केंद्र और सुप्रीम कोर्ट के बीच मतभेदों की खाई
उमेश त्रिवेदी

उमेश त्रिवेदी

सोमवार को दिल्ली हायकोर्ट के स्वर्ण जयंती समारोह के बाद स्पष्ट है कि केन्द्र-सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच मतभेदों की खाई गहराती जा रही है। समारोह में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का यह खुलासा सनसनीखेज है कि जजों के फोन भी टेप हो रहे हैं। केजरीवाल ने कतिपय जजों की परस्पर बातचीत के हवाले से यह बात कही थी। केजरीवाल को गंभीरता से इसलिए लेना जरूरी है कि उन्होंने यह बात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद की मौजूदगी में कही थी। समारोह में ही कानून मंत्री व्दारा केजरीवाल के आरोपों को खारिज करना असामान्य नहीं हैं, लेकिन केजरीवाल के आरोपों के बाद केन्द्र सरकार जितनी असहज दिखी, उतनी असहजता न्यायपालिका में देखने को नहीं मिली। समझना जरूरी है कि न्यायाधीशों ने इस बात को तटस्थ भाव से क्यों सुना...? प्रधानमंत्री मोदी रिश्तों की खटास को भांप चुके थे। स्वर्ण जयंती समारोह की रोशनी में परिलक्षित तनाव के धुंधलकों को फूंक मारते हुए प्रधानमंत्री ने यूं ही नहीं कहा था कि हायकोर्ट की पचासवीं सालगिरह पर मुकदमों के बोझ से दबी न्यायपालिका को तनाव भूल कर मुस्कुोराने की कोशिश करना चाहिए। लेकिन न्यायपालिका के चेहरे मुस्कुराहट आसानी से पैदा होने वाली नहीं है।    

चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर हर मंच पर यह आवाज लगा रहे हैं कि न्याय की दुनिया मे 'ऑल इज नॉट वेल'...'सब कुछ ठीक नही है'...। आमतौर पर न्याय-पालिका के साथ सरकारों के रिश्तों में असहजता बनी रहती है। लेकिन मोदी-सरकार के साथ सुप्रीम कोर्ट के रिश्ते असामान्य तरीके से तनावपूर्ण होते जा रहे हैं। भारत में ये परिस्थितियां शायद इसके पहले नहीं बनी होंगी कि देश के चीफ जस्टिस को कहना पड़े कि वो न्यायाधीशों की नियुक्तियों से संबंधित फाइलें दबाकर बैठे प्रधानमंत्री कार्यालय और कानून मंत्रालय के सचिवों को न्यायालय की अवमानना के आरोपों में कठघरे में खड़ा कर देगें। मायने यह है कि पानी सिर से गुजरने लगा है। 

चीफ जस्टिस की अध्यक्षता में गठित सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय बैंच ने केन्द्र से पूछा है कि वह सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम व्दारा अनुमोदित नामों की फाइल नौ महीनों से दबाकर क्यो बैठा है? यदि आपको कुछ नामों पर ऐतराज है, तो फाइल वापस भेजिए, हम पुनर्विचार करेंगें, लेकिन फाइल रोक कर आप लोग सिस्टम में कौन से इंकलाब पैदा करना चाहते हैं? सुप्रीम कोर्ट यह बरदाश्त नहीं करेगा कि कार्यपालिका की अक्षमताओं के कारण कोई संस्था तबाह हो जाए। बैंच ने कहा है कि कर्नाटक हायकोर्ट के कई कमरों में जजों की कमी के कारण ताले लगे हैं। देश की हायकोर्टों में 38 लाख मुकदमे लंबित हैं, जजों की कमी के कारण जिनका निपटारा संभव नहीं हो पा रहा है। जजों की नियुक्तियों को रोक कर सरकार अब न्यायपालिका के दरवाजों पर ताला लगाना चाहती है। सुप्रीम कोर्ट इस बात से नाखुश है कि इलाहाबाद हायकोर्ट में 35 जजों के नाम को क्लीयर करने के बावजूद केन्द्र सरकार उन पर कुंडली मार कर बैठी है। 

दिलचस्प यह है कि चीफ जस्टिस की लगातार टिप्पणियों के बावजूद केन्द्र सरकार के प्रवक्ता ढिठाई के साथ कह रहे हैं कि उच्च न्यायालयों में जजों की रिक्तियों में कुछ भी असाधारण नहीं हैं। पिछले दस साल के आंकडों के विश्लेषण से साफ है कि हायकोर्ट्स में 265 से 280 स्थान हमेशा रिक्त बने रहे हैं। हायकोर्ट में जजों की कामकाजी- संख्या हमेशा 600 के आसपास रही है, जबकि वर्तमान में 620 जज काम कर रहे हैं।           

प्रतिबध्द न्यायपालिका के सवालों पर इंदिरा गांधी हमेशा कठघरे में रही हैं। खुद भाजपा उन पर ये आरोप मढ़ती रही है। मोदी सरकार के जमाने में कुछ अलग तरीके से या वैचारिक आधार पर न्यायपालिका पर नकेल डालने की कोशिशें हो रही हैं। सवाल यह है कि क्या मोदी-सरकार भी प्रतिबध्द न्यायपालिका की राहें तलाश रही है? जजों की नियुक्तियों में निर्णायक हस्तक्षेप की जरूरत सरकार को क्यों महसूस हो रही है? मई 2016 में मोदी सरकार के दो साल पूरे होने के अवसर अपने एक इंटरव्यू मे वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 'ज्यूडिशियल-एक्टीविज्म' के ताने-बाने में 'ज्यूडिशियल-ओवररीच' जैसे शब्दों को गढ़कर न्यायपालिका पर अंकुश लगाने की कोशिश की है कि न्यायपालिका को अपनी लक्ष्मण रेखाएं खुद निर्धारित करना चाहिए। [लेखक भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।]

Dakhal News 3 November 2016

Comments

Be First To Comment....

Video
x
This website is using cookies. More info. Accept
All Rights Reserved © 2025 Dakhal News.