Patrakar Vandana Singh
उमेश त्रिवेदी
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के राजनीतिक-स्क्रीन पर दृश्य किसी फिल्म की सिनेमेटॉग्राफी की तरह इतनी तेजी से बदल रहे हैं कि दर्शक उसकी कहानी को कैच नहीं कर पा रहे हैं। इस कहानी में एक्शन है... ड्रामा है... इमोशन्स हैं... डायलॉग हैं... बाप-बेटे हैं... चाचा-भतीजे हैं...सत्ता के खेल हैं... फजीहत है... कह सकते हैं कि इस महाभारत कथा में कुछ भी नहीं छूटा है...। 'इमोशन्स' की बानगी अखिलेश और शिवपाल सिंह यादव के संवादो में है। एक्शन और ड्रामा मुलायम सिंह के किरदार में छलक रहा है। उन्होंने 72 घंटों के भीतर ही अखिलेश यादव को अपने उत्तराधिकार से बेदखल करके फिर से उनको युवराज घोषित कर दिया। मुलायसिंह अर्से से अखिलेश और शिवपालसिंह यादव के बीच जारी राजनीतिक द्वंद्व को शांत करने के लिए प्रयासरत हैं। वो तीन-चार बार सीटी बजाकर युध्द विराम के संकेत दे चुके हैं। लेकिन अहं का टकराव आसमान से नीचे जमीन पर उतरने को तैयार नहीं है। सपा के राजनीतिक-फलक पर बिजलियों का चमकना और कड़कना जारी है।
सपा सुप्रीमो मुलायमसिंह ने 14 अक्टूबर को यह घोषित किया था कि अखिलेश यादव मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं होंगे। नेता का चुनाव सपा विधायक दल करेगा। मात्र 72 घंटे बाद अब मुलायम कह रहे है कि अखिलेश ही मुख्यमंत्री के बतौर चुनाव-अभियान में शिरकत करेंगे। उनमें यह बदलाव पहेली की तरह अबूझ है। शायद मुलायम सिंह खुद नहीं समझ पा रहे हैं कि बॉल उनकी हथेलियों के बीच से बार-बार फिसल क्यों रही है? छोटे भाई शिवपाल को संतुष्ट करने के लिए मुलायम ने उप्र सपा की बागडोर सौंपी थी, लेकिन वो संतुष्ट नहीं हुए। पारिवारिक विरासत के सवाल पर शिवपाल के मन में चुभ रही फांस इस 'एपीसोड' के 'इमोशन्स' को एड्रेस करती है। फांस का घाव कितना गहरा है, इसकी बानगी रविवार को इटावा में देखने को मिली, जब संवाददाताओं से मुखातिब शिवपाल सिंह के जुबान से उनका दर्द छलक उठा कि- ''कुछ लोगों को बैठे-बिठाए विरासत मिल जाती है, किसी को भाग्य से तख्त हासिल हो जाते हैं। लेकिन उन लोगों को कुछ भी हासिल नहीं होता, जो समर्पण भाव से मेहनत करते हैं।'' मुलायम की पिछली घोषणा के बाद कुछ भीगे-भीगे अंदाज में अखिलेश ने भी कहा था कि –''बचपन में मुझे ही अपना नाम रखना पड़ा था, उसी तरह लगता है कि चुनाव-प्रचार भी खुद ही करना पड़ेगा। मुझे कुछ वक्त के लिए मुश्किल हालात में फंसाया जा सकता है, लेकिन हराया नहीं जा सकता...।'' विवादों के चलते अखिलेश यादव दूरियों को महसूस करते हुए अपना घर, अपना दफ्तर भी बदल कर अपने पिता से दूर चले गए थे। यादव-परिवार में तनाव और उत्पीड़न के इस दौर में अखिलेश के पक्ष में लिखी दूसरे चाचा रामगोपाल यादव की चिट्ठी ने भी राजनीति के गलियारों को भावनात्मक रूप से उव्देलित कर दिया था।
समाजवादी पार्टी अपने दाव-पेंच से जैसी राजनीतिक और कूटनीतिक संरचनाएं कर रही है, उससे नूराकुश्तीस का आभास होता है। अपने अखाड़े की अपनी ही मिट्टी में उत्तर प्रदेश के सबसे बलशाली राजनीतिक- कुनबे के तजुर्बेकार पहलवानों का यह खेल हैरतअंगेज कम, मनोरंजक ज्यादा बन गया है, क्योंकि कि अखाड़े में ललकार ज्यादा, पछाड़ कम दिखाई दे रही है। कुनबे के खलीफा के रूप में मुलायम के माथे पर पूरी ताकत के साथ बंधा साफा ढीला पड़ चुका है। मुलायमसिंह अपने पुत्र अखिलेश यादव से गुंथे हुए हैं, उनके छोटे भाई शिवपाल यादव संगठन की ताकत का इस्तेमाल करके अखिलेश को पलटी मारने के लिए मजबूर कर रहे हैं। समाजवादी पार्टी के अबूझ कथानक में सब कुछ इतनी जल्दी उलटा-पुलटा हो जाता है कि प्रतिव्दंद्वी राजनीतिक एक्टर-डायरेक्टर उनके समानान्तर अपनी फिल्म खड़ी करने के पहले ही भ्रमित और आश्चर्यचकित रह जाते हैं। भाजपा इन स्थितियों के कारण अपनी स्क्रिप्ट बार-बार बदलने को मजबूर हो रही है। 14 अक्टूबर को सपा-सुप्रीमो के ऐलान पर भाजपा किलक उठी कि अखिलेश मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं होंगे। भाजपा भी चेहरों के झमेलों से बचना चाहती है। उप्र में मुख्यमंत्री के चेहरे की तलाश भाजपा के लिए भी दिक्कतों वाला काम है। इसीलिए मुलायम की घोषणा के बाद ही उप्र भाजपा के अध्यक्ष केशवप्रसाद मौर्य चहक उठे कि भाजपा चुनाव में मुख्यमंत्री का चेहरा सामने रख कर चुनाव नहीं लड़ेगी। मौर्य का बयान सुर्खियों में आने के साथ ही सपा-सुप्रीमो ने अखिलेश को फिर से युवराज घोषित कर दिया है। सपा की इस पहल ने भाजपा को दुविधा में डाल दिया है कि वो कैसे यू-टर्न ले? [ लेखक भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।]
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