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इन दिनों भोपाल में दिन रात उड़ रहे विकास के फ़रिश्ते अपनी कारगुजारियों के लिए नए से नए तरीके खोज लेने में माहिर होते जा रहे हैं । ताज़ा मामला पुरानी विधानसभा परिसर में मिंटो हॉल और उससे लगे गांधी पार्क का है जिसे कन्वेंशन सेंटर के लिए पुराने मछलीघर की जमीन के साथ पर्यटन विकास निगम ने हड़प लिया है । यह हड़पनीति विकास के मम्मा की नीयत को खोल खोल कर उजागर कर रहा है ।
इस सिलसिले में भोपाल के नागरिकों की तरफ से मध्यप्रदेश के मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान के नाम यह खुला खत पेश है :
माननीय मुख्य मंत्री जी ,
जो चुप रहेगी ज़ुबाने क़ातिल
लहू पुकारेगा आस्तीन का ।
आपका यह कन्वेंशन सेंटर विशाल मिंटो हॉल के ऐतिहासिक वास्तुशिल्प को बदले बगैर भी बनाया जा सकता है । आखिर वहां पूर्व भोपाल स्टेट का सबसे बड़ा हमीदिया कॉलेज लगा करता था । अविभाजित मध्यप्रदेश की पूरी विधानसभा के लिए यही इमारत बरसों तक मजे में काम आती रही है । भारतीय इतिहास अनुसन्धान परिषद की अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस बड़े आराम से यहीं हुई । प्रकाश झा महोदय ने यहीं अपनी राजनीति शूट कर ख़ुशी ख़ुशी बॉक्स ऑफिस पर झोलियाँ भर लीं ।और अभी भी आपका अटल बिहारी वाजपेयी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय यहीं पर कायम मुकाम है ।
और इससे लगा गांधी पार्क ?
वह तो आपके प्रस्तावित कन्वेंशन सेंटर को एक शानदार लुक ही देगा बशर्ते आप उसे करीने से सजाएं , संवारें और थोड़ी सी देखभाल दे दें ।
और यहाँ स्थापित गांधी प्रतिमा ?
वह आपके चेहरे पर अनायास लगती जा रही राजनैतिक कालिमा को ही थोड़ा कम करने में मददगार हो सकती है । आप उसे वहीँ रहने दें और थोड़े साहस के साथ अपने कन्वेंशन सेंटर को महात्मा गांधी का नाम दे दें ।
लेकिन लगता नहीं है कि आप ऐसा कुछ करेंगे ।बल्कि सच तो यह है कि आपको ऐसा कुछ भी करने ही नहीं दिया जायेगा । आपके नाम पर आपके लोगों ने गांधी प्रतिमा को वहां से हटाने का ठेका दे दिया है जिसका एक रिहर्सल ऐन ईद के रोज हो भी चुका । पार्क के विशालकाय बरसों पुराने हरे भरे दरख्तों के सीने पर आपके गुर्गे कीलें ठोंक ठोंक कर छेद कर रहे हैं और रात के अँधेरे में इन छेदों में हींग भरने का आपराधिक कृत्य बेख़ौफ़ कर रहे हैं ।
एक बात बताएं हुज़ूर !
क्या आप भोपाल को एक मुर्दा शहर तस्लीम करते हैं ?
अगर ऐसा है तो आपको मुग़ालते में रखा जा रहा है । आप तो जानते ही हैं कि ऐसे मुग़ालते सेहत के लिए अच्छे नहीं होते ।
तुझसे पहले जो शख़्स यहाँ तख्तनशीं था ,
उसको भी खुदा होने का ऐसा ही यकीं था ।
राजेन्द्र शर्मा, प्रगतिशील लेखक संघ
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