कला पर कलह आखिर क्यों ?
pakistani kalakar

संजय कपूर

देश में पिछले कई दिनों से पाकिस्तानी कलाकारों को लेकर विवाद छिड़ा है। ऐसी फिल्मों को भी निशाना बनाया जा रहा है, जिनमें पाकिस्तानी कलाकारों ने काम किया है। इनमें करण जौहर की जल्द रिलीज होने जा रही फिल्म 'ऐ दिल है मुश्किल" भी है, जिसमें पाकिस्तानी अभिनेता फवाद खान एक अहम किरदार में हैं। हाल ही में फिल्मकार अनुराग कश्यप ने इस मसले पर करण जौहर के प्रति एकजुटता प्रदर्शित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सवाल पूछने के अंदाज में ट्वीट किया कि 'सर, आपने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री से मुलाकात करने के लिए अपने पाकिस्तानी दौरे को लेकर अब तक सॉरी नहीं बोला। यह 25 दिसंबर की बात थी। उसी वक्त करण जौहर अपनी फिल्म की शूटिंग भी कर रहे थे। आखिर क्यों?" उनके इस ट्वीट पर बवाल मच गया। संभवत: कश्यप के कहने का आशय सिर्फ यही था कि प्रधानमंत्री के उस दौरे से कोई खास मकसद हासिल नहीं हुआ, फिर भी इसके खिलाफ कुछ नहीं कहा गया, जबकि किसी फिल्मकार ने अगर पाकिस्तानी कलाकार के साथ फिल्म बना ली तो उसे इतना क्यों भुगतना पड़ रहा है?

प्रधानमंत्री के प्रति उनके इस तीखे और अप्रासंगिक ट्वीट का जबर्दस्त विरोध शुरू हो गया। गुजरे जमाने के मशहूर सितारे और आज के एक मुखर राजनेता शत्रुघ्न सिन्हा कश्यप के इस ट्वीट की टोन से काफी विचलित नजर आए और उन्होंने कहा - 'राजनीति में चीजें बहुत तेजी से बदलती हैं। आज जो पड़ोसी आपका अच्छा दोस्त है, वह कल घोर शत्रु भी बन सकता है। और इसका उल्टा भी हो सकता है।" वहीं केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजु ने कश्यप के इस ट्वीट को प्रधानमंत्री के नाम के सहारे सस्ती लोकप्रियता बटोरने का हथकंडा करार दिया। देश के एक प्रमुख कारोबारी मुकेश अंबानी ने इस मसले पर हाल ही में जो कहा, उससे संकेत मिला कि वे भी इस वक्त पाकिस्तानी कलाकारों के भारतीय फिल्मों में काम करने पर रोक लगाने के पक्ष में हैं। बहरहाल, सबको अपनी राय रखने का हक है। यहां पर समस्या सिर्फ इतनी है कि आखिर सत्ताधारी पार्टी की बदलती धारणाओं के आधार पर देश के आम लोगों से भी अपनी राय बदलने की उम्मीद क्यों की जाती है?

जबसे हमारे प्रधानमंत्री ने आतंकवाद के नाम पर पाकिस्तान को दुनिया में अलग-थलग करने का जबर्दस्त कूटनीतिक अभियान छेड़ा है, तबसे ही पूरे देश में पाकिस्तान विरोध की लहर चल पड़ी है। हमारे कुछेक टीवी चैनल भी इस एजेंडे को अपनाते हुए यह दिखाने की कोशिश में लगे हैं कि जो कोई भी पाकिस्तान को भला-बुरा न कहे, वह 'राष्ट्र-विरोधी है। कुछ समय पूर्व कन्न्ड़ फिल्म अभिनेत्री व राजनेत्री रम्या को तब काफी भला-बुरा कहा गया, जब उन्होंने रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर के इस कथन के खिलाफ राय व्यक्त की कि पाकिस्तान तो नरक के समान है। रम्या कुछ दिन पूर्व ही पाकिस्तान होकर लौटी थीं और उनका कहना था कि वहां पर कई अच्छे लोग हैं जो दोनों देशों के बीच अमन-चैन चाहते हैं। यह सवाल मन में उठता है कि जब प्रधानमंत्री किसी देश के साथ शांति की कोशिश में लगे हो, उस वक्त यदि उस देश की तारीफ करना ठीक है तो क्या एक आम नागरिक को हालात बदलने पर भी अपने विचार व्यक्त करने की आजादी नहीं होना चाहिए? यह सिर्फ भारत में ही एक अनसुलझा मसला नहीं है, बल्कि दूसरे देशों में भी मीडिया व सिविल सोसायटी परेशान है कि अपनी अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा कैसे करें!

