जंगल कर दिया अशांत, महिलाओं को देना था एकांत
bhopal, forest turned turbulent, women had to be isolated

ऐड़ा प्रथा................................ 

जंगल कर दिया अशांत, महिलाओं को देना था एकांत 
सामाजिक परम्पराएं वन्यजीवों पर आज भी भारी 
 
सन्तोष गुप्ता-
 
अजमेर। मौज, शौक, मनोरंजन, रीत-रिवाज, प्रथाएं समय के प्रवाह में सजते, संवरते और बदलते रहे हैं, और बदलते रहेंगे भी। समय के साथ जो ना बदले वही कुरीति और कुप्रथाओं के नाम से पीढ़ी दर पीढ़ी पहचाने जाने लगते हैं। राजस्थान के अजमेर संभाग में खासतौर पर अजमेर और भीलवाड़ा जिलों से जुड़े कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में होली से लेकर शीतला सप्तमी तक पखवाड़े भर या उसके आसपास के दिनों में आज भी ऐड़ा प्रथा के नाम से एक सामाजिक प्रथा का निर्वाह किया जाता है जो कानूनी तौर पर निषेध, सामाजिक दृष्टि से गलत, धार्मिक नजरिए से बुरी यहां तक कि कथा संस्मरण सुनने और देखने में भी कान और आंख को प्रिय कतई नहीं। बताते हैं कि इस ऐड़ा प्रथा में गांव के लोग सामूहिक रूप से एकत्र होकर पारम्परिक हथियारों के साथ जिनमें खास तौर पर लाठी, गिलोल, कुल्हाड़ी, दातली, फरसा आदि होते हैं जंगल की ओर कूच कर जाते हैं। जहां मार्ग में दिखाई देने वाले वन्यजीवों को घेर कर खदेड़ा जाता है। वन्यजीव अपनी जान की रक्षा में इधर से उधर भागते हैं। ग्रामीण उन पर जबरदस्ती शिकंजा कसते हुए उन पर अपनी विजय प्राप्त करते हैं। इस खेल में वो लोग चाहें वह स्त्री हो या पुरुष जवान और बलवान होते हैं वे तो वन्यजीवों से द्वन्द्व में आगे रहते हैं जो लोग कमजोर अथवा बुजुर्ग होते हैं व वन्य जीवों को खदेड़ने के लिए मुंह से आवाजें निकालते हैं। कई बार वन्यजीव हिंसक होकर हमला कर देते हैं तो कई बार ग्रामीण जन वन्य जीवों पर हथियारों से वार कर उन्हें मार देते हैं। वन्य जीवों को मृत अथवा जीवित अवस्था में हांसिल करने के इस मनोरंजक खेल के समापन पर ग्रामीण गांव पहुंचकर जश्न मनाते हैं। इस प्रथा के शुरू होने को लेकर यद्यपि कोई स्पष्ट विचार सामने नहीं आया। ऐड़ा प्रथा क्यों और कितने बरस पहले शुरू हुई कोई प्रमाण नहीं है। किन्तु यह सही है कि यह प्रथा चोरी-छिपे या सांठगांठ से रस्मी तौर पर आज भी हो रही है। यही वजह है कि समय के साथ कुप्रथा बनी इस प्रथा को रोकने के लिए राज्यसरकार के वन विभाग को अच्छी खासी मशक्कत करनी होती है। वन्य जीवों के संरक्षण से जुड़े कायदे कानूनों को याद किया जाता है, उनका ग्रामीण क्षेत्रों में निचले स्तर तक प्रकाशन और प्रसारण के माध्यम से ग्रामीणों को स्मरण कराया जाता है। वन विभाग के कर्मचारियों की टोलियां बनाई जाती हैं। उनकी क्षेत्रवार जंगल जंगल तैनाती की जाती है, कानून का भय कायम किया जाता है। अधिकारियों के लावलश्कर के साथ दौरे होते हैं, कुल मिलाकर विभागीय धन सम्पदा, समय, श्रम की होली हो जाती है पर कुप्रथा है कि साल दर साल अपनी जड़ें मजबूत और प्रभाव गहरा ही बनाती जाती हैं। हां यह बात दीगर है कि डिजीटल मीडिया के दौर में पहले की तुलना में अब यह प्रथा प्राय समाप्त अथवा सिर्फ रस्मी तौर पर ही रह गई है। इसके पीछे वक्त