मुंबई हमले के तुरंत बाद भी हो सकती थी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’
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उमेश त्रिवेदी

पूर्व विदेश सचिव एवं राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन के इस खुलासे कि मुंबई में 26/11 के हमले के बाद वे पाकिस्तान में आंतकी कैम्पों को तबाह करना चाहते थे, लेकिन इसलिए नहीं किया क्योंकि इससे विश्व जनमत पा‍किस्तान की तरफ हो जाता, कई सवाल खड़े करता है। एक तो इसकी टाइमिंग और दूसरे, इसका उद्देश्य। यह ‘खुलासा’ उस माहौल में आया है जब मुख्यम विपक्षी दल कांग्रेस ने मोदी सरकार के निर्देश पर सेना के ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की प्रामाणिकता पर प्रश्नचिन्ह लगाया और दूसरे मेनन इशारों में यह कहना चाहते हैं कि पाक ‍के खिलाफ जवाबी कार्रवाई करना ही भारत के ज्यादा हित में समझा गया। हालांकि वे यह स्पष्ट नहीं करते कि ऐसा न करके भारत और प्रकारातंर से तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार को कूटनीतिक, सैनिक और राजनीतिक स्तर पर क्या लाभ हुआ? इससे भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी या घटी?

शिवशंकर मेनन मुंबई में 26/11 हमले के समय देश के विदेश सचिव हुआ करते थे। बाद में यूपीए सरकार के चहेते होने के कारण उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनाया गया था। इन्ही शिवशंकर की हाल में एक किताब आई है-‘च्वाइसेस: इनसाइड द मेकिंग ऑफ इंडिया फॉरेन पॉलिसी’, जिसमें इन बातों का जिक्र है। यह किताब अमेरिका और ब्रिटेन में रिलीज हुई है। इसमें मुंबई में हुए भीषण आतंकी हमले के समय और बाद में देश और तत्कालीन सरकार की मनोदशा और सोच का वर्णन है। मेनन लिखते हैं कि वे मुंबई हमले के तुरंत बाद पाकिस्तान स्थित आतंकवादी कैंप्स को तबाह करना चाहते थे। वे चाहते थे कि लश्कर-ए-तैयबा के पीओके और मुरीदके स्थित कैंप और आईएसआई के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की जाए। 2008 में हुए इस हमले के बाद मेनन को लगता था कि “तीन दिन चले इस अटैक को पूरी दुनिया ने टीवी पर देखा। जिससे भारतीय पुलिस और सुरक्षा बलों की छवि पर धब्बा लगा था, इसे सैन्य कार्रवाई से मिटाने में काफी वक्त लग जाएगा। मेनन लिखते हैं कि जो वे चाहते थे, वह इसलिए क्रियान्वित नहीं हो सका क्योंकि ‘सरकार ने पाया कि पाकिस्तान पर हमला करने से ज्यादा फायदा हमला ना करने पर मिलेगा।‘ मेनन की दलील है कि यदि पाकिस्तान पर उस समय हमला कर दिया जाता तो पूरी दुनिया पाकिस्तानी सेना के सपोर्ट में आ जाती। साथ ही वहां की निर्वाचित  आसिफ अली जरदारी की असैन्य सरकार को भी खतरा हो सकता था। फिर पीओके और मुरीदके में आतंकी कैंप को तबाह करने से कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला था। उल्लेखनीय है कि 2008 में 26 से 28 नवंबर तक चले मुंबई आतंकी हमले में 26 विदेशियों समेत 166 लोगों की जान गई थी। हमला लश्कर-ए-तैयबा ने किया था। 

वरिष्ठ राजनेता शरद पवार के पिछले दिनों आए इस बयान को, कि यूपीए सरकार के दौरान भी सेना ने सीमा पर चार बार ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ किया था, इसी संदर्भ में समझा जाना चाहिए। पवार यह बताना चाहते थे कि ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का साहस केवल मोदी सरकार ने ही नहीं‍ दिखाया है। ऐसी कार्रवा‍इयां पहले भी होती रही हैं, लेकिन किसी ने उसको प्रचारित नहीं किया और न ही राजनीतिक श्रेय लेने की कोशिश की। 

सोचने का मुद्दा यह है कि यूपीए सरकार ने अगर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ करवाई और उसका श्रेय नहीं लिया तो इसके पीछे राजनीतिक परिपक्वता थी अथवा राजनीतिक साहस की कमी थी? उसी प्रकार यह भी पूछा जा सकता है कि यदि मुंबई हमले के तुरंत बाद पाक को सबक सिखाने का जोखिम भरा निर्णय लिया जाता तो भारत की दुनिया में धमक किस तरह की बनती? हाल की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के सियासी नफे-नुकसान जो भी हों, लेकिन जनता में यह सकारात्मक संदेश जरूर गया है कि मोदी सरकार ‘जैसे को तैसा’ में भरोसा रखती है। जनता में ऐसी ही आश्वस्ति मुंबई हमले के बाद भी पैदा की जा सकती थी। लेकिन उसके लिए स्पष्ट नीति और रिस्क उठाने की हिम्मत जरूरी थी और मनमोहन सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी भी यही थी। तत्काल जवाबी कार्रवाई न करने के जो लचर तर्क शिवशंकर ने दिए हैं, उससे कम ही लोग सहमत होंगे। क्योंकि कार्रवाई के साथ उसका ‘ढिंढोरा’ पीटने के लिए भी निर्भीकता और कुछ निर्लज्जता चाहिए। यह तभी आती है, जब सरकार आत्म संशय का ‍शिकार न हो। कर्णधारों के फैसले दूरगामी अर्थ में सही हैं अथवा गलत, यह तो इतिहास तय करता है। लेकिन उसका बोझ अगर वर्तमान में ही ढोने की हिमाकत की जाए तो कोई भी साहसिक फैसला लिया ही नहीं जा सकता। सांसद शशि थरूर ने हाल में एक इंटरव्यू में मोदी सरकार पर ‘इम्प्लीमेंटेशन पैरालिसिस’ (क्रियान्वयन लकवा) का आरोप लगाया है। यह किसी हद तक सही भी  है। लेकिन मनमोहन सरकार तो ‘पॉलिसी पैरालिसिस’ की मारी थी। ‘अमल में खामी’ की तुलना में ‘नीतिगत लकवा’ ज्यादा अक्षम्य है। [लेखक भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।]

Dakhal News 1 November 2016

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