Patrakar Vandana Singh
जो सोचना पहले असंभव था, वह अब हकीकत है। ढाई महीने बाद (अगले 21 जनवरी से) डोनाल्ड ट्रंप ह्वाइट हाउस में होंगे। तब उनके हाथ में परमाणु हथियारों के बटन, वैश्विक कूटनीति के निर्णायक सूत्र और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को आमूल रूप से प्रभावित करने वाली शक्तियां होंगी। किसी नेता की चमत्कारी जीत के समय ऐसी बातें याद नहीं की जातीं। लेकिन ट्रंप की पृष्ठभूमि और उनकी सफलता का संदर्भ ऐसा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में उनकी अप्रत्याशित जीत के साथ यही बातें बार-बार जेहन में आती हैं। इसलिए कि ट्रंप क्या हैं, उनकी नीतियां क्या हैं, वे किस दिशा में जाएंगे, इस बारे में फिलहाल कोई अंदाजा नहीं है। एक साल के अंदर अमेरिकी राजनीति के बारे में बनी-बनाई धारणाओं को वे इस तरह ध्वस्त करते गए कि विश्लेषकों को उनके बारे में समझ बनाने का मौका ही नहीं मिला। पहले मानकर चला गया कि अपनी भड़काऊ बातों से ट्रंप चर्चित भले होते हों, लेकिन रिपब्लिकन पार्टी की उम्मीदवारी वे हासिल नहीं कर पाएंगे। मगर जब ये करिश्मा उन्होंने कर दिखाया, तो धारणा बनी कि अब डेमोक्रेटिक पार्टी की मध्यमार्गी समझी जाने वाली उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन आसानी से जीत जाएंगी। किंतु अब स्पष्ट है कि ये समझ अमेरिकी सियासत की जमीनी सच्चाइयों से कटी हुई थी। हैरतअंगेज है कि चुनाव-पूर्व जनमत सर्वे करने वाली एजेंसियां भी जनमत की अंतर्धारा का आभास नहीं पा सकीं। मतगणना शुरू होने तक वे हिलेरी क्लिंटन की जीत की भविष्यवाणी करती रहीं। अब ऐसे तमाम पूर्वानुमान मुंह के बल धराशायी पड़े हैं।
उधर अमेरिका, बल्कि सारी दुनिया इस चुनाव परिणाम के दूरगामी परिणामों पर माथापच्ची कर रही है। ट्रंप की छवि मूडी शख्स की है। उन्होंने अब तक का जीवन विलासिता में गुजारा है। राजनीति में प्रवेश उन्होंने लोगों के भय व सामाजिक-सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों को भड़काते हुए किया। अमेरिका को अपने दड़बे में समेटने की बात की। बहुपक्षीय व्यापार तथा जलवायु परिवर्तन जैसी अंतरराष्ट्रीय संधियों से अमेरिका को निकालने के वादे किए। देश के अंदर अति धनी लोगों के लिए टैक्स कटौती करने और आव्रजकों (खासकर मुस्लिम) पर पाबंदी लगाने की घोषणाएं कीं। यह सब वे कैसे करेंगे, किसी को अंदाजा नहीं। ट्रंप पारंपरिक अर्थ में रिपब्लिकन नहीं हैं। अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी दक्षिणपंथी, रूढ़िवादी और यथास्थितिवादी समूहों के हितों की नुमाइंदगी करती है। लेकिन ऐसा वह उन सियासी मर्यादाओं के दायरे में रहते हुए करती थी, जिन पर आम-सहमति थी। डोनाल्ड ट्रंप ने आरंभ से ही वे मर्यादाएं तोड़ीं। यह फॉर्मूला कामयाब रहा। बिना अपनी पार्टी के पूर्ण समर्थन के भी उन्होंने अनपेक्षित को सच कर दिखाया। इसके साथ ही अमेरिका और विश्व में अनिश्चित स्थिति उत्पन्न् हुई है। दरअसल, ट्रंप को राष्ट्रपति चुनकर अमेरिका ने एक अनजान और अपरिचित पथ पर कदम रखा है।
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