एक-दूसरे के पूरक हैं मनुष्य और पशु
bhopal,Humans and animals ,complement each other.

पशुओं के कल्याण मानकों में सुधार को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से 4 अक्तूबर को ‘विश्व पशु कल्याण दिवस’ मनाया जाता है। विश्व पशु दिवस पहली बार बर्लिन में 24 मार्च 1925 को पशु कल्याण के बारे में जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से मनाया गया था। पशुओं की लुप्तप्राय प्रजातियों की दुर्दशा को उजागर करने के लिए इटली के फ्लोरेंस में 1931 में आयोजित पारिस्थितिकीविदों के एक सम्मेलन में विश्व पशु दिवस की शुरुआत की गई और तब असीसी के सेंट फ्रांसिस के पर्व के कारण यह दिवस मनाने के लिए प्रतिवर्ष 4 अक्तूबर को ही चुना गया। 2003 में पहली विश्व पशु दिवस वेबसाइट यूके स्थित पशु कल्याण चैरिटी ‘नेचर वॉच फाउंडेशन’ द्वारा लांच की गई थी। इस दिन पशु अधिकारों को बढ़ावा देने वाले व्यक्तियों एवं संगठनों का समर्थन करके जानवरों के प्रति प्यार, देखभाल, स्नेह और सुरक्षा को प्रोत्साहित करता है। पशुओं के अधिकारों के लिए यह एक ऐसी वैश्विक पहल है, जिसका प्रमुख उद्देश्य पशु कल्याण के लिए बेहतर मानक सुनिश्चित करना है।


पशु प्रेम के बारे में महात्मा गांधी कहते थे कि किसी राष्ट्र की महानता और उसकी नैतिक प्रगति का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि वहां जानवरों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है। पशु मानव जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जो न केवल हमारे जीवन को समृद्ध बनाते हैं बल्कि हमें बेहतर इंसान भी बनाते हैं। पारिस्थितिकी तंत्र में सभी जानवर प्रकृति की पारिस्थितिकी को संतुलित रखते हुए हमारे पर्यावरण की रक्षा करने और मानव स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में भी समान रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मनुष्य और पशु न केवल एक-दूसरे पर निर्भर हैं बल्कि एक-दूसरे के पूरक भी हैं। सही मायनों में दोनों का अस्तित्व ही खुशहाली का प्रतीक है और यदि जंगल से किसी एक जीव की प्रजाति भी लुप्त होती है तो उसका असर सम्पूर्ण पर्यावरण पर पड़ता है।


विश्व पशु दिवस विश्वभर में कल्याण मानकों के मिशन के साथ जानवरों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए एक ऐसा सामाजिक आन्दोलन है, जो प्रतिवर्ष एक निर्धारित थीम के साथ मनाया जाता है। इस वर्ष ‘विश्व पशु कल्याण दिवस’ की थीम है ‘जानवरों को बचाओ, ग्रह को बचाओ!’। भारत में करीब 70 फीसद आबादी कृषि तथा कृषि संबंधी व्यवसायों पर निर्भर है। प्राचीन काल से ही पशुपालन और कृषि व्यवसायों का आपस में गहरा संबंध रहा है। गरीबी से त्रस्त परिवारों के लिए तो पशुधन ग्रामीण मुद्राएं हैं, जो खासकर गरीब परिवारों के लिए बीमा विकल्प के रूप में भी कार्य करता है क्योंकि यह उनके लिए ऐसी सम्पत्ति है, जिसे संकट के समय बेचा जा सकता है। यही कारण है पालतू पशुओं को ‘पशुधन’ कहा जाता है। भारत के सकल घरेलू उत्पाद में भी पशुधन की बड़ी भागीदारी रही है।

 