के साथ बदली परिस्थितियां भी हैं। ऐड़ा प्रथा को लेकर जितनी भी किवदंतियां सामने आई हैं वह है बड़ी दिलचस्प। ग्रामीण जन बताते हैं कि पहले के जमाने में पर्दा प्रथा थी। महिलाएं पुरुषों से पर्दा किया करती थीं। फाल्गुनी मास में जबकि हवाएं भी गुददुदाने वाली चलती हैं, होली और शीलसप्तमी जैसे रंग रंगीले त्योंहार पर महिलाओं को घरों में एकांत की आवश्यकता महसूस होती थी जिससे वे आपस में ननद, देवरानी, जेठानी, सास, पड़ोसन के साथ होली पर्व पर रंगों का आजादी से आनन्द ले सके। इस एकांत के लिए गांव के पुरुषों को गांव से बाहर भेज दिया जाता था। जितनी देर गांव के पुरुष गांव से बाहर होते थे महिलाएं आपस में होली खेल कर आनन्द प्राप्त करती थीं। कहा तो यह भी जाता है कि यदा कदा कोई पुरुष गांव में ही रह जाता था तो महिलाएं उसके कपड़े तक फाड़ देती थीं और उसके साथ वैसा ही वर्ताव किया जाता था जैसा जंगल में पुरुष वन्य जीवों के साथ किया करते थे। वहां जंगल में पुरुष सामूहिक रूप से एक छोर से प्रवेश करते थे। मार्ग में जो भी जानवर मिलते उन्हें घेर कर खदेड़ते हुए जंगल के दूसरे छोर से बाहर आ जाते थे। इस कालखण्ड में जो भी जानवर संघर्ष में मृत्यु को प्राप्त होता ग्रामीण उसपर अपनी विजय का इजहार कर गांव में लौटकर जश्न मनाते थे। दूसरी किवदंती है कि होली यानी फाल्गुन मास में खेतों में धान पका हुआ होता था। बहुत से किसान तो धान को काट कर मंडी में पहुंचाने से पहले खेतों में ही रखा रहने देते थे। धान का खेतों में पड़े रहने पर जानवरों द्वारा उनका नुकसान किए जाने का खतरा बना रहता था। ग्रामीणों ने अपनी खड़ी अथवा कटी फसलों को बचाने के लिए आपस में मिलकर इसका तोड़ निकाला। संबंधित क्षेत्र में जितने भी गांव आते थे अलग अलग तिथियों पर निगरानी के लिए अलग-अलग गांव के लोगों को तैनात किया जाता था। इस दौरान ग्रामीण सामूहिक रूप से निगरानी करते थे। बताते हैं कि निगरानी के समय कोई वन्यजीव दिखाई देने पर महिलाएं तो मुंह से आवाजें निकाला करती थीं और पुरुष लाठियां लेकर संबंधित वन्य जीव को गांव के बाहर जंगल की तरफ घेरकर खदेड़ते थे। वन्य जीव को खदड़ने में सफल होने पर सब मिलकर विजय उत्सव मनाते थे। समय बदलता गया जंगल खत्म होने लगे तो वन्यजीव भी लुप्त होते चले गए। गांव शहर में तबदील होने लगे, ग्रामीणों ने अपनी मौज मस्ती के लिए अच्छी सामाजिक प्रथाओं को कुप्रथाओं में तबदील कर दिया। ऐड़ा प्रथा के नाम पर वन्य जीवों को घेर कर मारने को ही अपना धर्म बना लिया। ऐड़ा प्रथा के नाम पर प्रभावशाली ग्रामीण अब जंगल में लाठियों के बजाय बंदूक आदि अन्य आग्नेय अस्त्र-शस्त्र लेकर शिकार करने जाने लगे। यह काम कानून के रखवालों की सांठगांठ से होने लगे। यानी वन संरक्षक ही वन्य जीव और वन सम्पदा के भक्षक बनने लगे। आखिर समाज के जागरूक लोगों ने इस प्रथा को रोकने के लिए आवाजें उठानी शुरू की। सरकार, प्रशासन और ग्रामीण पंचायत स्तर पर जागरूकता अभियान चलाए गए। ग्रामीणों को वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 की धारा (9) के तहत वन्य जीवों को मारने, खदेड़ने, शिकार करने आदि के लिए पाबंद किया जाने लगा।
