अब हिमालय जैसी आस
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वर्ष 2019 के जनादेश से हमें दो संदेश मिलते हैं। एक तो यह कि तमाम विविधताओं के बावजूद जब भारत के नागरिकों के सामने अपने भविष्य की दिशा तय करने की चुनौती आती है तो वे एक राष्ट्रीय सहमति का निर्माण करने में सक्षम होते हैं। हम बुद्धिजीवी और पत्रकार दिशाभ्रम के शिकार हो सकते हैं, लेकिन जनता इस समस्या से पीड़ित नहीं है। जनादेश से जुड़ा दूसरा संदेश यह है कि मिथ्या प्रचार करने वाले सबसे पहले खुद अपने विचारों में कैद होकर बाहरी दुनिया से बेखबर हो जाते हैं। गुजरात से लेकर असम तक और कर्नाटक से लेकर हिमाचल तक मतदाताओं ने एकमत से देश की बागडोर प्रधानमंत्री मोदी को सौंपने का फैसला किया। यह राष्ट्रीय सहमति हमारे लोकतंत्र की परिपक्वता का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को विपक्ष कभी प्रभावी चुनौती नहीं दे पाया, लेकिन किसी सकारात्मक कार्यक्रम के आधार पर भारी बहुमत हासिल करने का एक उदाहरण पहले भी मिला था। 1971 में इंदिरा गांधी ने 'गरीबी हटाओ जैसे नारे के दम पर सत्ता हासिल की थी। हालांकि वह इस वादे को निभाने में बुरी तरह विफल रही थीं। 1984 में राजीव गांधी को भारी बहुमत मिला था, लेकिन वह जनादेश इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति का परिणाम था।

पीवी नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह की गठबंधन सरकारें अपने अस्तित्व को बचाने और रूठे सहयोगियों को मनाने में ही लगी रहीं। हालांकि इस दौरान कुछ बहुत अच्छे काम भी हुए, लेकिन मनमोहन सिंह के शब्दों में 'गठबंधन की राजनीति की मजबूरियों के कारण ये सरकारें सांसदों की खरीदफरोख्त, भ्रष्टाचार में लिप्त मंत्रियों के बचाव और देश की अर्थनीति और विदेश नीति से संबंधित कठोर फैसलों से कतराती रहीं।

नकारात्मकता एक कुंठा है। भारत का युवा मतदाता राहुल गांधी की यह बात मानने के लिए तैयार नहीं था कि सिर्फ कुंठा और क्रोध से उसके अस्तित्व को परिभाषित किया जाए। चुनाव के दौरान देशव्यापी जनअसंतोष को लेकर भी दुष्प्रचार किया गया। मसलन युवा बेरोजगार है, किसान नाराज है, अल्पसंख्यक असुरक्षित हैं, दलित हिंसा के शिकार हैं, व्यापारी टैक्स-आतंकवाद से व्यथित हैं यानी समाज के हर तबके को मोदी ने धोखा दिया है। दिल्ली के स्वनिर्मित वैचारिक बुलबुले में रहने वाले ये लोग जब चुनावी भ्रमण के लिए निकले तो उनकी चुनावी रिपोर्ट जनता की नब्ज नहीं पकड़ पाई। वे अपने ही प्रचार के शिकार बन गए। मिसाल के तौर पर, गांव में सिर पर भूसा ढोने वाली 11 वर्षीय एक किशोरी की मेहनत में हमारे अंग्र्रेजीदां पत्रकारों को शोषण दिखाई दिया। यह किशोरी नए भारत की बेटी है, जिसे मेहनत करने में शर्म नहीं आती। उसके सपने जिंदा हैं। वह डॉक्टर बनना चाहती है। उसके सपनों को पूरा करने के लिए कम आय के बावजूद उसके पिता उसे प्राइवेट स्कूल में पढ़ा रहे हैं। उसके पास पक्का मकान है, शौचालय भी है और मोदी सरकार ने उसे गैस सिलेंडर भी दिया है। भले ही वह सिलेंडर आज खाली हो, लेकिन जनवरी से लेकर मार्च तक उसे दो बार भरवाया भी गया है, किंतु चुनावी पर्यटन पर निकले पत्रकार महोदय इस किशोरी की जिंदगी पर तरस खाते हुए उसे गरीबी और शोषण के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते रहे। सच तो यह है कि यह किशोरी नए भारत में होने वाले अभूतपूर्व आर्थिक समावेशीकरण का एक नायाब उदाहरण है, लेकिन यह बात अंग्र्रेजियत के खंडहरों में आलीशान जिंदगी बिताने वाले दिल्ली के पत्रकारों की समझ से बाहर है। वे यह नहीं देख सके कि भारत के गांव और कस्बों में रहने वाले करोड़ों किशोर व युवा बेहतर जिंदगी का सपना देखने लगे हैं। इसी कारण जब देश की भावी सरकार चुनने का समय आया तो उन्होने राहुल गांधी की कुंठा और झुंझलाहट को ठुकराकर नरेंद्र मोदी द्वारा दिखाई आशाओं के लोकतंत्र की राह पर चलने का निर्णय लिया।

 

Dakhal News 1 June 2019

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