मानव और पशुओं के आपसी संबंध मानव जीवन के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं क्योंकि पशुओं का मानवीय समाज में विभिन्न रूपों में योगदान होता है। पशुओं के साथ रहने से हमें स्वभाविक संवेदनशीलता, प्यार, सहयोग और उन्नति का अनुभव होता है। बहुत से पशु-पक्षी तो ऐसे हैं, जो यदि धरती पर नहीं हों तो पृथ्वी पर मनुष्य का जीना ही मुश्किल हो जाएगा। अनेक मामलों में देखा जाता है कि मानवीय स्वार्थ के लिए कई जानवरों की निर्मम हत्या कर दी जाती है।

 

दरअसल इन पशुओं के विभिन्न अंग तथा उनके मल-मूत्र इत्यादि दवाईयां बनाने से लेकर खेतीबाड़ी तक में काम आते हैं और इनके कंकाल उर्वरक का काम करते हैं। हाथियों को हाथी दांत और गैंडे को उसके सींगों के लिए बेदर्दी से मौत के घाट उतार दिया जाता है जबकि उनकी प्राकृतिक मौत होने पर ये चीजें वैसे ही मिल जानी होती हैं। हाथी और गैंडे कीचड़ में रहकर दूसरे जानवरों के पीने के लिए किनारे पर पानी का इंतजाम करते हैं और सूखा नहीं पड़ने देते। हाथी जमीन को उपजाऊ बना सकता है जबकि गैंडा कीचड़ में रहकर मिट्टी की अदला-बदली का काम करता है और प्रतिदिन करीब पचास किलो वनस्पति की खुराक होने से जंगल में कूड़ा-कर्कट नहीं होने देता। उसके शरीर पर फसल के लिए हानिकारक कीड़े जमा हो जाते हैं, जो पक्षियों का भोजन बनते हैं। इस प्रकार गैंडे प्राकृतिक संतुलन बनाए रखते हैं। वैसे तो सभी पशु-पक्षी मनुष्य के सहायक होते हैं लेकिन उनके व्यवहार को समझे बगैर यदि उनके रहने की जगहों को उजाड़ने के प्रयास किए जाते हैं तो वे हिंसक होकर विनाश कर सकते हैं।


तुर्की के विख्यात नाटककार, उपन्यासकार और विचारक मेहमत मूरत इल्डन का कहना था कि दुनिया में वन्यजीवों की रक्षा केवल दयालु दिलों के प्यार से ही की जा सकती है। वाइल्ड हार्ट वाइल्ड लाइफ फाउंडेशन के संस्थापक पॉल ऑक्सटन कहते थे कि जब तक आपके भीतर प्रकृति के बीच रह रहे जंगली जीवों के प्रति ढ़ेर सारा प्यार, दया और लगाव नहीं रहेगा, तब तक आप सच्चा सुख हासिल नहीं कर पाएंगे। मानव जाति को यह समझना होगा कि पशुओं का जीवन किसी भी तरह से हमारे जीवन से कम कीमती नहीं है।

 

‘जैव विविधता के जनक’ के नाम से विख्यात आधुनिक काल के डार्विन कहे जाने वाले हार्वर्ड विश्वविद्यालय के पूर्व जीवविज्ञानी और पुलित्जर पुरस्कार विजेता ईओ विल्सन के अनुसार पृथ्वी पर प्रत्येक प्रजाति अत्यधिक देखभाल एवं प्रतिभा के साथ बनाई गई रचना और एक उत्कृष्ट कृति है। वन्यजीव फोटोग्राफर, प्रकृतिवादी और ‘जॉय ऑफ बीयर्स’ सहित कुछ पुस्तकों की लेखिका सिल्विया डोल्सन कहती हैं कि हमारी ही तरह जानवर भी प्यार, खुशी, डर और दर्द महसूस करते हैं लेकिन वे बोले गए शब्द को समझ नहीं पाते, अतः यह हमारा दायित्व है कि हम उनकी ओर से बोलें और सुनिश्चित करें कि उनकी भलाई और जीवन का सम्मान एवं सुरक्षा हो। इसके लिए प्रकृति और पशुओं के साथ अपने संबंधों में मनुष्य को सभ्य बनाना आवश्यक है।

 

Dakhal News 25 October 2025

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