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अनुराग उपाध्याय
समय समय पर समरथ को नहीं दोष गुंसाई की उक्ति चरितार्थ होती रही है। ईरानी कहावत भी है कि कहीं न कहीं न्याय में ताकतवर के लाभ की ही बात होती है। कमोबेश, कई मामलों में सलमान खान जिस तरह लगातार बरी होते गये, उसने न्याय के पलड़े के झुकाव पर सवाल खड़े किये। कई दशकों के बाद आर्म्स एक्ट के मामले में फैसला आना। फिर सलमान का बरी हो जाना बताता है कि अभियोजन पक्ष की दक्षता संदेह से परे नहीं है जो अभियुक्त को संदेह का लाभ देता है। अब चाहे हिरन व चिंकारा मारने का मामला हो या फिर मुंबई में हिट एंड रन का मामला, सलमान पर लगे आरोप कमजोर केस होने के कारण अदालत में टिक नहीं पाये। सलमान बड़े स्टार हैं ,समर्थ हैं,पैसेवाले हैं तो उनके साथ ऐसा होने की पूरी सम्भावना भी थी। सावाल ये है कि अगर इन मामलों में सलमान खान की जगह कोई और होता तो शायद अब तक अपनी सजा पूरी करके बाहर भी आ गया होता।
दरअसल, वर्ष 1998 में जोधपुर में फिल्म ‘हम साथ-साथ हैं’ की शूटिंग के दौरान सलमान खान पर हिरन के शिकार के आरोप लगे थे। सलमान पर शिकार के दौरान अवैध हथियार रखने का आरोप भी था। विडंबना देखिये कि जोधपुर की एक अदालत को अवैध हथियार रखने के मामले में फैसला देने में 18 साल लगे। इस बीच एक गवाह चल बसा और दूसरा पागल हो गया। और सलमान खान बरी।
हालांकि, अप्रैल 2015 में हिरन व चिंकारा मामले में राजस्थान हाईकोर्ट सलमान खान को बरी कर चुका है। अदालत का कहना था कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में विफल रहा है। मगर वन्यजीवों की रक्षक बिश्नोई बिरादरी इस मामले को जोशो-खरोश से उठाती रही है। अन्यथा यह मामला कभी का ठंडे बस्ते में चला गया होता। बिश्नोई समाज मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाने की बात कर रहा है।
बहरहाल हालिया फैसले से अभियोजन पक्ष व कानून की भूमिका पर सवाल जरूर खड़े हुए हैं। यह बात शिद्दत से उभरकर सामने आती रही है कि चाहे फिल्मी सितारा सलमान हो या कोई सामान्य, उसे संदेह का लाभ नहीं मिलना चाहिए। जिसके लिये न्यायिक प्रशासन व अभियोजन पक्ष की कार्यकुशलता को दुरुस्त करने की आवश्यकता जनता महसूस करती है ताकि यह संदेश जाये कि संविधान में जैसे कानून के समक्ष हर किसी के समान होने का प्रावधान है, व्यवहार में भी न्याय होता नजर आये। पुलिस व न्यायिक प्रशासन को इन विरोधाभासों पर गंभीरता के साथ मंथन करना होगा ताकि न्याय की शुचिता कायम रहे।
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