राजनीति में लोकप्रियता और लोकनीति में बात
कैलाश विजयवर्गीय

उमेश त्रिवेदी

मध्यप्रदेश की राजधानी के नाते भोपाल के लिए यह अच्छा संयोग है कि उसकी राजनीतिक-आबोहवा इन दिनों अध्यात्म, धर्म और लोक-नीति से जुड़े मुद्दों और सवालों से सरगर्म है। 15 अक्टूबर को भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय के इस कथन पर राजनीतिक चिंगारियां उड़ने लगी थीं कि 'सत्ताधीशों के सभी लोकप्रिय फैसले लोक-हित की तराजू पर खरे उतरना संभव नहीं है। लोकहित और लोकप्रिय फैसलों के बीच राजनीतिक मजबूरियों की बारीक सी दरार, फैसले लेने वाले नेता हमेशा महसूस करते रहते हैं।' कैलाश विजवर्गीय की थ्योरी का परिमार्जन बुधवार को मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के इस कथन में ध्वनित होता महसूस हुआ कि 'जिसमें सबका सुख और सबका कल्याण हो, वही लोकनीति है। लोकनीति ऐसी होनी चाहिए, जो इन लक्ष्यों को पूरा कर सके।'  

15-16 अक्टूबर को भोपाल को श्रीअरविन्द सोसायटी (हिन्दी क्षेत्र) के सत्रहवें सम्मेलन की मेजबानी करने का अवसर मिला था, जिसमें देश के सभी हिन्दीभाषी राज्यों के प्रतिनिधियों ने शिरकत की थी। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि कैलाश विजयवर्गीय थे। धर्म और अध्यात्म की इसी भाव-भूमि पर इन दिनों राजधानी में सांची बौध्द एवं भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय व्दारा आयोजित चौथे धर्म-धम्म सम्मेलन के आयोजन में प्रमुख वक्ता और अतिथि मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान थे। अरविंद सोसायटी के सम्मेलन की थीम थी- 'अध्यात्म के राजनीति और समाज से संवाद', जबकि धर्म-धम्म सम्मेलन के पहले दिन की विषय-वस्तु थी- 'धर्म और राज व्यवस्था'।

 

राजनीति में लोक-प्रिय,लोक-हित, लोक-कल्याण और लोक-नीति जैसे शब्द मुहावरों के अलग-अगल स्वरूप में गूंजते रहते हैं। दोनों आयोजनों में भी वक्ताओं ने धर्म और अध्यात्म से जुड़े प्रसंगों में इन शब्दों की व्याख्या को अपने-अपने तरीकों से प्रस्तुत किया। व्याख्याएं राजनीति से परे थीं। इनका केन्द्रीय-भाव मनुष्यता के कल्याण मे अंतर्निहित था, लेकिन भोपाल के सियासी मिजाज के कारण इन व्याख्याओं  में राजनीति का कसैलापन घुल गया। श्रीअरविंद सोसायटी के आयोजन में कैलाश विजयवर्गीय ने अध्यात्म की पृष्ठभूमि में राजनीति की व्याख्या करते हुए कहा था कि राजनेताओं में नैतिक-बल और निर्भीकता के तत्व अध्यात्म के कारण ही विकसित हो पाते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी में परिलक्षित नैतिक आत्मबल और आत्म विश्वास का सबब अध्यात्म ही है। अध्यात्म को साधने वाले व्यक्ति की दूरदृष्टि सामान्य लोगों की तुलना में ज्यादा होती है। सर्जिकल स्ट्राइक जैसे साहसिक अभियानों के बीज में भी आध्यात्मिक आत्म-शक्ति काम करती है और बलूचिस्तान के जरिए पाकिस्तान में बगावत की चिंगारी सुलगाने की परिकल्पना का प्रादुर्भाव और समझ भी अध्यात्म से पैदा दूरदृष्टि के कारण सामने आती है। अध्यात्म राजनेताओं को जनहित के फैसले लेने की ताकत देता है। कैलाश विजयवर्गीय के इस कथन में सच्चाई है कि राजनीति में लोकप्रिय निर्णय लेना मुश्किल काम नहीं है। वैसे प्रजातंत्र की कई खूबियों के विपरीत लोकप्रिय बने रहने की मजबूरी लोकतंत्र की अपरिहार्य बुराई है। लोकप्रियता को साधने की गरज से होने वाले निर्णय कई मर्तबा लोक-हित की कसौटियों पर खरे नहीं बैठते हैं। चुनावी एजेण्डा के तकाजे सिर पर नाचते रहते हैं। चुनावी मजबूरियों के बावजूद यदि मोदी लोकहित की दिशा में कदम बढ़ा पा रहे हैं, तो सिर्फ आध्यात्मिक बल के कारण ही यह संभव हो पा रहा है।

कैलाश विजयवर्गीय की व्याख्याओं का आधार जहां अध्यात्म था, वहीं धर्म-धम्म सम्मेलन में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने लोक नीति की धारणाओं को धर्म की पृष्ठभूमि में पेश किया। बाबा तुलसीदास की रामायण की यह चौपाई शहर,  कस्बों और गांवों में सूक्ति की तरह लोगों को रटी हुई है कि- 'परहित सरिस धरम नहीं भाई। पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।' श्री अरविंद ने राजनेताओं के संदर्भ में स्पष्ट कहा है कि- 'राजनीति में खरा होने का अर्थ है सब कुछ देश के लिए करना, अपने निजी हित के लिए नहीं। जब अपने निजी हितों और देश के हितों के बीच संघर्ष हो तो खरा राजनेता देश के हितों को पहला स्थान देगा। 

यही एक ऐसा विधान है, जिसका राजनेताओं को पालन करना चाहिए।'  तुलसी और श्री अरविंद की अवधारणों के विपरीत देश की वर्तमान राजनीति के सच में कई प्रतिकूलताएं हैं। लोकप्रियता लोकतंत्र की बुनियादी मांग है, और लोकप्रिय होने के लिए अपनाए जाने वाले हथकण्डे देश के लिए घातक होते हैं। इसीलिए लोकप्रियता के तकाजे लोक-हित पर हमेशा हावी रहते हैं। इसीलिए बिजली-बिल माफ होते हैं, मिट्टी मोल राशन मिलता है। राजनेताओं के लिए यह सबसे आसान काम होता है। राजनीति में धर्म, अध्यात्म और लोक-कल्याण की मीमांसा तो होती रहती है, लेकिन व्यावहारिक राजनीति में इन मीमांसाओं को ठौर नहीं मिल पाता। राजनीति का इन विषयों पर बात करना अच्छान संकेत है। और शायद इसका एक प्रमुख कारण यह है कि जो लोग इन विषयों पर बात कर रहे हैं उनका संबंध भाजपा और राष्ट्री य स्वहयं सेवक संघ जैसे विचारशील संगठनों से है। बाकी दलों में यह अवकाश अनुपलब्ध  सा है।[ लेखक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।]

 

Dakhal News 21 October 2016

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