकार आज विदेशी जता रहे है। इस संपदा का डाॅक्यूमेंटेशन न हो पाना हमारी विफलता है। पादप संरक्षण, संवर्धन, प्रसंस्करण की दिशा में प्रयास आरंभ हुए है, उनका विस्तार हो रहा है। संतोष का विषय है लेकिन हमें उदासीन होकर रह जाने की नहीं प्रगतिशीलता, अन्वेषण के लिए वैज्ञानिक तेवर अपनाने की आवश्यकता है। मध्यप्रदेश राज्य लघु वनोपज व्यापार एवं विकास सहकारी संघ मर्यादित का गठन इस दिशा में एक लघु प्रयास, लेकिन आशा की किरण कही जा सकती है। प्राकृतिक पादपों, पेड़-पौधों, जड़ी-बूटियों का प्रयोग औषधि निर्माण होने के साथ सौंदर्य प्रसाधन के रूप में हो रहा है। ये उत्पाद आयुर्वेद के आधार है। इनकी बढ़ती महत्ता का सहज अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि विश्व में आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों का बाजार बढ़कर डेढ़ अरब डालर का हो चुका है। जड़ी-बूटियों की दो तिहाई उपलब्धता भारत और चीन में है। हिमालय की श्रृंखला ने इस धरोहर को संजोया है। दुनिया में आयुर्वेदिक उपचार पद्धति की ओर बढ़ते झुकाव के कारण जहां आयुर्वेदिक रसायनों का व्यापार हर वर्ष 25 प्रतिशत बढ़ रहा है। ऐलोपैथी का विस्तार सिकुड़कर 8 प्रतिशत बताया जाता है। आयुर्वेदिक रसायनों की विश्व बाजार में बढ़ती मांग ने दुनिया के देशों की नजरें भारतीय संपदा पर गड़ा दी है। हमारे अश्वगंधा, नीम, लहसुन, इसबगोल, धीक्वार, जामुन, भृंगराज, तुलसी, काला जीरा, अर्जुन कालीमिर्च, शलाकी, हल्दी, बेहड़ा, ब्राम्ही, आंवला जैसी सौ से अधिक उत्पादों के औषधीय गुणों के कारण विदेशी संपदा के अधिकार में दावा जता रहे है। अमेरिका और यूरोप की बहुराष्ट्रीय कंपनियां सिर्फ पादप, जड़ी-बूटियांे पर ही नहीं भारत के रसगुल्ला, चटनी और राजस्थान के विशेष प्रकार के नमकीन पर भी अपना एकाधिकार करनें के लिए लालायित है। भारत की पादप परिषद और राज्यों के इस दिशा में सचेष्ठ संगठनों को अपनी सक्रियता पूरी आक्रामकता के साथ जताने का यह उपयुक्त समय है। साथ ही विश्लेषण, अनुसंधान, प्रसंस्करण के क्षेत्र में शिद्दत के साथ उतरना समय की मांग है। भारत की सबसे बड़ी दुर्बलता यहां की गतानुगतिक तासीर रही है। विरासत को लुके-छिपे सौंपने, सार्वजनिक न करनें की परंपरा ने नुकसान पहुंचाया है। पारंपरिक आयुर्वेदिक, जड़ी-बूटियों का प्रामाणिक लेखन करनें में हमारी असमर्थता दोषी है। पारंपरिक ज्ञान प्रचलन में रहा, लेकिन लेखबद्धता में कृपणता हमारे लिए भारी पड़ी है। भारत सरकार के भारतीय चिकित्सा पद्धति और होम्योपैथी विभाग ने सर्वेक्षण में पाया है कि 16 जलवायु क्षेत्रों में पचास हजार से अधिक पेड़-पौधे है, जिसमें औषधि के उपयोग के करीब 15 हजार के करीब है। विश्व बाजार में भारत ने पांच सौ करोड़ रू. से बढ़ाकर अपनी हिस्सेदारी 5000 करोड़ रू. तक करने का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए राज्यों में गठित स्टेट मेडिकल प्लान्ट बोर्डों की जबावदेही बढ़ गयी है। मध्यप्रदेश मंे इस दिशा में शुरूआत से ही प्रयास होना है। स्टेट मेडिकल प्लान्ट बोर्ड के गठन में कृषि विश्वविद्यालयों, वन पर्यावरण, कृषि, उद्योग मंत्रालय के साथ ही स्वयंसेवी संगठनों, विशेषज्ञों की भागीदारी सुनिश्चित किये जाने की आवश्यकता है। वैश्विक स्तर पर चल रही स्पर्धा को देखते हुए प्रयासों में विलंब अथवा ठहराव की गुंजाईश नहीं है। जड़ी बूटियों के उत्पादन में बदलते मौसम का प्रतिकूल असर है। इसलिए इनकों सहेजनें, संवारनें और उत्पादन करनें के लिए काश्त की शक्ल देने और इनकी काश्त को उद्योग का दर्जा देने की आवश्यकता पर सरकार को विचार करनें की जरूरत है। उत्तरांचल, हिमालय, जम्मू-कश्मीर, मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में वन प्रान्तर की अधिकता के साथ जड़ी-बूटियों का भंडार रहा है। लेकिन इनका विदेशों के जानकार मनमाने ढंग से दोहन करते चले आ रहे है। जब कभी अजनबी व्यक्ति वनों में पाया जाता है, समाचार-पत्रों में खबर तो बन जाती है, लेकिन इसके रहस्य की जड़ तक पहुंचनें की प्रवृत्ति अब तक विकसित नहीं कर पाये है, जिसका खामियाजा देश को भुगतना पड़ा है
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