कोरोना वैक्सीनः स्वदेशी बनाम विश्व बंधुत्व
bhopal, Corona Vaccine:Swadeshi vs. World Fraternity

डॉ. प्रभात ओझा

अभी 3 जनवरी को हमारे ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआई) ने कोविड-19 से बचाव के लिए दो वैक्सीन के आपातकालीन इस्तेमाल की अनुमति दी थी। इनमें से कोविशील्ड नाम की वैक्सीन ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका का भारतीय संस्करण है, तो कोवैक्सीन पूरी तरह भारत में निर्मित है। इस अर्थ में दोनों को स्वदेशी वैक्सीन कहा गया है। अब रूस की ‘स्पुतनिक वी’ के भारत में इमरजेंसी इस्तेमाल को भी मंजूरी मिल गई, तो फाइजर और मॉडर्ना के साथ जॉनसन एंड जॉनसन की वैक्सीन भी सात दिनों तक 100 लोगों पर परीक्षण के बाद भारत में प्रयोग के लिए कतार में है। इन फैसलों के साथ भारत अपने यहां छह वैक्सीन को उपयोग में लाने वाला दुनिया का पहला देश बन जायेगा। निश्चित ही यह किसी लोक कल्याणकारी राज्य का स्वागत योग्य कदम कहा जायेगा कि वह अपनी जनता के जीवन की चिंता करे। देश में वैक्सीन की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए इसीलिए केंद्र सरकार ने यह कदम उठाया है। फिर भी कुछ सवाल कायम रहेंगे।

पूछा जायेगा कि क्या ये सभी वैक्सीन मानकों के हिसाब से पूरी तरह सुरक्षित हैं। खासकर तब जबकि पूर्ण स्वदेशी ‘कोवैक्सीन’ के मुकाबले स्वदेश में निर्मित ‘कोविशील्ड’ के प्रयोग से विदेश में कुछ लोगों के शरीर में खून के थक्के जमने की शिकायतें मिली थीं। अलग बात है कि कोविशील्ड से विपरीत असर की बात भी नाममात्र के मामलों और वह भी विशेष परिस्थितियों के चलते मिलीं। विपक्ष के आरोपों के बीच देश-दुनिया के वैज्ञानिकों ने इन वैक्सीन को पूरी तरह सुरक्षित बताया है। जानकारी मिली थी कि अन्य देशों में भी यही स्थिति है और आरोप वैज्ञानिक तथ्यों को जाने बिना ही लगाए जा रहे हैं। ऐसे में पूर्ण और आंशिक स्वदेशी के बाद बाहर से आने वाली इन नई वैक्सीन पर कितना यकीन किया जा सकेगा।

संकेत मिले हैं कि ये वैक्सीन भी शीघ्र भारत में ही बनने लगेंगी। ‘स्पुतनिक वी’ तो इसी महीने के अंत तक सुलभ होगी तो मई में हमारे यहां पैनेसिया बॉयोटेक ने स्पुतनिक वी टीके बनाने के भी संकेत दिए हैं। इस कंपनी ने भारत में सालाना 10 करोड़ खुराक का उत्पादन करने पर सहमति जताई थी। इसके अलावा हेटेरो बायोफार्मा, ग्लैंड फार्मा, स्टेलिस बायोफार्मा और विक्रो बायोटेक जैसी भारतीय फार्मास्युटिकल कंपनियों के साथ भी ‘स्पुतनिक वी’ निर्माता रूसी संस्था आरडीआइएफ ने करार किया है। इस अर्थ में स्पुतनिक भी ‘मेक इन इंडिया’ अथवा ‘मेड इन इंडिया’ वाली हो जायेगी। इसने जो आंकड़े दिए हैं, इन सभी भारतीय कंपनियों में स्पुतनिक वी का उत्पादन होने पर 85 करोड़ डोज तक सालाना बन सकेंगे।

अकेले स्पुतनिक के 85 कोरोड़ डोज उत्पादन की बात सुनकर हर देशवासी को संतोष हो सकता है। पहले से मौजूद हमारी दोनों वैक्सीन का उत्पादन भी अनवरत जारी है। तीन नई वैक्सीन भी जल्द मिलने की उम्मीद बंधी है, तो हर भारतवासी वैक्सीन मिलने के प्रति आश्वस्त हो सकते हैं। तो क्या मान लें कि भारत में हर नागरिक को वैक्सीन की डोज जल्द ही मिल सकेगी?  ऐसा सोचना अभी जल्दबाजी होगी। कारण यह है कि उत्पादन और किसी एक देश में उपलब्धता के मसले अलग-अलग हुआ करते हैं। भारतीय कंपनी सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया का ही उदाहरण लें जो ‘कोविशील्ड’ बनाती है। एस्ट्राजेनेका की सहयोगी कंपनी होने के नाते इसे ‘कोवैक्स कार्यक्रम’ के तहत निम्न आय वाले देशों को भी अपनी वैक्सीन की दो अरब डोज भेजनी है।

