विचारों पर किसी का कॉपीराइट नहीं
चैतन्य कीर्ति

चैतन्य कीर्ति 

अक्सर कुछ लोग अच्छे विचार को अपनाने से भी परहेज करते नजर आते हैं। उनका मानना है कि यह विचार उनके गुरु का तो नहीं है, उनके धर्म का तो है ही नहीं फिर उसे वे कैसे अपना सकते हैं। कुछ लोग अपने विचारों को दूसरों से छिपाकर रखते हैं और मानते हैं कि इस पर सिर्फ उनका या उनके अनुयायियों का ही अधिकार है। इन दोनों ही तरह के लोगों के लिए एक गुरु और शिष्य संवाद मिसाल हो सकता है। संवाद कुछ इस तरह है।

एक बार एक शिष्य ने गुरु से कहा, 'हर दिन आप गूढ़ उद्बोधन देते हैं जो हमारे जीवन को बदलने की क्षमता रखते हैं। क्या अच्छा नही होगा कि हम इन विचारों को पुस्तक रूप में संग्रहित कर लें और उन्हें आने वाली पीढ़ी के लिए किताब रूप में सुरक्षित करें? किताबें आपकी कीर्ति को सदियों तक बनाए रखेंगी और जो पैसा आएगा उसका उपयोग हम आश्रम और अपने रोजमर्रा के खर्च में कर सकते हैं।'

गुरु ने कहा, 'हां, इन्हें प्रकाशित करना एक अच्छा विचार है। लेकिन याद रहे कि मेरे उद्बोधन में जो गूढ़ तत्व और तीव्रता है वह मेरी अपनी नहीं है, वह तो दैवीय है जो मेरे जरिए व्यक्त हो रही है। मैं इन उद्बोधनों का श्रेय खुद नहीं लेना चाहता हूं। मैं तो सिर्फ खोखले बांस की तरह हूं और दैवीय गीत मेरे जरिए व्यक्त हो रहा है।

जब भी साधु बोलता है तो वह तो केवल माध्यम होता है और उसके लिए दैवीय शक्ति लोगों तक पहुंचती है। बांसुरी अपने आप नहीं गा सकती है। मगर वह धुन को लोगों तक पहुंचाने की शक्ति रखती है। मनुष्य बांसुरी की तरह ही है। पक्षी, वृक्ष, सूर्य और चंद्रमा सबकुछ बांसुरी की तरह ही तो हैं। जो गूढ़ संदेश कृष्ण, बुद्ध, जीसस, मोहम्मद साहब, नानक, कबीर, मीरा और उपनिषद के अज्ञात संतों ने दिया है वह असल में तो दैवीय ही है।'

गुरु ने आगे कहा, 'उपनिषद में कितनी गूढ़ बाते हैं लेकिन कितना आश्चर्य कि हम उसके लेखक को नहीं जानते। दैवीय शक्ति अपनी शिक्षा किसी भौतिक लाभ के लिए नहीं साझा करती है, यह सबकुछ नाम और ख्याति के लिए नहीं होता। अगर वे ऐसा करती हैं तो उनकी शिक्षाएं बेकार हो जाएंगी। इन लेखकों के जरिए सत्य प्रवाहित होता है और इससे ज्यादा वे ज्यादा कुछ नहीं सोचते हैं। उनके साथ यह भी जोखिम रहता है कि उन्हें गलत समझ लिया जाए और किसी भी तरह की छेड़छाड़ कर दी जाए लेकिन फिर भी वे कोई समझौता नहीं करते। जीसस को सत्य की राह पर चलने के लिए सूली पर चढ़ा दिया गया। सत्य किसी भी व्यक्ति से संबंधित नहीं है वह तो सार्वभौमिक है।'

तब शिष्य ने एक और प्रश्न पूछा, 'प्रिय गुरु, मगर कुछ गुरु चोला ओढ़े हुए होते हैं। ये फर्जी साधु आपके शब्दों को चुरा सकते हैं और लोगों तक पहुंचा सकते हैं। क्या हमें आपके प्रवचनों को कॉपीराइट नहीं करना चाहिए, ताकि कोई उन्हें चुरा न सके?'

गुरु ने जवाब दिया, 'सत्य पर सिर्फ मेरा अधिकार नहीं है। मैं सत्य को सिर्फ अपनी बपौती नहीं मान सकता। इस तरह का ज्ञान तो सदियों से ज्ञानी पुरुष देते आए हैं और भविष्य में भी यह व्यक्त किया जाता रहेगा। इसलिए विचारों के कॉपीराइट को लेकर उलझन में मत रहो। इस तरह की चिंता भी मत करो। अगर तुम कुछ करना ही चाहते हो तो इसे बिना किसी चिंता के लोगों के बीच फैलाओ।

मैं तुम्हें वही बात कहना चाहूंगा जो जीसस ने अपने शिष्यों से कही थी। उन्होंने कहा था कि छत पर चढ़ जाओ और वहां से जोर से सच बोलो क्योंकि लोगों के कान बहरे हैं। उन्होंने कहा था कि जब तक तुम जोर से नहीं बोलोगे सच सुना नहीं जाएगा। मैं कहता हूं कि सच तो बिना किसी बाधा के लोगों तक पहुंचना चाहिए। इसके लिए सीमा मत बांधो। ज्ञान के प्रकाश को फैलने दो, इसकी सुगंध चारों ओर हो जाने दो।

ओशो कहते थे, 'वस्तुओं का कॉपीराइट किया जा सकता है लेकिन विचारों का नहीं और इसलिए ध्यान का कॉपीराइट नहीं किया जा सकता। ये बाजार की चीजें ही नहीं हैं। कोई भी व्यक्ति इन पर अपना एकाधिकार नहीं कर सकता। पश्चिमी देश वस्तु और अनुभव के बीच का फर्क नहीं समझ सकते हैं। हजार वर्षों से पूर्व में ध्यान किया जाता रहा है लेकिन किसी ने भी उसके कॉपीराइट या ट्रेडमार्क की बात नहीं की है।

 

Dakhal News 24 December 2017

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