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राघवेंद्र सिंह
मध्यप्रदेश में कई वर्षों के बाद हालात कुछ ऐसे बन रहे हैं कि हर कोई उम्मीदों के आसमान पर पंख लगाए उड़ रहा है, खासकर सियासी हलकों में। इंदौर की चौथी इन्वेस्टर्स समिट (मध्यप्रदेश में 5वीं) की सफलता को लेकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का मन कुलांचे भर रहा है, क्योंकि इंदौर में 5,62,847 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव मिले हैं। इससे उन्हें लगता है कि प्रदेश में उद्योग और रोजगार को लेकर अब अच्छे दिन आने वाले हैं। भले ही ये सपना चुनावी साल में हकीकत में तब्दील हो। कांग्रेस भी सरकार की कमजोर कड़ियों का लाभ लेकर 2018 के चुनाव की तैयारियों में जुट रही है। उसे लगता है कि भाजपा का असंतोष और सरकार विरोधी जनता का रुख बनता है तो अगली बार कांग्रेस को मौका मिल सकता है। इधर भाजपा में संघ के समर्थन से संगठन के बाद सरकार में भी स्वयंसेवकों के नए शक्ति केंद्र बनने के आसार हैं। बालाघाट के बैहर में स्वयंसेवक पर पुलिस के हमले के बाद सत्ता नियंत्रण को लेकर संघ की सोच में बदलाव देखने को मिल रहा है। अब उसका दखल पॉिजटिव और निर्णायक हो तो किसी को आश्चर्य नहीं होगा। संगठन और सरकार के अंदरखाने में ऐसी चर्चाएं भी चल पड़ी हैं। वेतनमान, बोनस को लेकर किसी की दिवाली हो न हो सरकारी तंत्र की तो पांचों उंगलियां घी में सिर कढ़ाई में है। कुल मिलाकर सब गच्च हैं।
मुख्यमंत्री चौहान पर संगठन, सरकार और औद्योगिक निवेश को लेकर चौतरफा दबाव है। निवेश के िलए विदेश यात्राएं, इन्वेस्टर्स समिट के प्रयास भी पिछले सालों बहुत सफल नहीं हुए। निवेश में उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिलने के पीछे सरकार कम नौकरशाही के अड़ंगे ज्यादा नुकसानदेह साबित हुए। इसलिए कहा जाता है कि मुख्यमंत्री तो अच्छे हैं लेकिन अधिकारी नहीं सुनते। पार्टी के भीतर भी यह बात कुछ सालों से जोर पकड़ रही थी। इसे राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने संघ और पार्टी की बैठकों के बाद जब मीडिया से कहना शुरू किया तो लगा कि मामला गंभीर है। मुख्यमंत्री भी चौकन्ने हुए लेकिन नौकरशाही अभी भी बेलगाम है। इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि इंदौर समिट में भाजपा के प्रिय और मोदी की नजदीकी बाबा रामदेव को 50 एकड़ से भी कम जमीन उद्योग लगाने के िलए देना का प्रस्ताव था। इसे बाबा ने यह कहकर हवा में उड़ा दिया कि इतनी जमीन में वो कबड्डी भी नहीं खेल पाएंगे। यह बताता है कि मुख्यमंत्री िनवेश के लिए जितने गंभीर हैं नौकरशाही उतनी ही नासमझ। यहीं से शुरू होती है कांग्रेस के बाद भाजपा के भीतर मुख्यमंत्री पर तीर-निशाने का दौर। जब लोग यह कहते हैं कि सीएम तो अच्छे हैं लेकिन अफसर नहीं सुनते तो यह मुख्यमंत्री की असफलता को ही दिखाता है। लेकिन इंदौर समिट के बाद उम्मीद की जाती है कि निवेश का जो नया आसमान मिलने जा रहा है उसमें नौकरशाही ज्यादा पॉजिटिव होगी और सीएम को अब सिंगल विंडो के बारे में पूछना नहीं पड़ेगा।
विष्णुदत्त के जलवे
सम्राट चंद्रगुप्त से लेकर अशोक तक विष्णुदत्त गुप्त जो बाद में चाणक्य के नाम से मशहूर हुए, भाजपा में इन दिनों एक विष्णुदत्त चर्चा में है। संघ से संस्कारित और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में सक्रिय रहते हुए भाजपा में प्रदेश महासचिव बने ये युवा नेता चाणक्य के रास्ते पर चल पड़े हैं। बीडी के नाम से पुकारे जाने वाले विष्णुदत्त शर्मा ने पहले तो महासचिव बनकर चौकाया और उसके बाद अपनी पसंद के नेता को प्रदेश युवा मोर्चा का अध्यक्ष बनवाकर अपनी ताकत पर एक तरह से सील-ठप्पा लगा दिया है। अलग बात है कि युवा मोर्चे के नए अध्यक्ष अभिलाष पांडे की राह में कई रोड़े आए थे। इसमें एक मामला चरित्र से जुड़ा था। यह उनके ‘शुभचिंतकों’ ने अध्यक्ष बनने से रोकने के िलए ट्रंप कार्ड के रूप में खेला था। लेकिन विष्णुदत्त ने अपने इस ‘अशोक’ (अभिलाष) की इस कमजोरी को ताकत में बदल दिया। संक्षेप में मसला एक महिला से प्रेम प्रसंग का था। अभिलाष ने बताया कि वो एक विधवा से शादी करने वाला है इसलिए इस मसले को तूल नहीं दिया जाना चाहिए। विधवा से विवाह कर वह एक मिसाल कायम करना चाहते हैं। विरोधियों द्वारा चरित्र से जुड़े इस हमले को बीडी और अभिलाष ने अपने पक्ष में कर लिया। पहले तो विष्णु दत्त महासचिव बने और अब महाकौशल से ताल्लुक रखने वाले अभिलाष को युवा मोर्चा का अध्यक्ष बनवा लिया। आगे बहुत संभव है कि पार्टी बीडी को मोर्चे का प्रभारी बना दे। इस पूरे मामले में बीडी से लेकर अभिलाष को संघ के दिग्गजों का समर्थन है। वरना चरित्र से जुड़े मसले के बाद कोई अध्यक्ष बन जाए ऐसा कम ही होता है।
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