Patrakar Priyanshi Chaturvedi
भोपाल। भाई-बहन के प्रेम उत्सव का प्रतीक पर्व रक्षाबंधन सोमवार, तीन अगस्त को श्रावणी नत्रत्र के शुभ संयोग में मनाया जाएगा। इस बार श्रावणी पूर्णिमा के साथ महीने का श्रावण नक्षत्र भी पड़ रहा है, इसलिए पर्व की शुभता और बढ़ जाती है। श्रावणी नक्षत्र का संयोग पूरे दिन रहेगा। हालांकि सुबह सवा सात बजे तक रक्षाबंधन पर भद्रा का साया भी रहेगा। ज्योतिष के अनुसार, भद्राकाल में पर्व मनाना शुभ नहीं है, इसलिए यह समय निकल जाने के बाद ही पर्व मनाएं। ज्योतिषियों के अनुसार रक्षाबंधन के पर्व पर इसके पूर्व में भी कई बार भद्रा की स्थिति बनी है।
प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य सतीश सोनी ने हिन्दुस्थान समाचार से बातचीत में बताया कि तीन अगस्त को सुबह 7.15 बजे तक भद्राकाल की स्थिति बन रही है। इस काल में रक्षाबंधन का पर्व मनाना शुभ नहीं माना गया है। रक्षाबंधन का शुभ मुहूर्त सुबह 9.00 से 10.30 बजे तक शुभ, दोपहर 1.30 से 3.00 बजे तक चलकी चौघडिय़ा, दोपहर 3.00 से 4.30 बजे तक लाभ की चौघडिय़ा, शाम 4.00 से 6.00 बजे तक अमृत की चौघडिय़ा, शाम 6.00 से 7.30 बजे चल की चौघडिय़ा का योग बन रहा है। इसके साथ ही इस बार पर्व पर कई शुभ संयोग भी बने हैं। सावन माह का आखिरी सोमवार, श्रावण पूर्णिमा, श्रावणी नक्षत्र और सर्वार्थसिद्धि का विशेष संयोग बन रहा है। यह दिन नामकरण, अन्न प्राशन, यात्रा, व्यापार, वाहन क्रय के लिए अच्छा है। ब्राह्मण वर्ग रक्षाबंधन के लिए श्रावणी उपकर्म जनेऊ बदलते हैं।
ज्योतिषाचार्य सतीश सोनी ने बताया कि रक्षा बंधन के दिन बहनें भाइयों की कलाई पर रक्षा-सूत्र या राखी बांधती हैं और उनकी दीर्घायु, समृद्धि व खुशी आदि की कामना करती हैं। वहीं, भाई अपनी बहनों की रक्षा का वचन देते हैं। रक्षाबंधन का पर्व श्रावण मास में उस दिन मनाया जाता है, जिस दिन पूर्णिमा अपरान्हृ काल में पड़ रही हो। ध्यान रखें कि यदि पूर्णिमा के दौरान अपराह्न काल में भद्रा हो तो रक्षाबंधन नहीं मनाना चाहिए। ऐसे में यदि पूर्णिमा अगले दिन के शुरुआती तीन मुहूर्त में हो, तो पर्व के सारे विधि-विधान अगले दिन करने चाहिए। लेकिन यदि पूर्णिमा अगले दिन के शुरुआती तीन मुहूर्तों में न हो तो रक्षाबंधन को पहले ही दिन भद्रा के बाद प्रदोष काल के उत्तारार्ध में मना सकते हैं। शास्त्रों के अनुसार चाहे कोई भी स्थिति क्यों न हो भद्रा होने पर रक्षाबंधन मनाना निषेध है। ग्रहण सूतक या संक्रांति होने पर यह पर्व बिना किसी निषेध के मनाया जाता है।
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