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योगेश कुमार गोयल
दिल्ली विधानसभा चुनाव में जनता ने अरविंद केजरीवाल की अगले पांच वर्षों के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में ताजपोशी पर मुहर लगा दी। रामलीला मैदान में लगातार तीसरी बार दिल्ली के मुख्यमंत्री की शपथ लेते हुए जिस प्रकार उन्होंने कहा कि वे दिल्ली के विकास के लिए प्रधानमंत्री का आशीर्वाद चाहते हैं और दिल्ली को आगे बढ़ाने के लिए अब केन्द्र सरकार के साथ मिलकर काम करेंगे, उससे उन्होंने अपनी प्राथमिकताएं और इरादे जाहिर करने का प्रयास किया है। केजरीवाल मंत्रिमंडल में उनके पिछले सभी छह मंत्री मनीष सिसोदिया, सत्येन्द्र जैन, गोपाल राय, कैलाश गहलोत, इमरान हुसैन और राजेंद्र गौतम शामिल किए गए हैं। रिकॉर्ड बहुमत के साथ सत्ता में वापसी के बाद केजरीवाल सरकार से लोगों की अपेक्षाएं काफी बढ़ी हैं। उन्हें अब जनता की उम्मीदों पर खरा उतरते हुए पिछले पांच साल के अधूरे कार्यों को पूरा करना होगा और चुनाव के दौरान किए गए वायदों को अमलीजामा पहनाना होगा, जो आसान नहीं है।
नए कार्यकाल में अनेक चुनौतियां उनके समक्ष मुंह बाये खड़ी हैं। केजरीवाल ने चुनाव प्रचार के दौरान 10 चीजों की लिखित गारंटी देते हुए जनता से मुफ्त दी जा रही तमाम योजनाएं अगले कार्यकाल में भी जारी रखने तथा कुछ और नए वर्गों को भी कुछ मुफ्त योजनाओं का लाभ देने का वादा किया था। इसके अलावा उन्होंने प्रदूषण से कराहती दिल्ली में प्रदूषण कम करने का भी बड़ा वादा किया। इन वादों को मूर्त रूप देने में केजरीवाल सरकार की अग्निपरीक्षा होगी। उनके समक्ष बिजली, पानी, बस यात्रा, वाई-फाई सरीखी मुफ्त योजनाओं और मोहल्ला क्लीनिक, परिवहन व्यवस्था में सुधार, यातायात जाम से मुक्ति दिलाना, बसों में मार्शलों की तैनाती, महिला सुरक्षा, सीसीटीवी कैमरे, अच्छी शिक्षा तथा स्वास्थ्य संबंधी योजनाओं को नए कार्यकाल में किस प्रकार आगे बढ़ाते हैं, यह सबसे बड़ी चुनौती होगी। इसमें गौर करना होगा कि अपनी सरकार के खजाने को घाटे में लाए बगैर जनता को कैसे ये तमाम सुविधाएं देना जारी रखते हैं, साथ ही दिल्ली में शिक्षा और स्वास्थ्य पर बड़ा निवेश करने के लिए धन कहां से जुटाते हैं। हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि जिस प्रकार दिल्ली सरकार ने पिछले पांच वर्षों में कोई नया कर लगाए बिना और करों में बढ़ोतरी किए बगैर इन लक्ष्यों को हासिल किया, उसे देखते हुए यह कोई ज्यादा बड़ी चुनौती नहीं होगी। दरअसल, देश के करीब तीन फीसदी वित्तीय घाटे के मुकाबले कई मुफ्त योजनाओं के बावजूद दिल्ली का वित्तीय घाटा आधा फीसदी से भी कम बताया जा रहा है। इसका एक बड़ा कारण यह माना गया है कि राजस्व संग्रह के मामले में दिल्ली की पूर्ववर्ती सरकारों के मुकाबले केजरीवाल सरकार की स्थिति राष्ट्रीय स्तर के औसत से बेहतर है।
केजरीवाल सरकार के समक्ष दूसरी बड़ी चुनौती गैस चेंबर में तब्दील होती दिल्ली को प्रदूषण मुक्त कर साफ-सुथरा शहर बनाने की है। पिछले कुछ वर्षों में कई बार दिल्ली का प्रदूषण स्तर आपातकालीन स्थिति में पहुंच जाता है। इसके पीछे अन्य कारणों के अलावा दिल्ली से लगते हरियाणा, पंजाब तथा उत्तर प्रदेश जैसे पड़ोसी राज्यों में जलती पराली से निकलने वाले धुएं का भी अहम योगदान है। देखना होगा कि इस गंभीर समस्या से निपटने और दिल्ली को प्रदूषण मुक्त