इस्लाम, हिंदुत्व और इसायियत : बदलता है कौन किसको!
bhopal, Islam, Hindutva and Christianity,Who changes whom!

संगम पांडेय-

 

अल बरूनी से लेकर मोहम्मद अली जिन्ना तक ने यह माना है कि इस्लाम और हिंदुत्व एक-दूसरे से इतने भिन्न हैं कि उनमें कोई तुलना संभव नहीं। लेकिन इस्लाम की तुलना ईसाइयत के साथ संभव है। क्योंकि दोनों में ही एक किताब, एक पैगंबर, धर्मांतरण, ईशनिंदा आदि एक जैसे कांसेप्ट मौजूद होने के साथ-साथ दोनों का ऐतिहासिक स्रोत भी एक ही है। पर इस्लामी समाजों में जहाँ ये कांसेप्ट हड़कंप का सबब बन जाते हैं वहीं ईसाई समाजों में इनका अक्सर उल्लंघन होता है और किसी को खास परवाह नहीं होती, जिसकी वजह है व्यक्ति की आजादी के सवाल को सबसे ऊपर रखना।

 

दारियो फो के नाटक ‘कॉमिकल मिस्ट्री’ और टीवी शो ‘फर्स्ट मिरेकल ऑफ इन्फैंट जीसस’ को वेटिकन द्वारा सबसे भयंकर ब्लाशफेमी करार देने के बावजूद कई दशकों तक उनके प्रदर्शन वहाँ होते रहे। वहीं एक जमाने में धरती को ब्रह्मांड का केंद्र मानने की बाइबिल की धारणा से उलट राय व्यक्त करने पर गैलीलियो को जिस चर्च ने हाउस अरेस्ट की सजा सुनाई थी उसी चर्च ने अभी कुछ साल पहले कबूल किया कि ईश्वर जादूगर नहीं है और ‘बिग बैंग’ और ‘थ्योरी ऑफ ईवोल्यूशन’ दोनों ही अपनी जगह सही हैं।

 

चर्च बदलते वक्त के मुताबिक अपनी नैतिकताओं में संशोधन या नवीकरण भी करती रहती है। सन 2009 में उसने ज्यादा धन को भी एक बुराई करार दिया था, जो शायद 1990 के बाद की आर्थिक प्रवृत्तियों के मद्देनजर ही होगा। इसी तरह धर्मांतरण को लेकर भी ईसाइयत इस्लाम की तरह उच्छेदवादी नहीं है। उसमें परंपराएँ छोड़ने और नाम बदलने के लिए नहीं कहा जाता, सिर्फ यीशु का भक्त और चर्च का अनुयायी होना ही इसके लिए काफी है। जबकि मुझे याद है इंडोनेशिया में (सुकर्ण पुत्री) मेगावती (जो पहले से ही मुसलमान थीं) के खिलाफ आवाजें उठी थीं कि सिर्फ इस्लाम अपनाने से काम नहीं चलेगा, नाम भी बदलो।

 

 

यूरोप के उदाहरण से पता चलता है कि धर्म ही समाजों को नहीं बदलते बल्कि समाज भी धर्म को बदल देते हैं। और यह सिर्फ ईसाइयत के हवाले से ही अहम नहीं है, बल्कि यूरोप में एक मुल्क अल्बानिया भी है जहाँ मुस्लिम बहुसंख्यक हैं। लेकिन वह देश उसी तरह समानता और व्यक्ति स्वातंत्र्य के नियमों को मानता है जैसे कि ज्यादातर अन्य यूरोपीय देश। यहाँ तक कि एक वक्त पर अनवर होजा ने वहाँ कम्युनिस्ट क्रांति भी कर दी थी, जो कि किसी मुस्लिम देश के लिए असंभव सी लगने वाली बात है। और न सिर्फ इतना बल्कि होजा ने अल्बानिया को एक नास्तिक राज्य भी घोषित कर दिया था।

 

