अपमान, विरोध, उपहास के बाद भी गांधी ने सत्यधर्म नहीं छोड़ा : नरेन्द्र सिंह तोमर
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जौरा/मुरैना। तमाम अपमान, विरोध और उपहास के बाद भी गांधी जी ने जीवन में सत्यधर्म का पालन किया और सत्यधर्म नहीं छोड़ा। भौतिक शरीर से बहुत सारे काम किये जाते हैं इसके साथ एक आत्मिक ताकत होती है और यही आध्यात्मिक ताकत व्यक्ति को सर्वमान्य और महान बनाती है। उनके षिष्य जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चम्बल में बागी आत्मसमर्पण का होना प्रेरणादायक घटना है और इसमें भाई जी डा.एस.एन. सुब्बराव का कार्य बहुत महत्वपूर्ण रहा। उक्त उद्गार बागी आत्मसमर्पण समारोह में केन्द्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने कही।

केन्द्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने कहा कि बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर को याद करते हुए कहा कि तमाम सामाजिक बुराईयां जातिगत भेदभाव को सहने के बाद भी डा. अम्बेडकर ने निष्पक्षता के साथ बिना किसी पूर्वाग्रह के पूरे देश को संचालित करने के लिए संविधान लिखा। उनके जीवन से महान कार्य करने की प्रेरणा मिलती है।

केन्द्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने कहा कि चम्बल के भिंड और मुरैना की पहचान बागीयों और उनके कार्यो से नकारात्मक रहा है। चम्बल की अच्छाईयों को रेखांकित करते हुए उन्होने कहा कि चम्बल में ककनमठ और मितावली के साथ डाल्फिन, घडियाल पार्क और खेत-खलिहान भी है। उन्होने जिला प्रशासन से देश भर से आये नवजवानों को चम्बल विषेषकर शहीद रामप्रसाद विस्मिल संग्रहालय का भ्रमण कराने की व्यवस्था करने के लिए भी कहा जिससे नवजवान चम्बल की सकारात्मक छवि को लेकर जायें।

प्रख्यात गांधीवादी और एकता परिषद के संस्थापक राजगोपाल पी.व्ही ने सभी आगन्तुकों का स्वागत करते हुए कहा कि चम्बल की घटना से देष व दुनिया में शांति व अहिंसा का संदेष गया। चम्बल की स्मृति से दुनिया को अहिंसा का संदेष जाना चाहिए। समाजवादी चिंतक और पूर्व सांसद रघु ठाकुर ने कहा कि न्याय व शांति के लिए गांधी के तीन सूत्र ‘चलो शहर से गांव की ओर’, ‘बडे से छोटे की ओर’ तथा ‘मशीन से हाथ की ओर’ पर काम करने की आवश्यक्ता है। चम्बल में शिक्षा और रोजगार पर काम करना न्याय व शांति के लिए जरूरी है।

प्रख्यात समाजशास्त्री, अध्येता व जवाहर लाल विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर आनंद कुमार ने कहा कि साम्प्रदायिक एकता के हजार सूत्र देने वाले शंकराचार्यो, मौलवियों और राजनेताओं के होने के बाद भी रामनवमी, होली और ईद के दिन देश में दंगा-फसाद होना चिंता का विषय है इसे जड़ से मिटाने का रास्ता केवल गांधीवाद में है। गांधी का रास्ता है-तीज त्यौहार में अपने-अपने टोल-मोहल्ले में जाकर एक दूसरे को बधाइंया देना और भाईचारा बढाना है।

उन्होने कहा कि दंगा फसाद संसद और विधानसभा में नहीं होता बल्कि टोले और मुहल्ले में होता है इसलिए उसका रास्ता भी वहीं है। सांसद डा विकास महात्मने ने अपने उद्बोधन में देश के राजनैतिक परिदृश्य में पारदर्षिता लाने के लिए चुनाव प्रक्रिया एवं प्रणाली में व्यापक सुधार की आवष्यक्ता पर बल दिया। समाजवादी चिंतक रामप्रताप ने कहा कि चम्बल का विकास पर्यावरणीय पर्यटन, शिक्षा एवं स्वावलम्बन पर ही निर्भर जिसमें युवाओं की सक्रिय भागीदारी करानी होगी। कार्यक्रम के दौरान एक्षन विलेज इण्डिया एवं जय जगत के अंतराष्ट्रीय प्रतिनिधियों क्रमष: सुश्री एस्टर (इग्लैण्ड) व श्रीमती जिल कार हैरिस (कनाडा) ने भी अपने विचार व्यक्त कर शांति संदेश दिया।

भाई जी की मूर्ति का अनावरण -

केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने भाई जी की समाधि स्थल पर पुष्पांजलि देकर श्रद्वांजलि अर्पित की तदोपरांत आश्रम परिसर में भाई जी डा.एस.एन. सुब्बराव की मूर्ति का अनावरण किया।

समारोह में शामिल आत्मसमर्पित बागी -

70 के दशक के चम्बल के बागी सरगना सरू सिंह, माधो सिंह, मोहर सिंह, माखन-छिद्वा, हरबिलास सिंह व राजस्थान के रामसिंह गिरोह के सदस्य रहे आत्मसमर्पित बागी मानसिंह, मेहरबान सिंह, गंगा सिंह, संतोष सिंह, उम्मेद सिंह, रामभरोसी, घमण्डी सिंह, बूटा सिंह, अजमेर सिंह यादव, बहादुर सिंह कुशवाहा, सोबरन सिंह, सोनेराम, रामस्वरूप सिकरवार, तथा 80 के दशक के आत्मसमर्पित दस्यु रमेश सिंह सिकरवार, बाबू सिंह, प्रभु सिंह और राजस्थान आत्मसमर्पित महिला बागी कपूरी बाई समारोह में शामिल हुए। सभी आत्मसमर्पित बागियों को सम्मानित किया गया।

भाई जी संस्कार पुरस्कार 2022 -

डा.एस.एन सुब्बराव (भाई जी) के नाम से सामाजिक कार्य के लिए दिया जाने वाला पुरस्कार आंध्रप्रदेश के के.यादव राजू, तमिलनाडु के करूनाकरण और महाराष्ट्र के नरेन्द्र बडगांवकर को प्रदान किया गया। इसमें उनको स्मृति चिन्ह, अंगवस्त्रम् सहित संयुक्त रूप से एक लाख की धनराशि दी गयी।

ज्ञात हो कि चम्बल घाटी में वर्ष 1970 में 14 अप्रैल को लोक नायक जयप्रकाष नारायण के समक्ष चम्बल के कुख्यात और दुर्दान्त बागियों ने गांधी जी के चित्र के समक्ष जौरा स्थित पुराने गांधी आश्रम में अपने हथियार डालकर समर्पण कर दिये थे। उनके समर्पण और पुनर्वास में डा.एस.एन सुब्बराव ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। इस वर्ष बागी आत्मसमर्पण के 50 वर्ष पूरे होने पर महात्मा गांधी सेवा आश्रम व एकता परिषद द्वारा इसका आयोजन किया गया

Dakhal News 14 April 2022

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