 ऐड़ा प्रथा में कोई जाति विशेष नहीं पूरा गांव हो जाता था शामिल............. 
भीलवाड़ा, अजमेर व राजसमंद जिले सहित अन्य जिलों में कुछ जाति विशेष के लोगों द्वारा होली के बाद से शीतला सप्तमी पर्व तक वन्य जीवों का शिकार किया जाता है। अजमेर जिले के ब्यावर, जवाजा, भिनाय, सरवाड़, मसूदा, केकड़ी, नसीराबाद, पुष्कर, उधर भीलवाड़ा जिले के करेड़ा, आसींद, शिवपुर, बदनौर, ज्ञानगढ़ तथा राजमंद जिले के भीम, टाटगढ़ आदि वन्य क्षेत्रों से जुड़े ग्रामीण लोग ऐड़ा प्रथा में शामिल होते हैं। वैसे रावत, चीता मेहरात जाति के लोगों में ऐड़ा प्रथा को अधिक मान्यता है।
 इन वन्य जीवों का होता है शिकार................... 
ऐड़ा प्रथा के नाम पर मोर, जंगली सुअर, चिंकारे, काले हिरण, रोजड़े, खरगोश, तीतर, बटेर सहित अन्य वन्यजीवां का शिकार व वन्यजीवों को सामूहिक रूप से घेरकर लाठियों से भी पीटा जाता है। पहले के जमाने में शड्यूल एक के जीव जैसे हिंसक जानवर हुआ करते थे। किन्तु अब वे रहे भी नहीं अब तो शडयूल तीन के वन्य जीव ही इस प्रथा का शिकार अधिक होते हैं। 
वन्य जीव के शिकार पर यह है सजा.................. 
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत शिकारियों पर कठोर कार्यवाही की जाती रही है। शड्यूल एक के वन्य जीव का शिकार करने पर 3 से 7 साल का कारावास है वहीं शड्यूल दो व तीन के लिए तीन साल का कारावास है। भीलवाड़ा व अजमेर जिले के जवाजा पंचायत समिति क्षेत्र में वर्ष 1912 व 13 से लेकर 1917 व 18 में ऐड़ा प्रथा की रोकथाम को लेकर बहुत काम हुआ। रेंजर अशोक चतुर्वेदी, वन्य अधिकारी भगवानसिंह जी ने व्यक्तिगत इच्छा शक्ति दर्शा कर लोगों को जागरूक किया, कानून का भय डाला, पंचायत समिति स्तर पर समाजसेवी व जनप्रतिनिधियों को साथ लेकर कुप्रथा पर रोग लगाने के कारगर प्रयास किए। 
मुलकेश सालवान- क्षेत्रीय वन अधिकारी, वन विभाग 
आवाज उठाई तो विभाग एक्शन में आया...........
 मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक मोहनलाल मीणा को पत्र भेजकर भीलवाड़ा, राजसमंद, अजमेर सहित अन्य जिलों के उप वन संरक्षकों को निर्देशित कर गश्त व्यवस्था बढ़ाकर, ऐड़ा प्रथा की आड़ में होने वाले वन्य जीव शिकार की घटनाओं पर अंकुश लगाने की मांग की गई। मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक मीणा को पूर्व में ऐड़ा के नाम पर वन्यजीवों के शिकार किये जाने के वीडियो भी भेजे गए। विभाग ने इस पर एक्शन लिया। इस बात की खुशी है।
 बाबू लाल जाजू- प्रदेश प्रभारी, पीपुल फॉर एनीमल्स, राजस्थान 
समस्त क्षे़़त्रीय अधिकारियों को किया निर्देशित.................

 वर्तमान में ऐड़ा प्रथा समय के साथ प्राय समाप्त हो गई है। फिर भी सभी क्षेत्रीय वन अधिकारियों को सजग और सतर्क रहने को कहा गया है। टोलिया बना कर गश्त के निर्देश दिए गए हैं। अपने नियंत्रणाधीन इलाके में उक्त कुप्रथा अथवा अन्य गतिविधियों जैसे होली त्योहार के मौके पर जंगल की अवैध कटाई, अतिक्रमण, शिकार या खनन की घटना घटित होने की आशंका हो तो उसे रोकने की कार्यवाही सुनिश्ति करें।

Dakhal News 6 April 2021

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