Patrakar Priyanshi Chaturvedi
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण अपना नौवां बजट पेश कर रही हैं और सरकार के तीन बड़े कर्तव्यों की बात कर रही हैं, लेकिन इन लक्ष्यों की राह में बढ़ता कर्ज एक बड़ी बाधा बना हुआ है। बीते नौ सालों में केंद्र और राज्यों—दोनों का कर्ज जीडीपी के अनुपात में लगातार बढ़ा है। 2020-21 में यह संयुक्त रूप से 89% तक पहुंच गया था, जो 2024-25 में घटकर 81% हुआ है। हालांकि गिरावट सकारात्मक संकेत है, फिर भी कर्ज का स्तर चिंता का विषय बना हुआ है।
कर्ज बढ़ने के पीछे रक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा, वेतन और पेंशन जैसे जरूरी खर्च हैं, लेकिन समस्या तब गहरी हो जाती है जब कर्ज का बड़ा हिस्सा ब्याज चुकाने या मुफ्त योजनाओं में खर्च होता है। ऐसे खर्च से न तो उत्पादन बढ़ता है और न ही भविष्य में आय के नए रास्ते खुलते हैं। ऊपर से पुराने कर्ज को चुकाने के लिए नया कर्ज लेना पड़ता है, जिससे ब्याज का बोझ और बढ़ जाता है। इसका असर सीधे जनता पर पड़ता है—ज्यादा टैक्स और कम खर्च करने की क्षमता के रूप में।
दुनिया के कई विकसित देशों में कर्ज-जीडीपी अनुपात भारत से कहीं ज्यादा है। जापान का कर्ज 200% से ऊपर है, अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन भी 100% से ज्यादा कर्ज के साथ विकसित अर्थव्यवस्थाएं हैं। फर्क यह है कि वहां कर्ज का इस्तेमाल मुनाफा कमाने और अर्थव्यवस्था बढ़ाने में होता है। भारत का लक्ष्य 2031 तक केंद्र का कर्ज जीडीपी के करीब 50% तक लाना और वित्तीय घाटा कम करना है। इस चुनौती से सफलतापूर्वक निपटे बिना भारत का विकसित राष्ट्र बनने का सपना पूरा करना आसान नहीं होगा।
Patrakar Priyanshi Chaturvedi
|
All Rights Reserved © 2026 Dakhal News.
Created By:
Medha Innovation & Development |