पहले भी भारत 65 से अधिक देशों को वैक्सीन भेज चुका है और आगे भी ऐसी योजना है। विश्व बंधुत्व और मानवता के दृष्टि से इसकी सराहना भी होती है। भारत ने पाकिस्तान जैसे अपने पड़ोसी को भी साढ़े चार करोड़ वैक्सीन भेजने का प्रस्ताव किया है। इसकी पुष्टि स्वयं पाकिस्तान राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा के सचिव आमिर अशरफ ख्वाजा ने मार्च के अंत में की थी। पाकिस्तान को ये वैक्सीन ग्लोबल अलायंस फॉर वैक्सीन्स एंड इम्यूनाइजेशन (गावी) के तहत दी जायेगी। इसके जरिए पाकिस्तान अपनी 20 फीसद आबादी को कवर कर सकेगा। अभीतक पाकिस्तान को चीन निर्मित वैक्सीन मिल रही है। भारत ने डोमनिका जैसे छोटे देश को भी 70 हजार डोज भेजे हैं। अनुदान के रूप में भेजी गई वैक्सीन वहां की लगभग आधी जनसंख्या के लिए पर्याप्त है। भारत के इस कदम से डोमनिका के प्रधानमंत्री रूजवेल्ट स्करीट ने भारत के प्रति आभार जताया। उन्होंने अभिभूत होकर कहा कि भारत हमारी प्रार्थना का जवाब इतनी सहृदयता के साथ और इतना जल्द देगा, इसका बिल्कुल अंदाजा नहीं था।

फरवरी के अंत तक अनुदान वाली खुराकें बांग्लादेश (20 लाख), म्यांमार (17 लाख), नेपाल (10 लाख), श्रीलंका (पांच लाख), अफगानिस्तान (पांच लाख), भूटान (1.5 लाख), बहरीन (एक लाख), ओमान (एक लाख),  मालदीव (एक लाख), मॉरीशस (एक लाख), बारबडोस (एक लाख) और सेशेल्स (50 हजार) को भी भेजी जा चुकी थीं। अभी मार्च के अंत में अपनी हाल की बांग्लादेश यात्रा के दौरान भी प्रधानमंत्री मोदी ने वहां की सरकार को वैक्सीन की 12 लाख डोज भेंट की है। इन देशों के अनुदान के अलावा वाणिज्यिक आधार पर ब्राजील (20 लाख), मोरक्को (60 लाख), बांग्लादेश (50 लाख), म्यांमार (20 लाख), दक्षिण अफ्रीका (10 लाख), कुवैत (दो लाख), यूएई (दो लाख), इजिप्ट (50 हजार) और अल्जीरिया (50 हजार) को भी टीकों की आपूर्ति की गई है।

विश्वस्तरीय महामारी की परिस्थितियों में वैक्सीन का उत्पादन और एक-दूसरे को इन्हें उपलब्ध कराने की स्थितियों को समझना जरूरी है। महामारी से बचने के लिए दुनिया में कई तरह के समझौते किए गये हैं। कोरोना के पहले चरण में ही अमेरिका जैसे सक्षम माने जाने वाले देश ने भी भारत से हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन जैसी दवा के टेबलेट्स लिए थे। माना कि हमने पिछले दिनों अपनी जरूरतों के हिसाब से लगभग हर क्षेत्र में स्वदेशी की तरफ बढ़ना शुरू किया है, पर महामारी सामान्य स्थिति नहीं होती। आज हर देश एक-दूसरे की मदद कर रहा है। ये तथ्य हमारे देश के विपक्ष को भी पता है कि कोई भी देश आज की तिथि में अपने हर नागरिक को वैक्सीन नहीं दे पाया है। हर जगह प्राथमिकाता तय की जा रही है। दरअसल, दुनिया मिलजुलकर ही इस असाधारण हालात से बाहर निकल सकेगी।

(लेखक हिन्दुस्थान समाचार की पाक्षिक पत्रिका 'यथावत' के समन्वय सम्पादक हैं।)

Dakhal News 14 April 2021

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