Patrakar Priyanshi Chaturvedi
उमेश त्रिवेदी
नीतियों और नेतृत्व के मामले में तदर्थवाद की तगाड़ी सिर पर रख कर राजनीतिक ठुमके लगाने वाली कांग्रेस को अब यह समझ लेना चाहिए कि भारत में राजनीति अब नई करवट ले चुकी है। रीति-नीति और सवालों को लेकर देश की जनता के मन में कोई भ्रम नही है। वो दो टूक फैसले चाहती है और पसंद करती है। कांग्रेस और उसके नेताओं के पास अनिश्चय और अनिर्णय के चक्रव्यूह से बाहर निकलने के लिए ज्यादा वक्त नही बचा है। उनके सामने भाजपा जैसी संगठित टीम मौजूद हैं, जो राजनीति के किसी भी प्रारूप में परिस्थितियों को पढ़कर रणनीति बनाने में सक्षम हैं। भाजपा के पास नरेन्द्र मोदी जैसा माहिर खिलाड़ी है, जिसके पास राजनीति के टी-ट्वेण्टी, वन-डे और टेस्ट, हर प्रारूप में बल्लेबाजी और बाउन्सर फेंकने की महारथ है। वह सर्जिकल स्ट्राइक और करंसी बदलने जैसे निर्णायक और निडर फैसले लेकर समर्थन में तालियां और विरोध में गालियां सहने का साहस रखता है, जबकि कांग्रेस के पास राजनीति में निर्णायक पहल करने वाला चेहरा गुमशुदा है। ताजा उदाहरण यह है कि कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी कांग्रेस कार्यसमिति के आग्रह के बावजूद राहुल गांधी अपनी मां के स्थान पर कांग्रेस का अध्यक्ष पद स्वीकार करने से इंकार कर दिया हैं।
कार्यसमिति की पदाधिकारियों की दलील है कि सोनिया गांधी अठारह साल व याने 1998 से कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष पद संभाल रही हैं और अब उनका स्वास्थ्य उनका साथ नही दे रहा है। इस बार भी सोनिया गांधी की अनुपस्थिति में राहुल गांधी ने ही कार्यसमिति की मीटिंग की अध्यक्षता की थी, लेकिन जब औपचारिक रुप से अध्यक्ष पद संभालने की बात आई तो राहुल गांधी मुंह फेरकर खड़े हो गए। देश यह बात समझना चाह रहा है कि आखिरकार राहुल गांधी औपचारिक रूप से अध्यक्ष पद का दायित्व लेने को तैयार क्यों नही है? कांग्रेस में ज्यादातर नेता मिट्टी के माधव की तरह निरीह और निरापद है, संगठन मे उम्र दराज नेता उनकी राजनीतिक बागबानी को दिन-रात सींचने में लगे रहते हैं, उनके जयकारे में मशगूल उनकी युवा ब्रिगेड के गला सूख चुका है, मां अपने बेटे की राजनीति को मंत्रमुग्ध होकर निहार रही है, बहन प्रियंका भाई पर कुर्बान है, वरिष्ठ नेता झांझ-मंजीरे के साथ उनका स्तुति-गान कर रहे हैं, फिर भी है कि राहुल बेगानों जैसा व्यवहार कर रहे है। आखिर क्यों, कांग्रेसी-नेताओं के लंबे राजनीतिक विरह-गानों के बाद भी राहुल विरागी बने हुए हैं?
गौरतबल पहलू यह है कि भले ही राहुल गांधी कांग्रेस में नम्बर वन याने अध्यक्ष नही हो, लेकिन कांग्रेस के अच्छे-बुरे कामों का यश-अपय़श उन्ही के राजनीतिक-खातों में जमा हो रहा है। अभी लोग यह कहते है कि राहुल गांधी 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस के पराजय के सिलसिले को संभाल नही पाए हैं। केरल और असम की चुनावी पराजय को लिए उनके नेतृत्व को जिम्मेदार माना जा रहा है। अब उत्तर प्रदेश के चुनाव मे भी वो कसौटी पर हैं, जंहा पिछले चुनाव में कांग्रेस को 403 में से मात्र 28 सीटे मिल पाई थीं। लोकसभा चुनाव में भी वो बमुश्किल अपनी सीटे बचा पाए थे।
कांग्रेस मे स्थिरता के अभाव में नीतिगत विसंगतियों के कारण हास्यास्पद स्थितियां बनती रहती हैं। कांग्रेस को यह पता नही है कि उप्र में वो अकेले चुनाव लड़ना चाहती है अथवा गठबंधन पर सवाल होना चाहती है? प्रियंका गांधी को लेकर असमंजस हमेंशा बना रहता है कि वो कब काग्रेस को कृतार्थ करेगी? हर मुद्दे पर कांग्रेस-नेताओं के सुरो में भिन्नता नजर आती है। हजार और पांच सौ रूपयों के नोटो को चलन से बाहर करने के बारे में भी कांग्रेस किसी गंभीर राजनीतिक-बहस के लिए तैयार नही दिखती है। सभी जानते है कि मुद्रा में बदलाव ब्लेक मनी से लड़ने का समग्र और अंतिम उपाय नही है। इसके नतीजे पहले भी आशा के अनुकूल नही रहे हैं। कांग्रेस नेता मुद्दों को पकड़ ही नही पाते हैं। राजनीतिक-निबंध पढ़कर बतौलेबाजी करने वाली पौध कांग्रेस को राजनीतिक-बियाबान से कैसे उबारेगी, यह सवाल को लेकर राजनीतिक-हलके बेसब्र हैं? कांग्रेस का तदर्थवाद देश की राजनीति को निरंकुशता की ओर ढकेल रहा है। क्योंकि एक ताकतवर और अकलवर विपक्ष प्रजातंत्र की सेहत की बुनियादी जरूरत है। भाजपा को यह नही लगना चाहिए कि उसके विकल्प समाप्त हो चुके है। [सुबह सवेरे से लेखक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।]
Dakhal News
|
All Rights Reserved © 2026 Dakhal News.
Created By:
Medha Innovation & Development |