कर विश्वस्तरीय शहर बनाने के लिए केजरीवाल क्या कदम उठाते हैं। दिल्ली को वर्ल्ड क्लास शहर बनाने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना, दिल्ली सरकार के लिए दुष्कर होगा। जिस प्रकार दिल्ली में झुग्गी-झोंपडि़यों और रेहड़ी-पटरियों की तादाद लगातार बढ़ रही है, दिल्ली कैसे साफ-सुथरी बनेगी और विश्वस्तरीय स्मार्ट सिटी का दर्जा हासिल करेगी, कह पाना मुश्किल है। यमुना की सफाई भी बहुत बड़ा मुद्दा है क्योंकि केजरीवाल स्वयं विपक्षी दलों के आरोपों के जवाब में चुनौती दे चुके हैं कि आगामी पांच वर्षों में वे यमुना को इतना साफ कर देंगे कि उसमें डुबकी लगाई जा सकेगी लेकिन पड़ोसी राज्यों के सहयोग के बिना यह लक्ष्य पूरा होना संभव नहीं होगा।
चुनाव से कुछ समय पहले दिल्ली में दूषित पेयजल को लेकर काफी राजनीतिक गर्मागर्मी देखी गई थी। जहां केन्द्र सरकार की ओर से विभिन्न रिपोर्टों के हवाले से दिल्ली में अधिकांश जगहों पर दूषित पेयजल की सप्लाई के दावे किए गए थे, वहीं दिल्ली सरकार ने इन दावों को गलत बताते हुए साफ पानी उपलब्ध कराने के दावे किए थे। अपने चुनावी घोषणापत्र में केजरीवाल ने हर परिवार को 20 हजार लीटर मुफ्त पानी की योजना जारी रखने के साथ हर घर 24 घंटे शुद्ध पेयजल की सुविधा देने की बात कही थी। आने वाले समय में दिल्ली में स्वच्छ पानी की सप्लाई के लिए सरकार भले ही बड़े-बड़े जलशोधन संयंत्र लगाकर गंभीर प्रयास करती दिखे लेकिन दिल्ली की जनता को हर समय शुद्ध हवा और शुद्ध पानी निरन्तर मिले, इसके लिए जरूरी है कि पड़ोसी राज्यों का सहयोग दिल्ली सरकार को मिले।
जनलोकपाल बनाने, भ्रष्टाचार रोकने और दिल्ली को ईमानदार सरकार देने का वादा इस कार्यकाल में केजरीवाल कब और कैसे पूरा करेंगे, इसपर भी सभी की नजरें होंगी। दरअसल जनलोकपाल बिल पिछले काफी से केन्द्र सरकार के पास लंबित पड़ा है। जनलोकपाल के मुद्दे से ही दिल्ली की राजनीति में कदम रखने वाले केजरीवाल पर चुनाव के दौरान निरन्तर आरोप लगते रहे कि वे जनलोकपाल को भूल चुके हैं। हालांकि केजरीवाल कहते रहे कि पिछले चार वर्षों से केन्द्र सरकार ने जनलोकपाल को लंबित रखा है और इसे पास कराने के लिए वे संघर्ष जारी रखेंगे। ऐसे में उनके लिए किसी भी प्रकार दिल्ली में जनलोकपाल को लागू करना बड़ी चुनौती है।
केजरीवाल की ईमानदार प्रशासन की मुहिम पर भी काले बादल मंडराते रहे हैं। पांच साल पहले दिल्ली में प्रचण्ड बहुमत के साथ सरकार बनाने के बाद केजरीवाल ने लोगों को भ्रष्टाचार से लड़ने के गुर समझाते हुए कहा था कि वे उनसे रिश्वत मांगने वालों की वीडियो बनाकर पोस्ट करें, जिनपर सरकार कार्रवाई करते हुए भ्रष्ट कर्मचारियों को दंडित करेगी लेकिन पिछले काफी समय से कोई नहीं जानता कि लोगों द्वारा पोस्ट की गई ऐसी वीडियोज पर कितनी कार्रवाई हुई। दिल्ली के सरकारी विभागों का हाल भ्रष्टाचार के मामले में आज भी संतोषजनक नहीं है। लिहाजा, तीसरी बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन केजरीवाल की जिम्मेदारियां, चुनौतियां और जनता के प्रति जवाबदेही पहले के मुकाबले काफी बढ़ गई है। बेहतर यही होगा कि अपने नए कार्यकाल में वे केन्द्र के साथ टकराव का रास्ता छोड़ दिल्ली के लिए ज्यादा से ज्यादा काम करने का प्रयास करें।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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