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उमेश त्रिवेदी
सर्जिकल स्ट्राइक की 'ब्लेक एण्ड व्हाइट' कहानी का उजला पहलू यह है कि मोदी-सरकार के 360 डिग्री पॉलिसी-शिफ्ट के कारण देश और सेना का मनोबल बढ़ा है, जबकि फसाने का स्याह पहलू यह है कि आतंकी हमले के प्रतिशोध में पाकिस्तान के खिलाफ भारतीय सेना की अभूतपूर्व सर्जिकल-स्ट्राइक की चमक पर राजनीतिक-कलह की धूल उड़ना शुरू हो गई है। राजनेता सीधे हाथ से सेना को सैल्यूट कर रहे हैं, तो उलटे हाथ से कलह-पुराण के पन्नों पर चुनावी-दुश्मनी के दस्तखत कर रहे हैं। क्या पता, भारतीय जनता पार्टी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नसीहतों को क्यों नहीं समझ पा रही है कि सर्जिकल-स्ट्राइक की सफलता से बौराने और बौखलाने की जरूरत कतई नही हैं? मोदी-सरकार की इस सफलता की उम्र लंबी है। विरोधियों के राजनीतिक-करतबों से इसका मोल कम होने वाला नहीं है। लेकिन खुद भाजपा यह समझने को तैयार नहीं है।
सर्जिकल स्ट्राइक पर राजनीतिक बढ़त बनाने की कोशिशें उलटी पड़ सकती हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती पहले ही कह चुकी हैं कि मोदी उप्र विधानसभा के चुनाव जीतने के लिए पाकिस्तान से युध्द कर सकते हैं। इसी पृष्ठभूमि में शायद प्रधानमंत्री मोदी ने बुधवार को मंत्रियों के बहाने कार्यकर्ताओं को आगाह किया था कि सर्जिकल-स्ट्राइक के मामले में छाती ठोकने और सीनाजोरी करने की जरूरत नहीं है। खुद मोदी इस मामले में खामोश हैं। 29 सितम्बर की सर्जिकल स्ट्राइक के बाद मोदी ने इस विषय में एक भी ट्वीट नहीं किया। आम जनता खुश है कि भाजपा के नहीं, बल्कि मोदी भारत के प्रधानमंत्री जैसा बर्ताव कर रहे हैं। लोगों ने अरविंद केजरीवाल और संजय निरुपम के सवालों पर नाराजी जताई थी कि मोदी-सरकार सर्जिकल स्ट्राइक को सही सिध्द करने के पुरावे पेश करे। आम धारणा है कि सेना के मामले में राजनीति नहीं होना चाहिए। कांग्रेस सहित सभी विरोधी अभी तक खामोश थे, लेकिन आगरा में रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर के स्वागत समारोह के बाद राजनीति के चेहरे पर लगा राष्ट्रवाद का नकाब नोचने का सिलसिला क्या रुख अख्तियार करेगा, कहना मुश्किल है? सवाल यह है कि मोदी की हिदायतों के बावजूद इस चुनावी जलसे में सेना की सफलता का जश्न मनाना क्यों जरूरी था? ये परिस्थितियां मोदी के बारे में भी संशय पैदा करती हैं कि वो सही में क्या चाहते हैं? भारत-पाकिस्तान के बीच तीन लड़ाइयां हो चुकी हैं। यह अनहोनी 70 वर्षों में पहली बार दिख रही है कि सरहदों पर संकट के क्षणों में पार्टियों के राजनीतिक-मतभेद उफान पर हैं। जब सरहद पर सेना दुश्मनों के मुकाबिल खड़ी हो, देश में पक्ष-विपक्ष की राजनीतिक-वैमनस्य की लड़ाई अभूतपूर्व है। राष्ट्र के इतिहास में कोई भी युध्द अंतिम नहीं होता और कोई भी जीत आखिरी जीत नहीं होती है। युध्द के उतार-चढ़ाव से जूझना राष्ट्र की नियति है। 1948 में पाक से भारत की अधूरी लड़ाई के नासूर, 1962 में चीन युध्द के घाव अभी भी अनबुझे हैं। पाकिस्तान के खिलाफ 1965, 1971 और 1999 के युध्दों का विजयी इतिहास और उसके राजनीतिक लाभ तत्कालीन प्रधानमंत्रियों के नाम दर्ज हैं। वैसे ही सर्जिकल स्ट्राइक की क्रेडिट मोदी के अकाउंट याने भाजपा के खाते में जमा है। आगरा में रक्षामंत्री के अभिनंदन के बाद यह बहस शुरू हो गई है कि यूपीए के जमाने में सर्जिकल स्ट्राइक का राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश कांग्रेस ने नहीं की। टीवी स्क्रीनों पर यह दुर्भाग्यपूर्ण बहस शुरू हो गई है कि पुरानी सर्जिकल स्ट्राइक की तुलना में मोदी की स्ट्राइक दमदार है। सवाल यह है कि क्याा अब चुनाव में वोटों के पलड़े पर सेना की सर्जिकल स्ट्राइक और युध्द के परिणामों की सफलताओं को नापा-तौला जाएगा? सेना के पराक्रम का इससे बड़ा अपमान क्या होगा?
आतंकवादी दौर में 29 सितम्बर की सर्जिकल स्ट्राइक को अंतिम सत्य मानकर झूम उठना अतिरंजना हैं। सिलसिला थमने वाला नही हैं। भारत में आतंकवाद की कहानी काफी पुरानी है। 1988 से 2016 तक आतंकवादी मुठभेड़ों में लगभग 24000 आतंकवादी मारे गए हैं। सेना के 6,250 सैनिकों ने प्राणोत्सर्ग किया है। मोदी सरकार ने दो साल में 250 आतंकियों को ठिकाने लगाया है। उड़ी हमले के बाद सेना के तेवर बदले हुए हैं। सेना से मुठभेड़ों में 50 से ज्यादा आतंकवादियों को दफ्न किया जा चुका है। भाजपा को मोदी के 'मोदीत्व' पर भरोसा रखना चाहिए। भाजपा का उतावलापन कहीं मोदी के उस 'मोदीत्व' के क्षरण का सबब नहीं बन जाए, जिसकी बदौलत वो लोकसभा में 283 सीटों के स्पष्ट बहुमत के साथ बैठे हैं। [ लेखक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक हैं ]
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