यूरोप की तुलना में एशिया की प्रवृत्ति लकीर के फकीर की है। उदाहरण के लिए हिंदुत्व को ही लें। करीब ढाई सौ साल पहले तक हिंदुओं को इस बात का ठोस अहसास तक नहीं था कि वे कोई कौम हैं। अब ये अहसास आया है तो बजाय इसके कि वे हिंदुत्व की खामियों के मुतल्लिक सुधार का कोई डॉक्ट्राइन प्रस्तावित करें, वे सारा गौरव अतीत में तलाश लेने पर आमादा हैं। हो सकता है यह प्रवृत्ति उन्होंने इस्लाम से उधार ली हो या हो सकता है उनकी अपनी हो; क्योंकि खुद गाँधी वर्णाश्रम को हिंदुत्व के लिए अनिवार्य मानते थे, जिनकी इस धारणा की अच्छी चीरफाड़ अंबेडकर ने अपनी किताब ‘जाति का विनाश’ में की है। फेसबुक पर इस प्रश्न को पर मैं खुद दो बार अनफ्रेंड किया जा चुका हूँ।

 

दरअसल सेकुलर दृष्टिकोण जिस रीजनिंग से पैदा होता है उसकी हालत अपने यहाँ सुभानअल्ला किस्म की है। खुद को सेकुलर मानने वाले यहाँ के बुद्धिजीवी जिन नेहरू पर फिदा हैं वे नेहरू अपनी किताब ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में लिखते हैं कि ‘(अफगानों या तुर्कों के भारत पर आक्रमण को) मुस्लिम आक्रमण या मुस्लिम हुकूमत लिखना उसी तरह गलत है जैसे भारत में ब्रिटिश के आने को ईसाइयों का आना और उनकी हुकूमत को ईसाई हुकूमत कहा जाना।’

 

विश्लेषण के इस घटिया तरीके में दो भिन्न वास्तविकताओं को खींच-खाँचकर एक खोखली तुलना में फिट कर दिया जाता है। ऐसा वही लिख सकता है जो नहीं जानता कि इस्लाम में स्टेट और रिलीजन मजहबी एजेंडे के अंतर्गत मिक्स कर दिए जाते हैं, जिसके लिए धिम्मी, जजिया, शरिया आदि कई विधियों का प्रावधान है, जिस वजह से हमलावर के अफगान या तुर्क होने का फर्क मुस्लिम पहचान के मुकाबले अंततः एक बहुत कमतर किस्म का फर्क रह जाता है। साथ ही ऐसी खोखली तुलना वह कर सकता है जो नहीं जानता कि सोलहवीं शताब्दी में कैसे ब्रिटेन ने वेटिकन से नाता तोड़कर प्रोटेस्टेंटवाद का साथ दिया था, जिसके बाद कैथोलिज्म के रूढ़िवाद को वहाँ काफी संदेह और हिकारत से देखा जाता था।

 

स्पष्ट ही ब्रिटिश साम्राज्यवाद के मंतव्य मुस्लिम विस्तारवाद के मंतव्यों से बिल्कुल अलग थे, और मैग्ना कार्टा के बाद ब्रिटेन की यही आधुनिकता कालांतर में उसका वैश्विक साम्राज्य बना पाने में बड़ी सहायक वजह बनी। जो भी हो भारत के सेकुलर बुद्धिजीवी इसी नेहरू-पद्धति के तर्कों से आज तक काम चला रहे हैं। प्रसंगवश याद आया कि अंबेडकर निजी बातचीत में नेहरू को ‘चौथी कक्षा का लड़का’ कहा करते थे। ऐसा धनंजय कीर ने अंबेडकर की जीवनी में लिखा है।

 

यह भी लिखा है कि एक बार गाँधी से अंबेडकर के विरोध को देखते हुए जमनालाल बजाज ने उन्हें सलाह दी कि ‘कुछ समय के लिए खुद के मत को दूर रख आप नेहरू के आदर्श का अनुसरण क्यों नहीं करते?’ अंबेडकर ने जवाब दिया- ‘तात्कालिक यश के लिए खुद की विवेक-बुद्धि की बलि देने वाला इंसान मैं नहीं हूँ।’

Dakhal News 13 April 2021

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