हाल ही में पाकिस्तान के एक प्रमुख अखबार 'डॉन" के एक रिपोर्टर ने अपने कॉलम में लिखा कि प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने सेना के साथ एक बैठक में लश्कर-ए-तोएबा व जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का निर्णय लिया है। यह भी कहा गया कि सेना द्वारा जिस तरह आतंकी संगठनों को दुलारा जाता है, उससे चीन बेहद खफा है। जैसे ही यह खबर मीडिया में आई, जबर्दस्त बवाल मच गया। पाकिस्तान के पीएमओ ने दो बार इसका खंडन किया। इसके कुछ ही समय बाद उस रिपोर्टर को ऐसे लोगों की सूची में डाल दिया गया, जो देश छोड़कर नहीं जा सकते। मीडिया ने इस पर आक्रामक प्रतिक्रिया दी। 'डॉन" अखबार को 'द नेशन" और 'एक्सप्रेस ट्रिब्यून" आदि का भी समर्थन मिला। एक संपादकीय में तो सरकार द्वारा राष्ट्रीय हितों की विवेचना को लेकर सरकार के एकाधिकार पर ही सवाल उठाया गया। अखबार द्वारा कुछ सख्त सवाल पूछे गए, मसलन - 'क्या सरकार द्वारा आतंकियों का समर्थन करना सही है, जिससे देश का नाम खराब होता है?" कुछ दिन बाद सरकार को इस मामले में अपने कदम वापस खींचने पड़े और पत्रकार सिरिल अल्मेडा का नाम देश से बाहर जाने के लिए प्रतिबंधित लोगों की सूची से हटा दिया गया।

ऐसे कई लोग जो पाकिस्तान के बारे में ज्यादा नहीं जानते, उन्हें जरूर आश्चर्य होगा कि वहां मीडिया को इतनी आजादी है कि वो सेना या असैन्य सरकार पर हमला कर सकता है। दूसरी ओर भारत में मीडिया सरकार द्वारा कही गई बातों का ही अनुसरण करता नजर आता है। यही कारण है कि सिविल सोसायटी के ज्यादातर लोग जो पड़ोस में शांति और स्थिरता चाहते हैं, उन्हें इस वक्त गलत समझा जा रहा है, जबकि सरकार आतंकी हमले के खिलाफ उग्र प्रतिक्रिया दे रही है। हां, हमें इस पर गहन आत्म-मंथन करना चाहिए कि क्या दोनों देशों के बीच सामान्य संबंध हो सकते हैं, जबकि आतंकी हमारे सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते हुए जवानों को मार रहे हैं, पर हमें सरकार की पाकिस्तान नीति की भी निष्पक्ष समीक्षा करनी होगी और देखना होगा कि कौन-सी बात कारगर है और कौन नहीं। लिहाजा हमारे कृत्यों की एक झटके में आलोचना नहीं होनी चाहिए। हमें अपने उस पड़ोसी के सदर्भ में एक दीर्घकालीन नीति तैयार करनी होगी, जो आतंकवाद की नीति पर चलता है। हमें उन देशों को भी देखना होगा जो भारत के प्रति पाकिस्तान की आक्रामकता का समर्थन करते हैं और इससे निपटने की दिशा में भी काम करना होगा। इस तरह एक स्पष्ट नीति तय होने से आम नागरिकों और फिल्म स्टार्स की सोच भी स्पष्ट होगी कि उन्हें पाकिस्तानियों के संदर्भ में किस हद तक आगे बढ़ना है। वे पाकिस्तानी बाजार का दोहन करने का लोभ संवरण नहीं कर सकते, जो कि क्रिकेट, बॉलीवुड फिल्मों व संगीत का दीवाना है। भले ही मुकेश अंबानी इस वक्त पाकिस्तानी कलाकारों के भारत में आकर काम करने के पक्ष में नहीं हों, लेकिन उन्होंने कारोबार के बारे में कुछ नहीं कहा। क्या दोनों देशों के बीच व्यापार रोक दिया जाना चाहिए? मुझे अब भी दिल्ली के बाजारों में रसीले पाकिस्तानी आम मिल जाते हैं। जब मैंने फल विक्रेता से कहा कि वह दुश्मन देश के आम बेच रहा है, तो उसने तपाक से जवाब दिया - 'क्यों न बेचूं? ये महज आम ही तो हैं।" अनुराग कश्यप भी तो यही कहते हैं - 'यह फिल्म ही तो है।" [लेखक हार्ड न्यूज मैगजीन के एडिटर इन चीफ हैं। ये उनके निजी विचार हैं ]

Dakhal News 19 October 2016

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