Patrakar Priyanshi Chaturvedi
सुप्रीम कोर्ट में एक हाई-प्रोफाइल कारोबारी विवाद की सुनवाई के दौरान बड़ा खुलासा हुआ, जब वादी पक्ष की ओर से दाखिल पुनरुत्तर (Rejoinder) में सैकड़ों ऐसे केसों का हवाला दिया गया जिनका न्यायिक रिकॉर्ड में कोई अस्तित्व ही नहीं था। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की बेंच के सामने वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने बताया कि ये केस एआई की मदद से गढ़े गए हैं और इनमें दिए गए कानूनी निष्कर्ष पूरी तरह मनगढ़ंत हैं। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि ऐसे दस्तावेजों पर अदालत भरोसा कर ले तो न्यायिक प्रक्रिया पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है, इसलिए मामले को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
Gstaad Hotels की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सीए सुंदरम ने खुले तौर पर माना कि दस्तावेज एआई के उपयोग से तैयार हुआ और कई संदर्भ झूठे निकले। उन्होंने कहा कि अपने करियर में वह पहली बार इतना शर्मिंदा महसूस कर रहे हैं। दस्तावेज दाखिल करने वाले AOR ने भी हलफनामे में बिना शर्त माफी मांगी है और बताया कि मसौदा वादी के निर्देश पर तैयार किया गया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल दस्तावेज वापस लेने से मामला खत्म नहीं हो सकता और पूछा कि जब हलफनामे में कहा गया है कि मसौदा वादी के निर्देश पर बना, तो जिम्मेदारी अकेले AOR पर क्यों डाली जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तकनीक के बढ़ते दौर में अदालतों को बेहद सावधान रहने की जरूरत है। वकीलों और पक्षकारों पर यह जिम्मेदारी है कि वे एआई का जिम्मेदार और सत्यापित उपयोग करें। कोर्ट ने कहा कि एआई मदद कर सकता है, लेकिन झूठ को सच नहीं बना सकता। यह घटना भारतीय न्यायपालिका में एआई के उपयोग से जुड़े जोखिमों की एक अहम नजीर बनकर सामने आई है और यह चेतावनी भी कि न्यायिक दस्तावेज में किसी भी प्रकार की मनगढ़ंत सामग्री अस्वीकार्य है।
Patrakar Priyanshi Chaturvedi
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